बिहार: ना पैसा ना रोडमैप लोगों को कैसे नौकरी देगी सरकार

बिहार में उद्योग धंधों का नहीं पनपना वहां रोजगार की कमी का सबसे बड़ा कारण है

नई दिल्ली, 31 अगस्त। 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में जब लालू प्रसाद के बेटे और आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने सरकार बनने के बाद कैबिनेट की पहली बैठक में पहली कलम से दस लाख लोगों को नौकरी देने का वादा किया था, तब नीतीश कुमार ने उनका मखौल उड़ाते हुए कहा था, ''कुछ लोग जो जी में आता है, बोल देते हैं. दस लाख लोगों को अगर नौकरियां दी गईं तो उनके वेतन पर करीब 1.44 लाख करोड़ सालाना खर्च होंगे. इसके लिए पैसा कहां से आएगा, जिसके चक्कर में जेल गए वहां से आएगा कि आसमान से गिरेगा.''

हालांकि, अब जब दूसरी बार महागठबंधन के साथ उन्होंने सरकार बनाई तो बीते स्वतंत्रता दिवस के मौके पर ऐलान किया, "तेजस्वी यादव जैसे सहयोगी मिले हैं, दस क्या बीस लाख लोगों को नौकरी दी जाएगी. इनमें से दस लाख सरकारी नौकरी होगी और दस लाख दूसरी व्यवस्थाओं से दी जाएगी."

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नीतिश कुमार के सुर तो समय के साथ बदल गए, लेकिन यक्ष प्रश्न यह है कि नौकरी देने का रोडमैप क्या है और इसके लिए पैसा कहां से आएगा? देश के गरीब राज्यों में एक ओर आमदनी के मामले में पिछड़े राज्य बिहार में puex 33 प्रतिशत आबादी गरीबी रेखा के नीचे रहती है, वहां आखिरकार यह कैसे संभव हो सकेगा.

तेजस्वी यादव ने लाखों लोगों को नौकरी देने का भरोसा दिया है

सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) की एक रिपोर्ट के अनुसार 2021 में सितंबर से दिसंबर के बीच बिहार में बेरोजगारी की दर 13.3 प्रतिशत थी. राज्य में करीब 39 लाख युवाओं को नौकरी की तलाश है. वहीं, जुलाई 2022 के आंकड़ों के अनुसार बेरोजगारी की दर बिहार में 18.8 फीसदी हो गई है, जबकि राष्ट्रीय औसत 7.7 प्रतिशत ही है.

श्रम मंत्रालय के ई-श्रम पोर्टल पर पंजीयन की संख्या को देखें तो बिहार में बीते 15 अगस्त तक इस पोर्टल पर 2.83 करोड़ श्रमिकों का रजिस्ट्रेशन किया जा चुका है. इसी तरह एनसीएस (नेशनल करियर सर्विस) के पोर्टल पर बीते 30 अप्रैल तक प्रदेश के 14,15,914 बेरोजगारों ने रजिस्ट्रेशन कराया है.

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पत्रकार सुधीर के. सिंह कहते हैं, ''इन्फ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में खासा काम भले ही हुआ हो, लेकिन 17 सालों से बिहार को साधने वाले नीतीश कुमार लोगों को रोजगार देने में फिसड्डी साबित हुए हैं. स्किल मैपिंग जैसी बड़ी-बड़ी बातें खूब हुईं. धरातल पर क्या हुआ, सबको पता है. कुछ हुआ होता तो शायद बिहार से बाहर जाने वाली ट्रेनों में भीड़ अवश्य ही कुछ कम हो गई होती.''

बिहार में साल दर साल आने वाली बाढ़ और सूखे ने खेती का बहुत नुकसान किया है

बीजेपी-जेडीयू की सरकार के कार्यकाल में उद्योग मंत्री रहे शाहनवाज हुसैन के प्रयासों से पूर्णिया में देश का पहला ग्रीनफील्ड इथेनॉल प्लांट खुला और 16 से अधिक ऐसी इकाइयों की स्थापना होनी है. फूड प्रोसेसिंग, लेदर, टेक्सटाइल व आईटी सेक्टर में भी कई छोटे-बड़े उद्योगों की स्थापना की जानी है. हालांकि इनसे कितनी जल्दी और कितनी संख्या में रोजगार सृजन हो सकेगा, बदली परिस्थितियों में यह कहना मुश्किल है.

हजारों करोड़ रुपयों की जरूरत

रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार बिहार देश के उन चार राज्यों में है, जहां 2020-21 में राजकोषीय घाटा अन्य राज्यों के मुकाबले 20 प्रतिशत अधिक है. वहीं, कर्ज जीडीपी का एक तिहाई से ज्यादा है. घटता राजस्व व बढ़ती आबादी अर्थव्यवस्था के लिए पहले से ही चुनौती बने हुए हैं. बजट का आकार लगातार बढ़ता जा रहा है. 2022-23 में राज्य का वार्षिक बजट 2,37,691 करोड़ का हो गया है. आंकड़ों के मुताबिक, इसमें से करीब 41,000 करोड़ रुपया राज्य सरकार के कर्मचारियों के वेतन व पेंशन पर खर्च हो जाता है.

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी कह रहे हैं कि रोजगार देंगे मगर कहां से इसका कोई ब्यौरा नहीं है

आर्थिक विश्लेषक डॉ. एस.के. पांडा कहते हैं, '' तेजस्वी के वादे के अनुसार दस लाख लोगों को भी यदि नौकरी दी गई तो प्रतिवर्ष कम से कम अतिरिक्त दस हजार करोड़ रुपये की आवश्यकता होगी. शराबबंदी के कारण सरकार की आय का एक प्रमुख स्त्रोत बंद हो चुका है. उद्योग-धंधे के नाम पर कुछ खास है नहीं. जाहिर है, केंद्र सरकार पर निर्भरता और बढ़ेगी. बदली राजनीतिक परिस्थिति में केंद्र से सहयोग की गुंजाइश शायद कम ही रह जाएगी.''

स्वरोजगार के अवसर

युवाओं को नौकरी महागठबंधन सरकार की कैबिनेट की बैठक का एजेंडा तो जरूर होता है, किंतु अभी तक इस दिशा में कोई घोषणा नहीं की जा सकी है. हालांकि, ऐसा भी नहीं है कि सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी है. शिक्षा, स्वास्थ्य, ऊर्जा, पुलिस-प्रशासन व ग्रामीण विकास जैसे कई विभागों में सरकार का लक्ष्य दिसंबर, 2022 तक कम से तीन से चार लाख लोगों को नौकरी देने का है. नई सरकार के गठन के दिन ही विभागों से रिक्तियां मंगाने का निर्देश जारी कर दिया गया था. जाहिर है, सरकारी योजनाओं के सहारे तो निश्चित संख्या में ही रोजगार सृजन हो सकेगा. इससे बेरोजगारी का उन्मूलन या पलायन पर रोक संभव नहीं हो सकेगा.

डॉ. पांडा कहते हैं, ''यह कठिन तो जरूर है, किंतु अगर एक रोडमैप के तहत इस पर काम किया जाएगा तो यह असंभव भी नहीं है. दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति के साथ गुणवत्तापूर्ण स्व-रोजगार के अवसर पैदा करने होंगे. निवेशकों को लाने के जो प्रयास पिछली सरकार द्वारा किए गए थे, उस पर गंभीरता से अमल करना होगा.''

सेना में भर्ती की नई योजना को लेकर भी राज्य में प्रबल विरोध हुआ था

पांडा ने यह भी कहा कि कृषि व उससे संबंधित सेक्टर में एक जिला-एक उत्पाद पर काम करना होगा. खेती को बढ़ावा देने के साथ-साथ कृषि आधारित फूड प्रोसेसिंग जैसी इकाइयों की स्थापना पर जोर देने की जरूरत है. जूट, कागज, चीनी जैसे पुराने उद्योग जो मृतप्राय हो गए हैं, उन्हें फिर से चालू करना होगा. स्किल मैपिंग जैसी व्यवस्था से कुशल व अकुशल कामगारों को रोजगार मुहैया कराने की दिशा में गंभीरता से काम करना पड़ेगा.एमएसएमई सेक्टर को बढ़ावा देने के लिए बैंकों को भी अपना रवैया उदार करना होगा.

सरकारी नौकरी की दीवानगी

स्वरोजगार की दिशा में बड़ी बाधा राज्य के अधिसंख्य लोगों का झुकाव सरकारी नौकरी के प्रति होना है. समाजशास्त्र की व्याख्याता रश्मि शेखर कहती हैं, ''अपना समाज सामंतवादी रहा है. सरकारी नौकरी प्राप्त व्यक्ति को काफी सम्मान दिया जाता है. अभी भी समाज की यही मानसिकता है. इसलिए यहां सबको सरकारी नौकरी चाहिए.''

बढ़ती आबादी तथा अवसर की कमी के कारण मारामारी रहते हुए भी इसके लिए युवा बरसों प्रयासरत रहते हैं. सामाजिक संरचना भी ऐसी है कि सरकारी नौकरी प्राप्त युवाओं को तवज्जो मिलती है. आजकल के युवा अपने गांव-शहर में राजमिस्त्री, इलेक्ट्रिशियन, पलंबर जैसा स्किल बेस्ड काम भी नहीं करना चाहते हैं. वैसे शिक्षा और स्किल को विकसित कर पाने के अवसर भी कम ही हैं.

राज्य में पर्याप्त उद्योग-धंधे हैं नहीं कि प्राइवेट नौकरी मिल जाए और आर्थिक स्थिति इजाजत नहीं देती कि स्वरोजगार के विषय में सोचा भी जा सके तो सरकारी नौकरी के सिवा विकल्प क्या रह जाता हैं.

Source: DW

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