Bihar caste census: इन आंकड़ों से खुश तो बहुत होगी बीजेपी, ओवैसी बन सकते हैं सबसे बड़े फैक्टर
Bihar caste census data: बिहार में जाति जनगणना का आने वाले लोकसभा और विधानसभा चुनावों में क्या असर होगा, इसके बारे में अभी से बहुत ज्यादा अंदाजा लगाना काफी मुश्किल है। वैसे इसके आंकड़ों के आधार पर अभी यही दावा किया जा रहा है कि इससे इंडिया ब्लॉक या बिहार में सत्ताधारी महागबंधन को बड़ा फायदा मिल सकता है।
लेकिन, अगर बिहार जातिगत जनगणना के आंकडों पर गौर से नजर डालें तो मामला इतना आसान भी नहीं है। क्योंकि, हम जो बताने जा रहे हैं, वह बीजेपी को दिल से खुश कर सकता है। बिहार में सत्ताधारी जेडीयू इस रिपोर्ट के नतीजों से इतनी गदगद है कि जहां राज्य सरकार इसे जातिगत सर्वे होने बात सुप्रीम कोर्ट तक से कह चुकी है, वहीं पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष ललन सिंह इसे जनगणना बता ही नहीं रहे हैं, बल्कि अभी से आरक्षण की 50% सीमा को बढ़ाने की मांग भी करने लगे हैं।

बिहार में यादवों से ज्यादा मुस्लिम आबादी
इस जातिगत जनगणना के आधार पर बार-बार यह कहा जा रहा है कि राज्य में सबसे बड़ी जाति यादव है, जिसकी आबादी 14.26% है। लेकिन, शायद हम एक बात भूल रहे हैं। वह ये कि यह रिपोर्ट यह भी बताती है कि बिहार में मुसलमानों की जनसंख्या 17.70% है। ये दोनों लालू यादव की आरजेडी के MY (माय) समीकरण का आधार हैं।
2020 में ओवैसी की पार्टी के 5 एमएलए चुने गए थे
लेकिन, यही आंकड़ा अब लालू की नींदें उड़ा सकता है। क्योंकि, हैदराबाद के सांसद और एआईएमआईएम के नेता असदुद्दीन ओवैसी की नजर बिहार के इन्हीं मुस्लिम वोटरों पर टिकी हुई है। 2020 के विधानसभा चुनावों में उनकी पार्टी के टिकट पर 5 मुस्लिम एमएलए चुने गए थे और जेडीयू और आरजेडी उम्मीदवार मुंह ताकते रह गए थे। पार्टी ने कुल 20 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे, जिनमें 16 मुस्लिम थे और उसे कुल 5,23,279 वोट मिले थे। हालांकि, बाद में से इनमें से 4 आरजेडी में शामिल हो गए थे।
मुसलमान वोटर मुस्लिम के रूप में ही करता है वोटिंग
कहने का मतलब है कि अगर जाति की बात करें तो यह साफ हो गया है कि जनसंख्या के मामले में यादव की आबादी मुसलमानों से कम है। क्योंकि, मुस्लिम वोटरों का जातीयों में बंटकर मतदान का ट्रेंड नहीं देखा गया है। एक मुस्लिम मतदाता आमतौर पर मुसलमान के रूप में ही वोट करता है।
ओबीसी पार्टियों की दलीलें ओवैसी के लिए एक्स-फैक्टर
बिहार में पिछड़ों की राजनीति करने वाली पार्टियां यही तर्क देती रही हैं कि उन्हें आबादी के हिसाब से हक मिलना चाहिए; और जनगणना के बाद इस तरह की दलीलों ने और भी जोर पकड़ लिया है। ओवैसी जैसे नेता के लिए उनके इसी तर्क में संजीवनी छिपी हो सकती है।
मुस्लिम एमएलए-19 और यादव विधायकों की संख्या 52
अगर मुस्लिम-यादव समीकरण की राजनीति करने वाले आरजेडी का रिकॉर्ड देखें तो पिछली बार पार्टी ने 17 मुसलमानों को टिकट दिया था, जिनमें से 8 चुनाव जीते थे। यही नहीं 17.70% की आबादी के बावजूद राज्य विधानसभा में कुल 19 मुस्लिम एमएलए ही पहुंचे हैं। जबकि, 14% से कुछ अधिक आबादी के बावजूद यादव विधायकों की संख्या 52 है। यही अंतर ओवैसी की नई राजनीति का आधार हो सकता है।
बिहार की जाति जनगणना ओवेसी के लिए बन सकता है बड़ा मौका
असदुद्दीन ओवैसी यूपी से लेकर बिहार और महाराष्ट्र तक में मुसलमानों के साथ इसी को भेदभाव का मुद्दा बनाते रहे हैं। उनकी राजनीति स्पष्ट है कि तथाकथित सेक्युलर पार्टियां मुसलमानों का वोट तो लेना चाहती हैं, लेकिन जब प्रतिनिधित्व देने का समय आता है तो कन्नी काट लेती हैं। ऐसे में राज्य विधानसभा में मुसलमानों की आबादी के हिसाब से बहुत कम नुमाइंदगी को वह बहुत बड़ा मुद्दा बना सकते हैं।
ओवैसी की वजह से भाजपा को भी मिल सकता है मौका
अगर बिहार की जातिगत जनगणना के बाद ओवैसी की सियासी दाल गल गई तो उसका एक बड़ा फायदा भाजपा को भी मिल सकता है। क्योंकि, अगर इंडिया ब्लॉक मुस्लिम वोट को अपने पक्ष में एकजुट करने में नाकाम रहा तो फिर इससे उसकी की मुश्किलें बढ़ेंगी। क्योंकि, ईबीसी वोटरों को ओबीसी पार्टियां पूरी तरह से अपने पक्ष में कर पाएंगी, इसका अभी से कोई स्पष्ट कारण नजर नहीं आता।
वैसे लगता है कि भाजपा को भी रिपोर्ट के अध्ययन के बाद कुछ उम्मीद की किरणें नजर आ रही हैं। मसलन, पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष सम्राट चौधरी तो दावा कर रहे हैं कि बीजेपी के पास 75% वोट है। उनका कहना है कि 'नीतीश कुमार पिछड़ों के ठेकेदार नहीं हैं।' पार्टी ने यह भी शिकायत की है कि सिर्फ एक पन्ने की ही रिपोर्ट जारी क्यों की गई है और उसने विस्तृत रिपोर्ट नहीं आने पर अपने आंकड़े जारी करने का भी दावा किया है।












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