बिहार चुनाव: वो एक सवाल जिसके चलते राजनीतिक घमासान हुआ बेहद दिलचस्प

बिहार चुनाव: वो एक सवाल जिसके चलते राजनीतिक घमासान हुआ बेहद दिलचस्प

बिहार चुनाव के दूसरे चरण में राज्य की 94 विधानसभा सीटों पर मंगलवार को वोट डाले जा रहे हैं. इससे पहले राज्य की 71 विधानसभा सीटों पर चुनाव हो चुके हैं.

पहले दोनों चरणों के मतदान को जिस एक मुद्दे ने सबसे ज़्यादा प्रभावित किया है वह है रोज़गार. इस मुद्दे को केंद्र में लाने का श्रेय महागठबंधन की ओर से मुख्यमंत्री पद के उम्मदीवार तेजस्वी यादव को दिया जा रहा है.

उन्होंने अपने चुनावी घोषणा पत्र में पहली कैबिनेट मीटिंग के ज़रिए राज्य में दस लाख लोगों को सरकारी नौकरी देने का वादा किया है. उनके इस वादे का ही असर है कि पिछले दो महीनों के दौरान बिहार चुनाव की तस्वीर बदलती हुई दिख रही है.

दो महीने पहले तक बिहार चुनाव में भारतीय जनता पार्टी और जनता दल यूनाइटेड की जीत निश्चित समझी जा रही थी लेकिन सरकारी नौकरी के वादे के बाद महागठबंधन की तरफ़ राज्य के युवाओं का रुझान दिख रहा है.

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राज्य के वरिष्ठ पत्रकार मणिकांत ठाकुर कहते हैं, "अगर पिछले कुछ चुनावों को देखें तो पहली बार ऐसा लग रहा है कि विपक्ष ने चुनाव का नैरेटिव सेट किया है. तेजस्वी यादव चैलेंजर बनकर उभरे हैं और सत्तारूढ़ एनडीए को रक्षात्मक रूख अपनाना पड़ रहा है."

दरअसल महागठबंधन के चुनावी घोषणा पत्र में तेजस्वी यादव ने सरकार बनने पर अपनी कैबिनेट की पहली बैठक और पहले सिग्नेचर से राज्य के 10 लाख लोगों को सरकारी नौकरी देने का वादा किया है और वे उसे अपने हर चुनावी सभा में दोहरा रहे हैं.

सोनपुर में तेजस्वी की एक सभा में आए युवा ने कहा, "2014 से ग्रेजुएट हूँ. कहीं कोई वैकेंसी नहीं निकल रही है, निकलती है तो कैंसिल हो जाती है, इसलिए हम लोग सोच रहे हैं कि क्यों ना इस बार तेजस्वी को ही मौक़ा दिया जाए."

इस मुद्दे को बीजेपी और जेडीयू ने उतनी गंभीरता से पहले दिन नहीं लिया. तेजस्वी की घोषणा के ठीक बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने इस दावे का मज़ाक़ उड़ाया और तेजस्वी यादव पर निजी हमला करते हुए कहा कि 'पैसा जेल से लाएँगे क्या'. निशाना लालू प्रसाद यादव के जेल में होने की ओर था.

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इसके बाद भारतीय जनता पार्टी ने अगले ही दिन प्रदेश के 19 लाख लोगों को रोज़गार देने का वादा किया. लेकिन बीते 15 साल में नीतीश कुमार की सरकार में जिस तरह से बेरोज़गारी बढ़ी है और लोगों को ठेके पर रखे जाने की प्रथा ने व्यवस्था का रूप ले लिया है, ऐसे में सरकारी नौकरी का आकर्षण ज़्यादा दिख रहा है.

सारण के बनियापुर विधानसभा क्षेत्र के कई युवाओं ने कहा कि 'पहली बार कोई सरकारी नौकरी का वादा तो कर रहा है, हम लोगों ने मोदी जी के हर साल दो करोड़ नौकरियों के वादे पर भी तो भरोसा किया था. उससे क्या मिला!'

मुज़फ़्फ़रपुर के मोतीपुर विधानसभा इलाक़े में नरेंद्र मोदी के भाषण सुनने आए युवाओं ने कहा है कि तेजस्वी यादव अपने वादे को पूरा नहीं कर सकते हैं लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ने कितने दावों को पूरा किया है, इसके बारे में युवा कुछ नहीं कहते हैं.

भारतीय जनता पार्टी के बिहार में वरिष्ठ नेता और नीतीश कुमार सरकार में पथनिर्माण मंत्री नंद किशोर यादव ने इस वादे पर कहा, "तेजस्वी जी बिहार के नौजवानों को मूर्ख समझते हैं. क्या ये संभव है कि 10 लाख लोगों को पहली कैबिनेट बैठक से नौकरी दी जा सकती है. बिहार की जनता कम पढ़ी लिखी भले है लेकिन मूर्ख नहीं है. एक नौंवी पास व्यक्ति ऐसा दावा क्यों कर रहा है, इसे जनता बख़ूबी समझती है."

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वहीं, बिहार में एनडीए सरकार में शामिल जनता दल यूनाइडेट के प्रदेश अध्यक्ष वशिष्ठ नारायण सिंह ने बताया, "इतनी नौकरियों के लिए कम से कम 54 हज़ार करोड़ रुपये अतिरिक्त चाहिए होगा. वो बजट कहां से लाएँगे. उन्हें मालूम है कि सरकार बनेगी नहीं तो जो भी वादा कर लें, उसे पूरा नहीं करना है."

लेकिन इन आलोचनाओं से इतर तेजस्वी यादव लगातार 10 लाख नौकरियों के दावे का रोडमैप बता रहे हैं. उनके रोडमैप के मुताबिक़ साढ़े चार लाख स्थायी पद रिक्त हैं और उनको भरा जाएगा. इसके अलावा साढ़े पाँच लाख नए रोज़गार के पद सृजित किए जाएँगे. वे साथ ही यह भी दोहरा रहे हैं कि बजट का कोई संकट नहीं है.

बजट की व्यवस्था पर उन्होंने कहा है कि बिहार सरकार विभिन्न योजनाओं का 80 हज़ार करोड़ रूपया ख़र्च नहीं कर पाती है, उन पैसों का इस्तेमाल किया जाएगा. 'पैसा कहां से आएगा' के मुद्दे पर तेजस्वी ने दूसरे चरण के मतदान से ठीक पहले यहाँ तक कह दिया कि अगर ज़रूरत पड़ी तो लोगों को नौकरियाँ देने और उनके वेतन भुगतान के लिए उनका पूरा मंत्रिमंडल और विधायक वेतन नहीं लेंगे.

बिहार चुनाव: वो एक सवाल जिसके चलते राजनीतिक घमासान हुआ बेहद दिलचस्प

राष्ट्रीय जनता दल के वरिष्ठ नेता और बिहार की राजनीति को क़रीब पाँच दशक से देख रहे शिवानंद तिवारी के मुताबिक़ 'तेजस्वी इस तरह से पूरे चुनाव का डिस्कोर्स बदल देंगे, इसका अंदाज़ा विपक्ष क्या किसी को भी नहीं रहा होगा, अगर उन्होंने इच्छाशक्ति के साथ काम किया तो इसे करना बहुत मुश्किल नहीं होगा.'

शिवानंद तिवारी कहते हैं, "बेरोज़गारी के सवाल पर प्रधानमंत्री जी मौन क्यों धारण किए हुए हैं. वे तो धारा 370, राम मंदिर का शिलान्यास, नागरिकता क़ानून में संशोधन इत्यादि की बात कर रहे हैं, लेकिन रोज़ागर के मुद्दे पर बिलकुल मौन हैं."

हालाँकि नीतीश कुमार और उनकी पार्टी जनता दल यूनाइटेड लगातार कह रही है कि उनकी सरकार के दौरान भी लाखों लोगों को नौकरियाँ दी गई हैं. नीतीश कुमार के कार्यकाल के दौरान बिहार में लगभग छह लाख लोगों को नौकरियाँ मिली हैं.

तेजस्वी यादव ने इसका ज़िक्र करते हुए सोमवार को कहा है कि 'छह लाख लोगों की नौकरियों की बात तो नीतीश कुमार कर रहे हैं, लेकिन ये नौकरियाँ 15 साल में दी गईं हैं और सब के सब ठेके की नौकरियाँ हैं जिसे हम स्थायी करेंगे.'

बिहार चुनाव में तेजस्वी की सभाआों में उमड़ती भीड़ की बड़ी वजह सरकारी नौकरियों के वादे को ही माना जा रहा है. पहले चरण में आशंकित नुक़सान को देखते हुए भी एनडीए ने रोज़गार के मुद्दे का काउंटर करने के लिए फिर से उस मुद्दे को ज़ोर-शोर से उछालना शुरू कर दिया है जो बीते 25 साल से बिहार की राजनीति का सबसे बड़ा मुद्दा बना हुआ है.

बिहार चुनाव: वो एक सवाल जिसके चलते राजनीतिक घमासान हुआ बेहद दिलचस्प

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तेजस्वी यादव को जंगलराज का युवराज बताया है, वे अपनी सभाओं में लगातार कह रहे हैं कि बिहार में कैसा जंगलराज था, इसे लोग भूले नहीं होंगे.

वरिष्ठ पत्रकार मणिकांत ठाकुर के मुताबिक़ बीजेपी ने जिस तरह से इस मुद्दे को उभारा है, उससे उसको फ़ायदा मिलेगा, क्योंकि अभी भी काफ़ी लोग हैं जो उस दौर की वापसी नहीं चाहते हैं.

दिल्ली हाईकोर्ट में वकालत करने के बाद बिहार लौट कर वकालत कर रहे युवा सत्य प्रकाश पांडेय कहते हैं, "लालू प्रसाद यादव के दौर की वापसी नहीं चाहने वाले लोग कम नहीं हैं, वे मुखर भी नहीं हैं लेकिन मुश्किल यह हो गई है कि बहुत सारे लोग अब नीतीश कुमार को भी मुख्यमंत्री के तौर पर नहीं देखना चाहते हैं."

बिहार के गोपालगंज ज़िले के एक युवा ने बताया कि अगर लालू यादव का राज जंगल राज था तो नीतीश कुमार का राज कौन सा मंगल राज है. आप आँकड़े देख लीजिए, अपराध, हत्याएँ और लूटमार किसी में कमी नहीं हुई है.

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वहीं सोनपुर में तेजस्वी यादव की सभा को सुनने आए एक युवा ने बताया कि जंगलराज-जंगलराज करने वालों को देखिए, कैसे एक हेलिकाप्टर वाले नेता के पीछे 30-30 हेलिकॉप्टर लगाए हुए हैं.

दरभंगा के कुशेश्वरस्थान में एक बुज़ुर्ग ने कहा कि लालू यादव का जंगलराज नीतीश कुमार के मंगलराज से कई गुना अच्छा था. लेकिन राज्य के शहरी इलाक़ों और खाते-पीते मध्य आयुवर्ग के कई लोग मिले जो ये मानते हैं कि नीतीश कुमार की जगह नया सीएम चाहिए लेकिन महागठबंधन को चुनना भी जोख़िम से कम नहीं होगा.

लेकिन ग्रामीण इलाक़ों में लालू प्रसाद यादव के शासन को ग़रीबों का राज कहने वाले लोग भी कम नहीं हैं. हाजीपुर की एक बुजुर्ग महिला ने बताया कि लालू प्रसाद यादव उन लोगों के इलाक़े में आए थे जबकि नीतीश कुमार अब तक नहीं आए हैं.

रणनीतिक तौर पर तेजस्वी यादव ने जंगलराज के नैरेटिव को ही काउंटर करने के लिए अपने प्रचार अभियान में लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी को पोस्टर पर जगह नहीं दी है, वे केवल युवाओं को रोज़गार देने की बात कह रहे हैं और इसके लिए एक मौका मांग रहे हैं.

हाजीपुर में एक मतदाता ने कहा कि एक बार मौक़ा देकर देखने में क्या दिक़्क़त है, आख़िर नीतीश कुमार तो 15 साल से मुख्यमंत्री हैं ही, हमलोगों को तो उनके कामकाज से कुछ नहीं मिला है.

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अगर पिछले 25 साल में देखें तो पहली बार 1995 में नीतीश कुमार की समता पार्टी ने लालू प्रसाद यादव के राज के जंगलराज को मुद्दा बनाया था, तब पटना हाईकोर्ट ने राज्य में बढ़ते अपहरण और फिरौती के मामलों पर टिप्पणी करते हुए राज्य की व्यवस्था को जंगलराज बताया था. इसी मुद्दे पर विपक्ष ने 2000 और 2005 का चुनाव लड़ा, 2005 में नीतीश कुमार के नेतृत्व में एनडीए की सरकार बनी.

2010 तक नीतीश कुमार बिहार में बदलाव और सुशासन का चेहरा बन चुके थे. राष्ट्रीय जनता दल ने ग़रीब-गुरबों के नाम पर वोट माँगे थे लेकिन कोई कामयाबी नहीं मिली. इसके बाद 2015 में नीतीश कुमार ने लालू प्रसाद यादव के साथ हाथ मिलाकर सत्ता में वापसी की. लेकिन बीजेपी ने जंगलराज को मुद्दा बनाया जो नाकाम साबित हो गया था.

ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या रोज़गार का मुद्दा जंगलराज की वापसी के मुद्दे पर भारी पड़ेगा.

इस बारे में महागठबंधन में शामिल सीपीआई माले की ओर से दीघा में चुनाव लड़ रहीं शशि यादव कहती हैं, "यह चुनाव युवाओं का चुनाव है. जो लोग जंगलराज को लेकर लोगों को डराने की कोशिश कर रहे हैं, उन लोगों के शासन से लालू प्रसाद यादव का राज कई गुना बेहतर था. उस दौर में हम लोग लालू जी का विरोध कर रहे थे फिर भी हमें ऐसा लगता है कि उस वक़्त ग़रीबों को मरने के लिए यूँ ही नहीं छोड़ा गया था जिस तरह से नीतीश कुमार ने छोड़ दिया."

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लेकिन अतीत के दाग़ जल्दी नहीं मिटते, लिहाज़ा जंगलराज का मुद्दा इस चुनाव में भी बना हुआ है. पटना के एक मतदाता ने बताया कि उस दौर में हमारी नई बाइक या कार दिनदहाड़े लूट ली जाती थी, वह डर इतनी जल्दी कैसे मिटेगा.

मणिकांत ठाकुर के मुताबिक़ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस तरह से इस मुद्दे को उठाया है, उससे ही एनडीए के लड़ाई में बने रहने की उम्मीद है.

जबकि कभी भारतीय जनता पार्टी के सांसद रहे कांग्रेस नेता कीर्ति आज़ाद कहते हैं, "तेजस्वी ने युवाओं के मुद्दे को लोगों के सामने रखा है, आप उनकी भीड़ में लोगों का उत्साह देखिए वहीं नीतीश कुमार और पीएम मोदी की सभाओं में भीड़ तक नहीं जुट रही है."

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दरअसल, लॉकडाउन के दौरान बिहार के हज़ारों युवाओं की नौकरियाँ छिन गई हैं, काम-धंधा चौपट हुआ और इसके चलते भी युवाओं में मौजूदा सरकार के प्रति उदासीनता का भाव दिखता है. मोटे अनुमान के तौर पर देश भर के अलग-अलग हिस्सों से क़रीब 40 लाख युवा लॉकडाउन के दौरान अपने घर लौटे हैं.

सेंटर फ़ॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनमी के मुताबिक़ लॉकडाउन के दौरान देश भर की तुलना में बिहार में बेरोज़गारी दोगुनी देखने को मिली है. इसके आँकड़ों के मुताबिक़ लॉकडाउन में देश भर में अप्रैल-मई, 2020 के दौरान बेरोज़गारी दर 24 प्रतिशत के आसपास देखने को मिली है जो बिहार में 46 प्रतिशत से ज़्यादा रही है. बेरोज़गारी का राष्ट्रीय औसत भी छह प्रतिशत के क़रीब है जबकि बिहार में अभी भी यह 12 प्रतिशत से ज़्यादा है.

नौकरी के अलावा तेजस्वी यादव लगातार युवाओं के मुद्दे को भी प्रमुखता दे रहे हैं, जिसमें कॉलेज और यूनिवर्सिटी की स्थापना के साथ-साथ व्यवसायिक आयोग और खेल आयोग का गठन करने जैसी घोषणाएँ शामिल हैं. उनके वादे का असर लोगों पर दिख रहा है और अगर यह वोट में तब्दील होता है तो बिहार की जातिगत समीकरणों में उलझी राजनीति में एक नई शुरुआत की उम्मीद की जा सकती है.

इस उम्मीद की एक वजह यह भी है कि बिहार में 18 से 29 साल के युवाओं की आबादी 24 प्रतिशत से ज़्यादा है और इन लोगों में अधिकांश ने केवल नीतीश कुमार के राज को ही देखा समझा है. यही वजह है कि बिहार में राम मंदिर और हिंदू-मुसलमान का मुद्दा लोगों के बीच से ग़ायब दिख रहा है.

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