बीना विधायक निर्मला सप्रे को हाईकोर्ट का नोटिस, 16 महीने बाद सभापति पर सवाल– उमंग सिंघार की याचिका, जानिए

मध्य प्रदेश विधानसभा में दल-बदल कानून की कसौटी पर एक बार फिर बीना सीट की विधायक निर्मला सप्रे का मामला गरमाया है। माननीय उच्च न्यायालय की मुख्यपीठ जबलपुर ने गुरुवार (6 नवंबर 2025) को नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार की याचिका पर सुनवाई करते हुए विधानसभा सभापति नरेंद्र सिंह तोमर और विधायक निर्मला सप्रे को नोटिस जारी कर दिया।

सभापति पर 16 महीने से याचिका पर फैसला न लेने का सवाल उठा, जिस पर मुख्य न्यायाधीश संजीव सच्चदेवा ने महाधिवक्ता प्रशांत सिंह से पूछा - "याचिका पर निर्णय क्यों नहीं लिया गया?" यह नोटिस अनुच्छेद 191(2) और दसवीं अनुसूची के तहत दल-बदल याचिका का निराकरण न करने पर आधारित है। सुप्रीम कोर्ट के 'पाडी कौशिक रेड्डी vs तेलंगाना राज्य' और 'केशम vs मणिपुर राज्य' के फैसलों का हवाला देते हुए कोर्ट ने स्पष्ट किया कि याचिका पर 3 महीने में फैसला अनिवार्य है।

High Court notice to Bina MLA Nirmala Sapre questioning Speaker after 16 months petition by Umang Singhar

उमंग सिंघार की ओर से पैरवी करने वाले अधिवक्ता विभोर खंडेलवाल और जयेश गुरनानी ने तर्क दिया कि सभापति पक्षपाती हैं। अगली सुनवाई 18 नवंबर को रखी गई है। यह मामला न केवल बीना सीट पर उपचुनाव की संभावना जगाएगा, बल्कि मध्य प्रदेश में दल-बदल की राजनीति पर सवाल खड़े करेगा। आइए, जानते हैं इस पूरे विवाद की पूरी दास्तां - दल-बदल से हाईकोर्ट तक, और राजनीतिक प्रभाव।

दल-बदल का विवाद: निर्मला सप्रे का BJP में शामिल होना, कांग्रेस का विरोध

निर्मला सप्रे (उम्र 47 वर्ष), बीना विधानसभा क्षेत्र (सागर जिला) से 2023 विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर चुनी गईं। वे अनुसूचित जाति (SC) से हैं और परिवार की पहली महिला विधायक बनीं। लेकिन 5 मई 2024 को लोकसभा चुनाव के बीच उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की मौजूदगी में सागर के राहतगढ़ में भाजपा का दामन थाम लिया। सप्रे ने कहा, "कांग्रेस में रहना असंभव था, भाजपा में सेवा का मौका मिला।" भाजपा ने उनका स्वागत किया, और वे पार्टी की बैठकों में सक्रिय रहीं। लेकिन सप्रे ने विधानसभा सदस्यता से इस्तीफा नहीं दिया, जिससे वे तकनीकी रूप से कांग्रेस विधायक बनी रहीं।

इस पर कांग्रेस ने तुरंत विरोध जताया। नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने 5 जुलाई 2024 को सभापति नरेंद्र सिंह तोमर के समक्ष दल-बदल याचिका दाखिल की। याचिका में कहा गया कि सप्रे ने कांग्रेस की सदस्यता स्वेच्छा से त्याग दी, जो दसवीं अनुसूची पैरा 2(1)(क) के तहत अयोग्यता का आधार है। अनुच्छेद 191(2) के अनुसार, दल-बदल पर सदस्यता रद्द होनी चाहिए। सिंघार ने साक्ष्य के रूप में सप्रे की प्रेस कॉन्फ्रेंस, सोशल मीडिया पोस्ट और भाजपा नेताओं के स्वागत ट्वीट्स संलग्न किए। लेकिन सभापति ने 16 महीने बाद भी फैसला नहीं लिया, जिससे सिंघार ने हाईकोर्ट की शरण ली।

हाईकोर्ट में सुनवाई: सभापति पर सवाल, नोटिस जारी - 18 नवंबर को अगली तारीख

माननीय उच्च न्यायालय की मुख्यपीठ जबलूर में मुख्य न्यायाधीश संजीव सच्चदेवा और न्यायमूर्ति विनय सराफ की युगलपीठ ने याचिका पर सुनवाई की। सिंघार की ओर से अधिवक्ता विभोर खंडेलवाल और जयेश गुरनानी ने तर्क दिया, "सभापति पक्षपाती हैं। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि दल-बदल याचिका पर 3 महीने में फैसला अनिवार्य है। 16 महीने बीत चुके, यह संवैधानिक उल्लंघन है।" उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के 'पाडी कौशिक रेड्डी vs तेलंगाना राज्य' (2023) और 'केशम vs मणिपुर राज्य' (2020) के फैसलों का हवाला दिया, जहां 3 महीने की समयसीमा तय की गई।

मुख्य न्यायाधीश ने महाधिवक्ता प्रशांत सिंह से सवाल किया, "आखिर सभापति ने 16 महीने बीत जाने के पश्चात भी याचिका पर निर्णय क्यों नहीं लिया?" महाधिवक्ता ने कहा, "सभापति स्वतंत्र हैं, लेकिन कोर्ट दखल दे सकता है।" तर्कों से संतुष्ट होकर कोर्ट ने सभापति नरेंद्र सिंह तोमर और सप्रे को नोटिस जारी किया। अगली सुनवाई 18 नवंबर 2025 को रखी गई। कोर्ट ने राज्य सरकार को भी पक्षकार बनाया।

यह मामला मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच में भी गया था, लेकिन वहां क्षेत्राधिकार के आधार पर खारिज हो गया। सिंघार ने कहा, "सभापति ने याचिका को दबा रखा है। कोर्ट से न्याय मिलेगा।"

दल-बदल कानून का पृष्ठभूमि: दसवीं अनुसूची के तहत अयोग्यता - सुप्रीम कोर्ट के फैसले

भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची (1985) दल-बदल रोकने के लिए बनी। पैरा 2(1)(क) कहता है - यदि विधायक स्वेच्छा से पार्टी सदस्यता त्याग दे, तो अयोग्य। अनुच्छेद 191(2) सदस्यता रद्द करता है। सुप्रीम कोर्ट ने कई फैसलों में सभापति पर समयबद्ध फैसला लेने का दबाव डाला। 'केशम vs मणिपुर राज्य' में 3 महीने की समयसीमा तय की। 'पाडी कौशिक रेड्डी' में कहा गया, "देरी से लोकतंत्र कमजोर होता है।" मध्य प्रदेश में दल-बदल के कई मामले: 2023 चुनावों में 4 कांग्रेस विधायक भाजपा में आए, लेकिन सप्रे का मामला पहला जहां कोर्ट पहुंचा।

राजनीतिक प्रभाव: बीना उपचुनाव की संभावना, कांग्रेस का जश्न, भाजपा चुप

कांग्रेस में खुशी की लहर। सिंघार ने कहा, "नोटिस जारी होना सभापति पर दबाव है। सप्रे को अयोग्य घोषित करेंगे।" प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी ने ट्वीट किया, "दल-बदल कानून का सम्मान। भाजपा को उपचुनाव लड़ना पड़ेगा।" बीना (SC आरक्षित) में 2023 में सप्रे ने 6,155 वोटों से जीत हासिल की। उपचुनाव में कांग्रेस मजबूत दावेदार।

भाजपा चुप्पी साधी। प्रवक्ता ने कहा, "कोर्ट का फैसला मानेंगे। सप्रे ने इस्तीफा नहीं दिया।" लेकिन पार्टी में चिंता - उपचुनाव हार से सागर संभाग प्रभावित। सप्रे ने कहा, "मैं कांग्रेस में ही हूं। याचिका राजनीतिक है।"

किसान और क्षेत्रीय प्रभाव: बीना में किसान आंदोलन, सिंघार की लोकप्रियता

बीना सागर जिले का महत्वपूर्ण क्षेत्र है, जहां किसान आंदोलन सक्रिय। सिंघार (गंधवानी विधायक) आदिवासी नेता हैं, और यह याचिका उनकी छवि मजबूत करेगी।

दल-बदल पर कोर्ट की नजर, 18 नवंबर का फैसला

निर्मला सप्रे का मामला मध्य प्रदेश में दल-बदल राजनीति का आईना है। हाईकोर्ट का नोटिस सभापति पर दबाव डालेगा। 18 नवंबर को अगली सुनवाई - उपचुनाव की घंटी बज सकती है। सिंघार की जीत कांग्रेस को ताकत देगी। क्या सप्रे की सदस्यता रद्द होगी? समय बताएगा, लेकिन लोकतंत्र की जीत निश्चित।

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