विंध्य के लाल पदृमधर को गोलियों से भून दिया था गोरों ने, इलाहाबाद में दर्ज है क्रांति के इस नायक की गाथा
सतना 12 अगस्त। जिले के कृपालपुर नामक गांव में जन्मे लाला पद्मधर सिंह बघेल डॉ. बनकर जनता की सेवा करना चाहते थे। मगर, वह इस प्रयास में सफल नहीं हुए। उन्होंने बीएससी के लिए प्रयाग विश्वविद्यालय इलाहाबाद में दाखिला लिया। 12 अगस्त 1942 को इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्र लाल पद्मधर सिंह अंग्रेजों की गोली का सामना करते हुए शहीद हो गए थे। उनकी शहादत की दास्तान इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के कोने-कोने से लेकर यहां के रहने वाले लोगों के जेहन में हर 12 अगस्त को जीवंत हो उठती है। इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के छात्रसंघ भवन परिसर में शहीद लाल पद्मधर की मूर्ति स्थापित है, जो खुद ही उनकी शहादत और आजादी की दास्तान सुनाती हैं।

इतिहास ने न्याय नहीं किया
देशभर में आजादी का जश्न मनाने की तैयारी चल रही है। पूरे देश में राष्ट्रीय पर्व मनाने के लिए हर कोई इंतजार कर रहा है। लेकिन इन सबके बीच आजादी के वो दीवाने जिन्होंने अपने प्राणों की आहुति दे दी। आजादी के जंग की बात हो और इलाहाबाद का नाम लिए बिना इतिहास अधूरा रह जाएगा। आजादी की जंग कई ऐसे नाम है जिनका इतिहास हमें गौरव और सम्मान की अनुभूति कराता है। लेकिन कुछ ऐसे भी नाम शामिल है जिनके साथ इतिहास ने न्याय नहीं किया।

युवा क्रांति के नायक के तौर पर इतिहास में दर्ज
देश में जब भी युवाओं की बात होगी युवा क्रांति की बात होगी तो उसमें लाल पद्मधर सिंह का नाम सुनहरे अक्षरों और इतिहास के पन्नों में दर्ज होगा। देश के चिंतक और विश्वविद्यालय के पूर्व अध्यक्ष रामाधीर सिंह कहते हैं की 12 अगस्त 1942 इलाहाबाद विश्वविद्यालय की गौरवशाली परंपरा को बिना याद भारत के छात्र जगत का इतिहास भी अर्ध हीन होगा। 1942 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के विशेष अधिवेशन में महात्मा गांधी ने 8-9 अगस्त रात में अंग्रेजों भारत छोड़ो का आह्नान मुंबई में किया। करो या मरो का नारा दिया। इस आह्नवान के 17 वर्ष पहले भी 9 अगस्त 1925 को ही उत्तर प्रदेश के लखनऊ शहर के पास काकोरी कांड हो चुका था। जिसमें अमर शहीद रामप्रसाद बिस्मिल अशफाक उल्ला खानराजेंद्र आला हरी और ठाकुर रोशन सिंह फांसी के फंदे को वरमाला की तरह गले लगा चुके थे।

महात्मा गांधी के आह्वान पर किया आंदोलन
महात्मा गांधी के आह्नान पर 12 अगस्त 1942 की। महात्मा गांधी ने मुंबई से भारत छोड़ो आंदोलन की घोषणा कर दी थी। मुंबई दिल्ली, पटना वाराणसी और फिर इलाहाबाद तक आंदोलन चिंगारी पहुंच चुकी थी अंग्रेजों भारत छोड़ो का नारा बुलंद हो रहा था। गांधी जी की अगुवाई में देशभर के युवा बढ़-चढ़कर के हिस्सा ले रहे थे। उस आंदोलन में इलाहाबाद विश्वविद्यालय की युवाओं ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इलाहाबाद में आंदोलन की शुरुआत 11 अगस्त को हुई।अंग्रेजो के खिलाफ शहर भर में जुलूस निकाले गए और शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन हुए जिसमें इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्रों ने मुख्य भूमिका निभाई।

मेरे सीने पर गोली चलाओ
विश्वविद्यालय के छात्रों ने 12 अगस्त को कलेक्ट्रेट को अंग्रेजों से मुक्त कराने और तिरंगा फहराने की योजना बनाई गई। लेकिन इसकी भनक अंग्रेजी हुकूमत को लगते ही कलेक्ट्रेट तक आने वाले रास्ते पर पुलिस तैनात कर दी गई। 12 अगस्त को 11:00 बजे इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्रसंघ भवन से छात्र छात्राओं का जुलूस तिरंगा लेकर कलेक्ट्रेट के लिए रवाना हुए। इसका नेतृत्व इलाहाबाद विश्वविद्यालय की छात्राएं कर रही थी।ब्रिटिश सैनिकों ने भीड़ को रोक लिया और वापस जाने की चेतावनी देते हुए छात्राओं पर बंदूक तान दी। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्र छात्राएं वापस नहीं लौटी तो फिरंगी फौज ने हवाई फायरिंग कर दी। इससे भगदड़ मच गई। इस भीड़ में शामिल नौजवान लाल पद्मधर सिंह ने सामने आकर सिपाहियों को चुनौती दी लड़कियों पर क्यों गोरी तन रहे हो मेरे सीने पर गोली चलाओ। इसके बाद लाल पद्मधर सिंह तिरंगा हाथ में लेकर कलेक्ट्रेट की ओर बढ़े ही थे कि अंग्रेज सिपाही की गोली से उन्हें छलनी कर दिया।

कृपालपुर घराने से ताल्लुक
विश्वविद्यालय के उनके साथी उन्हें अस्पताल तक पहुंचाते उसके पहले ही भारत मां के लाल की सांसे थम गई। यह खबर फैलते ही पूरे शहर में कोहराम मच गया और उसी दिन लाल शहीद लाल पद्मधर हो गए और भारत मां के लिए अपनी आहुति दे दी। लेकिन इतिहास के पन्ने में उनके साथ न्याय नहीं हुआ। लाल पद्मधर सिंह मध्य प्रदेश के सतना रीवा के माधवगढ़ घर आने से थे।विश्वविद्यालय के छात्र नेता अब तक छात्र संघ के घटित होने पर लाल पद्मधर की सौगंध खाते हैं।कृपालपुर में नगर निगम के द्वारा पार्क बनाकर वहां पर शहीद लाल पद्मधर सिंह की प्रतिमा स्थापित की गई है। जहां पर हर वर्ष 12 अगस्त को उनके बलिदान को याद किया जाता है।

शहीद दिवस पर आयोजन
आजादी के बाद से आज तक अमर शहीद लाल पद्मधर सिंह के नाम से 12 अगस्त को शहीद दिवस के रूप में सतना रीवा सहित कई जगह यहाँ तक इलाहाबाद में भी मनाया जाता है।
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