बिहार में भाकपा माले पहली बार इतनी बड़ी हैसियत में लड़ेगी चुनाव
नई दिल्ली। भाकपा माले बिहार का ऐसा अनोखा दल है जिसने अपनी संसदीय राजनीति की शुरुआत सीधे लोकसभा से की। लोकसभा के बाद ही उसका विधानसभा में दाखिला हुआ था। अब बिहार विधानसभा चुनाव में माले पहली बार एक बड़ी भूमिका में है। इससे पहले उसे कभी इतनी अहमियत नहीं मिली। राजद-कांग्रेस और वाम दलों से गठबंधन में माले की पसंद का सबसे अधिक ख्याल रखा गया। माले ने राजद की पांच जीती हुई सीटें दबाव डाल कर ले ली। कांग्रेस को भी अपनी एक सीट माले को देनी पड़ी। माले से दोस्ती की सबसे बड़ी कीमत राजद नेता श्याम रजक को चुकानी पड़ी। खबरों के मुताबिक राजद ने फुलवारीशरीफ की सीट माले को दे दी है। अब श्याम रजक का जदयू छोड़ के राजद में आना एक बड़ी भूल दिखायी पड़ रही है। 2015 में श्याम रजक फुलवारीशरीफ से विधायक चुने गये थे। वे नीतीश सरकार में मंत्री भी थे। अगस्त महीने में अचानक जदयू छोड़ कर वे राजद में शामिल हो गये थे। बिहार की राजनीति में पहले सीपीआइ और सीपीएम का प्रभाव था। सबसे मजबूत वामपंथी पार्टी, सीपीआइ हुआ करती थी। लेकिन अब यह रुतबा भाकपा माले ने हासिल कर लिया है। उसने राजद जैसे मजबूत दल को समझौता करने पर मजबूर कर दिया।

माले ने झटकी राजद की पांच सीटें
भाकपा माले की दोस्ती के लिए राजद को अपनी पांच जीती हुई सीटों की बलि चढ़ानी पड़ी है। खबरों के मुताबिक राजद ने अपने कब्जे वाली आरा, काराकाट, अरवल, औराई और पालीगंज की सीट माले को दी है। कांग्रेस के कब्जे वाली भोरे सीट भी माले के खाते में गयी है। राजद को अपनी दो सीटिंग सीटें (झंझारपुर और बखरी) सीपीआइ को देनी पड़ी हैं। माले के कारण राजद के जो विधायक सीट से बेखल हुए हैं उनकी अभी प्रतिक्रिया सामने नहीं आयी है। लेकिन माना जा रहा है कि बेटिकट हुए विधायक माले और राजद के लिए जरूर मुश्किलें खड़ी करेंगे। माले को इतनी तरजीह दिये जाने से राजद के कई नेता खफा बताये जाते हैं। एक नाराज नेता का कहना है कि तेजस्वी सीएम बनने की महात्वाकांक्ष में अपने विधायकों की बलि चढ़ा रहे हैं। सबसे विकट स्थिति तो श्याम रजक की हुई है। चर्चा है कि राजद ने फुलवारीशरीफ सीट माले को देने से पहले श्याम रजक से कोई बात भी नहीं की। चूंकि अभी सीटों का औपचारिक एलान नहीं हुआ है इसलिए किसी नाराज नेता की कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आयी है। श्याम रजक फुलवारीशरीफ से छह बार विधायक चुने जा चुके हैं। अगर इतने तपे-तपाये नेता का अचानक पत्ता साफ होगा तो हंगामा बरपना तय है।

लोकसभा से जीत की बोहनी
भाकपा माले (लिबरेशन) पहले नक्सली संगठन था। यह भूमिगत हो कर राजनीतिक परिवर्तन के लिए हिंसक आंदोलन चालाता था। बाद में इसने अपनी नीति बदली और लोकतांत्रिक चुनाव में हिस्सा लेने का फैसला किया। इसने 1982 में इंडियन पीपुल्स फ्रंट के नाम से एक खुला राजनीतिक संगठन बनाया। 1985 के बिहार विधानसभा चुनाव में आइपीएफ ने सबसे पहले अपनी किस्मत आजमायी। उसने 49 सीटों पर उम्मीदवार खड़े किये लेकिन एक पर भी जीत नहीं मिली। लेकिन 1989 के लोकसभा चुनाव में आइपीएफ ने कमाल कर दिया। इस चुनाव में आइपीएफ के उम्मीदवार रामेश्वर प्रसाद ने आरा लोकसभा सीट से जीत हासिल कर तहलका मचा दिया था। 1990 के विधानसभा चुनाव में आइपीएफ ने 82 सीटों पर चुनाव लड़ा था। उसके 7 विधायक जीतने में कामयाब हुए थे। इस चुनाव में आइपीएफ को 14 सीटों पर वोट शेयरिंग में दूसरा स्थान मिला था। लेकिन ये दौर लालू यादव का था। लालू ने जातिवाद की ऐसी लहर पैदा की कि उसमें मार्क्स, लेनिन और माओ के विचार पत्ते की तरह उड़ गया। लालू ने समर्पित कैडरों वाली पार्टी आइपीएफ को जाति के आधार पर तोड़ दिया। आइपीएफ के सात में चार विधायक लालू के साथ चले गये। लालू उस समय अल्पमत की सरकार चला थे और कई दलों में तोड़फोड़ कर अपनी स्थिति मजबूत कर रहे थे। 1990 में बिहार की सबसे मजबूत वामपंथी पार्टी सीपीआइ थी। सीपीआइ के 23 विधायक जीते थे। लेकिन तीस साल में स्थिति ऐसी हो गयी माले, सीपीआइ और सीपीएम से बहुत आगे निकल गयी। 1994 में आइपीएफ को भंग कर दिया गया। इसके बाद अंडरग्राउंड रहने वाली भाकपा माले (लिबरेशन) लोकतांत्रिक धारा में शामिल हो गयी और उसने खुद को राजनीतिक संगठन घोषित कर दिया।

भाकपा माले का सियासी सफर
लालू यादव की मंडल राजनीति से भाकपा माले का बहुत नुकसान हुआ। लालू यादव ने दलितों, गरीबों और पिछड़ों में पैठ बना कर माले के आधार मतों पर हक जमा लिया। इसके बाद माले के विधायकों की संख्या कम होती गयी। अगर फरवरी 2005 के चुनाव को छोड़ दें तो माले के फिर कभी 7 विधायक नहीं जीत पाये। जब लालू की राजनीति ढलान पर आयी तो इस वोट बैंक पर नीतीश ने प्रभाव जमा लिया। 2010 के चुनाव में माले का खाता तक नहीं खुल पाया था। इस हार से विचलित हुए बिना माले ने अपने प्रभाव विस्तार की मुहिम को जारी रखा। बिहार में जब सीपीआइ और सीपीएम मृतप्राय हो गयी तो इस मुश्किल दौर में भी माले ने खुद को जिंदा रखा। 2015 के चुनाव में उसने तीन सीटें जीत कर फिर अपनी मौजूदगी दर्ज करायी। वक्त शायद माले का ही इंतजार कर रहा था। 2020 में मुख्य विपक्षी दल राजद की हालत ऐसा हो गयी कि माले की किस्मत चमक गयी। तीन विधायकों वाली भाकपा माले ने 80 विधायकों वाले राजद को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया।
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