Get Updates
Get notified of breaking news, exclusive insights, and must-see stories!

MP News: मध्य प्रदेश में ओबीसी आरक्षण विवाद, सुप्रीम कोर्ट की फटकार, 13% होल्ड पदों पर 6 साल से क्या किया?

मध्य प्रदेश में सरकारी भर्तियों में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए 13% पदों को होल्ड रखने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को राज्य सरकार को कड़ी फटकार लगाई। कोर्ट ने सवाल उठाया, "मध्यप्रदेश सरकार सो रही है क्या? 6 साल से 13% ओबीसी होल्ड पदों पर क्या किया गया?" यह मामला मध्यप्रदेश लोक सेवा आयोग (MPPSC) के चयनित अभ्यर्थियों की नियुक्तियों से जुड़ा है, जो लंबे समय से अटका हुआ है।

सुप्रीम कोर्ट ने इसे अति महत्वपूर्ण मानते हुए 23 सितंबर 2025 को अंतिम सुनवाई के लिए "टॉप ऑफ द बोर्ड" में लिस्टेड किया है। इस घटनाक्रम ने मध्यप्रदेश में ओबीसी आरक्षण के मुद्दे को फिर से सुर्खियों में ला दिया है, और यह सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर एक बड़ा मुद्दा बन गया है।

OBC reservation dispute in MP Supreme Court reprimands 13 posts held for 6 years

सुप्रीम कोर्ट की तीखी टिप्पणी

मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आर महादेवन की बेंच ने मध्यप्रदेश सरकार के रवैये पर नाराजगी जताई। ओबीसी महासभा के वकील वरुण ठाकुर ने बताया कि कोर्ट ने सरकार से सवाल किया, "6 साल से 13% होल्ड पदों पर क्या कार्रवाई की गई? सरकार सो रही है क्या?" कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि मध्यप्रदेश के जनप्रतिनिधि बार-बार 27% ओबीसी आरक्षण देने की प्रतिबद्धता जताते हैं, लेकिन उनके वकील सुनवाई के दौरान समय पर उपस्थित नहीं होते। कोर्ट ने कहा, "जब ऑर्डर डिक्टेट होने लगता है, तब वकील पहुंचते हैं, और फिर नेता कहते हैं कि स्टे की वजह से प्रशासनिक परेशानियां हो रही हैं।"

सुप्रीम कोर्ट में इस मामले में मध्यप्रदेश लोक सेवा आयोग (MPPSC) के चयनित अभ्यर्थियों की ओर से वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने पक्ष रखा। याचिकाकर्ताओं ने मांग की कि 2019 में पारित 27% ओबीसी आरक्षण के कानून को लागू किया जाए और 13% होल्ड पदों को तुरंत अनहोल्ड किया जाए। कोर्ट ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए इसे 23 सितंबर को प्राथमिकता के आधार पर सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया, जो 13% होल्ड पदों से संबंधित सभी याचिकाओं की अंतिम सुनवाई होगी।

मामला क्या है?

मध्य प्रदेश में ओबीसी आरक्षण का मुद्दा 2019 से चर्चा में है। तत्कालीन कमलनाथ सरकार ने मध्यप्रदेश लोक सेवा (अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2019 के तहत ओबीसी आरक्षण को 14% से बढ़ाकर 27% करने का बिल पास किया था। यह निर्णय राज्य की 51% ओबीसी आबादी को ध्यान में रखकर लिया गया था। हालांकि, मार्च 2019 में मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने इस बढ़े हुए 13% आरक्षण पर अंतरिम रोक लगा दी, जिसके कारण कई भर्ती प्रक्रियाएं रुक गईं। हाईकोर्ट ने निर्देश दिया था कि भर्तियों में 14% ओबीसी आरक्षण लागू रहे और अतिरिक्त 13% पदों को होल्ड रखा जाए, जब तक अंतिम फैसला नहीं आता।

2022 में मध्यप्रदेश सरकार ने 87:13 फॉर्मूले को अपनाया, जिसमें 87% पदों पर भर्तियां जारी रहीं और 13% पदों को होल्ड रखा गया। 29 सितंबर 2022 को सरकार ने एक नोटिफिकेशन जारी किया, जिसे याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। सुप्रीम कोर्ट ने इस नोटिफिकेशन पर सवाल उठाते हुए पूछा, "यह नोटिफिकेशन कानून के खिलाफ क्यों जारी किया गया?" सरकार ने कोर्ट में माना कि यह नोटिफिकेशन गलत तरीके से जारी हुआ था और इसे अनहोल्ड करने के पक्ष में है।

सरकार का पक्ष और छत्तीसगढ़ का उदाहरण

मध्यप्रदेश सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष रखते हुए कहा कि वह ओबीसी वर्ग को 27% आरक्षण देने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। 22 जुलाई 2025 को हुई सुनवाई में सरकार ने राहत की मांग की थी। सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि जैसे सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ में 58% आरक्षण को मान्यता दी है, वैसे ही मध्यप्रदेश को भी राहत दी जाए ताकि भर्ती प्रक्रिया पूरी हो सके। सरकार ने तर्क दिया कि हाईकोर्ट के अंतरिम आदेशों के कारण 13% पदों को होल्ड रखा गया है, और सुप्रीम कोर्ट के अंतिम फैसले के बाद ही इन पर नियुक्तियां संभव होंगी।

हालांकि, अनारक्षित वर्ग के याचिकाकर्ताओं ने इसकी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के मामलों में अंतर है, क्योंकि मध्यप्रदेश में ओबीसी आरक्षण को 14% से बढ़ाकर 27% किया गया है, जबकि छत्तीसगढ़ में अनुसूचित जनजाति (एसटी) की अधिक आबादी के कारण आरक्षण पहले से ही अधिक था। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर बिना कोई अंतरिम आदेश दिए सुनवाई को आगे बढ़ाया।

ओबीसी महासभा और अभ्यर्थियों की मांग

ओबीसी महासभा और चयनित अभ्यर्थियों ने सुप्रीम कोर्ट में जोरदार दलील दी कि मध्यप्रदेश की 51% आबादी ओबीसी है, और 27% आरक्षण लागू करने में कोई कानूनी अड़चन नहीं है। वकील वरुण ठाकुर ने कहा कि विभिन्न विभागों में भर्ती के लिए विज्ञापन 27% आरक्षण के आधार पर जारी किए गए थे, लेकिन 13% पदों को होल्ड रखने के कारण चयनित उम्मीदवारों को नियुक्तियां नहीं मिल रही हैं। उन्होंने छत्तीसगढ़ का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां 58% आरक्षण को सुप्रीम कोर्ट ने मंजूरी दी है, इसलिए मध्यप्रदेश में भी 27% ओबीसी आरक्षण लागू होना चाहिए।

50% आरक्षण की सीमा का सवाल

सुप्रीम कोर्ट ने 1992 के इंद्रा साहनी बनाम भारत सरकार मामले में यह स्पष्ट किया था कि किसी भी राज्य में कुल आरक्षण 50% की सीमा को पार नहीं करना चाहिए, सिवाय असाधारण परिस्थितियों के। मध्यप्रदेश में 27% ओबीसी आरक्षण लागू करने से कुल आरक्षण 73% (16% एससी, 20% एसटी, 10% ईडब्ल्यूएस, 27% ओबीसी) हो जाता है, जो इस सीमा का उल्लंघन करता है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि यह वृद्धि संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 16, और 19(1)(g) का उल्लंघन करती है। दूसरी ओर, ओबीसी महासभा का कहना है कि मध्यप्रदेश की 51% आबादी को देखते हुए यह आरक्षण उचित है।

राजनीतिक प्रतिक्रिया और विवाद

इस मामले ने मध्यप्रदेश में राजनीतिक हलचल मचा दी है। विपक्षी नेता उमंग सिंघार ने बीजेपी सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा, "सुप्रीम कोर्ट में यह साबित हो गया है कि मध्यप्रदेश सरकार ओबीसी वर्ग को उसका हक देने में असंवेदनशील है। सरकार लगातार टालमटोल कर रही है।" उन्होंने सवाल उठाया कि आधी से अधिक आबादी को उसका हक क्यों नहीं मिल रहा? वहीं, मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने विधानसभा में कहा कि उनकी सरकार ओबीसी को 27% आरक्षण देने के लिए प्रतिबद्ध है और कोर्ट में मजबूती से पक्ष रखेगी।

भविष्य में क्या?

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में अगली सुनवाई 23 सितंबर 2025 को निर्धारित की है, जो सभी संबंधित याचिकाओं की अंतिम सुनवाई होगी। अगर कोर्ट मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के स्टे को हटाता है, तो 27% ओबीसी आरक्षण लागू हो सकता है, जिससे हजारों चयनित अभ्यर्थियों को नियुक्तियां मिलेंगी। दूसरी ओर, अगर कोर्ट 50% आरक्षण की सीमा को बरकरार रखता है, तो सरकार को इस नीति पर पुनर्विचार करना पड़ सकता है।

यह मामला न केवल मध्य प्रदेश की ओबीसी आबादी के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि यह देशभर में आरक्षण नीतियों और 50% सीमा के पालन पर भी व्यापक प्रभाव डाल सकता है। फिलहाल, सभी की नजरें सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर टिकी हैं, जो मध्यप्रदेश में भर्ती प्रक्रियाओं और सामाजिक न्याय की दिशा तय करेगा।

More From
Prev
Next
Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+