दूषित पानी पर हाईकोर्ट सख्त: बोले—स्वच्छ पेयजल मौलिक अधिकार, मौतों पर सरकार का जवाब असंवेदनशील
MP High court indore: देश का सबसे स्वच्छ शहर कहलाने वाला इंदौर इन दिनों एक गंभीर सवाल के कटघरे में खड़ा है-क्या नागरिकों को साफ पानी देने में सिस्टम पूरी तरह नाकाम हो गया? इसी सवाल पर मंगलवार, 6 जनवरी को मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच ने तीखी टिप्पणी करते हुए राज्य सरकार और नगर निगम को कड़े शब्दों में फटकार लगाई।
दूषित पेयजल से जुड़ी 4 से 5 याचिकाओं की एक साथ सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने साफ कहा कि स्वच्छ पेयजल केवल सुविधा नहीं, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत नागरिकों का मौलिक अधिकार है। अदालत ने स्पष्ट चेतावनी दी कि यदि भविष्य में जरूरत पड़ी तो दोषी अधिकारियों पर सिविल ही नहीं, आपराधिक (क्रिमिनल) जिम्मेदारी भी तय की जाएगी।

"स्वच्छ शहर" की छवि को गहरा नुकसान
हाईकोर्ट ने कहा कि यह मामला सिर्फ कुछ इलाकों तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे इंदौर की राष्ट्रीय छवि को गहरा आघात पहुंचा है। कोर्ट ने टिप्पणी की- "जो शहर स्वच्छता में देशभर के लिए उदाहरण था, वह आज दूषित पानी के कारण पूरे भारत में चर्चा का विषय बन गया है।"
मौतों पर सरकार का जवाब बताया असंवेदनशील
अदालत ने दूषित पानी से हुई मौतों पर सरकार के जवाब को "असंवेदनशील" करार देते हुए कहा कि यदि पीड़ित परिवारों को पर्याप्त मुआवजा नहीं मिला है, तो इस पर भी कोर्ट उचित आदेश दे सकता है। कोर्ट ने साफ किया कि इस मामले को हल्के में लेने की कोई गुंजाइश नहीं है।
मरीजों को मुफ्त इलाज के निर्देश
हाईकोर्ट ने निर्देश दिए कि दूषित पानी से प्रभावित सभी मरीजों को निजी और सरकारी अस्पतालों में मुफ्त इलाज उपलब्ध कराया जाए। साथ ही, अब तक हुई मौतों को लेकर विस्तृत रिपोर्ट तलब की गई है। अगली सुनवाई 15 जनवरी को होगी, जिसमें मुख्य सचिव को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पेश होने के निर्देश दिए गए हैं।
अब तक की भयावह तस्वीर
- दूषित पानी से फैली बीमारी का आंकड़ा लगातार चिंता बढ़ा रहा है-
- अब तक 17 लोगों की मौत
- 110 मरीज फिलहाल अस्पतालों में भर्ती
- कुल 421 मरीज भर्ती हो चुके, जिनमें से 311 डिस्चार्ज
15 मरीज ICU में
- उल्टी-दस्त के 38 नए मामले, 6 मरीज अरबिंदो अस्पताल रेफर
- "शिकायतों पर समय रहते ध्यान दिया होता तो मौतें नहीं होतीं"
याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट को बताया कि 31 दिसंबर 2025 को ही हाईकोर्ट ने स्वच्छ पेयजल आपूर्ति सुनिश्चित करने के निर्देश दिए थे, इसके बावजूद प्रभावित इलाकों में दूषित पानी की सप्लाई जारी रही।
याचिकाकर्ता पक्ष के वकील ने कहा- "अगर प्रशासन ने पहले की गई शिकायतों को गंभीरता से लिया होता, तो आज यह नौबत नहीं आती।"
2017-18 की रिपोर्ट भी नजरअंदाज
कोर्ट को बताया गया कि- 2017-18 में लिए गए 60 पानी के सैंपलों में से 59 पीने योग्य नहीं पाए गए। यह रिपोर्ट मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की थी। इसके बावजूद कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। इतना ही नहीं, 2022 में महापौर द्वारा नई पाइपलाइन बिछाने का प्रस्ताव पारित हुआ था, लेकिन फंड जारी नहीं होने से आज तक काम शुरू नहीं हो सका।
हाईकोर्ट ने मांगी नई स्टेटस रिपोर्ट
अदालत ने राज्य सरकार और नगर निगम को निर्देश दिए हैं कि वे-
- विस्तृत जवाब दाखिल करें
- नई स्टेटस रिपोर्ट पेश करें
- कोर्ट ने इस पूरे मामले को 7 श्रेणियों में विभाजित किया है-
- प्रभावित लोगों के लिए तात्कालिक और आपात निर्देश
- रोकथाम और सुधारात्मक उपाय
- जिम्मेदारी तय करना
- अनुशासनात्मक कार्रवाई
- मुआवजा
- स्थानीय निकायों को निर्देश
- जन-जागरूकता और पारदर्शिता
भागीरथपुरा बना छावनी, कांग्रेस का सियासी हमला
इधर, दोपहर करीब 1 बजे प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी और नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार के नेतृत्व में कांग्रेस प्रतिनिधिमंडल भागीरथपुरा पहुंचा।
- इलाका पहले से ही पुलिस छावनी में तब्दील था-
- वज्र वाहन तैनात
- सभी रास्तों पर बैरिकेडिंग
- कांग्रेस नेताओं और पुलिस के बीच तीखी बहस
- बाद में दूसरे रास्ते से कांग्रेसी अंदर पहुंचे और मृतकों अशोक लाल पवार, जीवन लाल और गीता बाई के परिजनों से मुलाकात की।
मीडिया से बातचीत में जीतू पटवारी ने कहा- "इंदौर का प्रभारी मंत्री होने के नाते मुख्यमंत्री मोहन यादव, मंत्री कैलाश विजयवर्गीय और महापौर पुष्यमित्र भार्गव को नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा देना चाहिए।"
सवाल अब सिर्फ पानी का नहीं, जवाबदेही का है
हाईकोर्ट की सख्ती ने साफ कर दिया है कि यह मामला सिर्फ प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है। अब देखना होगा कि सरकार और नगर निगम अगली सुनवाई तक क्या ठोस कदम उठाते हैं-या फिर अदालत को कड़े फैसले लेने पड़ते हैं।
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