MP News: शिवपुरी में रिश्वत का रंग, नगर परिषद के कर्मचारी 30 हजार लेते रंगे हाथों पकड़े गए!
मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले के पिछोर नगर परिषद में गुरुवार को उस वक्त हड़कंप मच गया, जब लोकायुक्त की टीम ने एक सनसनीखेज कार्रवाई को अंजाम दिया। नगर परिषद के दो कर्मचारी, टाइमकीपर रामबाबू त्रिपाठी और लेखपाल दीपक सिंह बनाफर, 30 हजार रुपए की रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों धर लिए गए।
यह कार्रवाई न केवल नगर परिषद की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाती है, बल्कि भ्रष्टाचार के खिलाफ लोकायुक्त की सख्ती को भी दर्शाती है। आइए, जानते हैं इस पूरे मामले की रोचक कहानी।

टेंडर, बिल और रिश्वत का खेल
कहानी की शुरुआत होती है तीन महीने पहले, जब पिछोर नगर परिषद में कंप्यूटर प्रिंटर के लिए एक टेंडर पास हुआ था। इस टेंडर के तहत उपकरण लगाने का काम विशाल केवट ने किया, जो कि भूमि ट्रांसकनेक्ट में इंजीनियर हैं। काम पूरा होने के बाद विशाल का 4,77,000 रुपए का बिल भुगतान होना था। लेकिन, जैसा कि अक्सर सरकारी दफ्तरों में देखने को मिलता है, यहाँ भी भुगतान के लिए रिश्वत की मांग का सिलसिला शुरू हो गया।
पिछोर के सीएमओ ने बिल पास करने के लिए 22% यानी पूरे 1 लाख रुपए की रिश्वत मांगी। विशाल के लिए यह मांग किसी सदमे से कम नहीं थी। लेकिन, बातचीत के बाद लेखपाल दीपक सिंह बनाफर के जरिए यह सौदा 15% यानी 60 हजार रुपए में तय हुआ। विशाल ने इस भ्रष्टाचार को बर्दाश्त करने के बजाय, लोकायुक्त ग्वालियर से संपर्क करने का फैसला किया।
लोकायुक्त का जाल: रंगे हाथों पकड़े गए कर्मचारी
विशाल ने 1 सितंबर 2025 को लोकायुक्त ग्वालियर के एसपी को इस पूरे मामले की शिकायत दर्ज कराई। लोकायुक्त ने शिकायत का सत्यापन किया और एक सुनियोजित योजना के तहत कार्रवाई की तैयारी शुरू की। तय हुआ कि विशाल पहले 60 हजार में से 30 हजार रुपए की रिश्वत देंगे। गुरुवार को जैसे ही विशाल ने लेखपाल दीपक सिंह के कहने पर टाइमकीपर रामबाबू त्रिपाठी को 30 हजार रुपए सौंपे, लोकायुक्त की टीम ने बिजली की तेजी से कार्रवाई की। दोनों कर्मचारी रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों पकड़े गए। यह नजारा देखकर वहां मौजूद लोग हैरान रह गए।
लोकायुक्त डीएसपी विनोद कुशवाहा ने बताया कि शिकायत के सत्यापन के बाद यह कार्रवाई की गई। दोनों कर्मचारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत एफआईआर दर्ज कर ली गई है। साथ ही, मामले की गहन जांच शुरू कर दी गई है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि इस रिश्वतखोरी में और कौन-कौन शामिल हो सकता है।
भ्रष्टाचार पर लोकायुक्त की पैनी नजर
यह कार्रवाई लोकायुक्त की सक्रियता का एक और उदाहरण है। पिछले कुछ समय से मध्य प्रदेश में भ्रष्टाचार के खिलाफ लोकायुक्त की टीमें लगातार कार्रवाई कर रही हैं। इस तरह की कार्रवाइयां न केवल भ्रष्ट अधिकारियों और कर्मचारियों में खौफ पैदा करती हैं, बल्कि आम लोगों में भी यह विश्वास जगाती हैं कि भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने का नतीजा जरूर मिलता है।
विशाल केवट जैसे लोगों की हिम्मत की वजह से ही इस तरह के मामले सामने आते हैं। विशाल ने न केवल रिश्वत देने से इनकार किया, बल्कि लोकायुक्त से संपर्क करके भ्रष्टाचार के इस खेल को बेनकाब किया। उनकी इस पहल से अन्य लोगों को भी प्रेरणा मिलेगी कि वे भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाएं।
आगे क्या?
लोकायुक्त की टीम अब इस मामले में गहराई से जांच कर रही है। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या इस मामले में सीएमओ या अन्य बड़े अधिकारी भी जांच के दायरे में आते हैं। साथ ही, यह घटना नगर परिषद की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े करती है। आखिर क्यों एक सामान्य बिल भुगतान के लिए इतनी बड़ी रिश्वत की मांग की गई? क्या यह केवल एक कर्मचारी की करतूत थी, या फिर यह एक बड़े रिश्वतखोरी के नेटवर्क का हिस्सा है? इन सवालों के जवाब जांच के बाद ही मिल पाएंगे।












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