पद्मश्री अवार्ड से सम्मानित किसान ने संरक्षित किए 200 से ज्यादा धान के देसी बीज, अब सबको दे रहा मुफ्त में

सतना 14 जुलाई। जिला मुख्यालय से 20 किलोमीटर दूर उचेहरा तहसील के अंतर्गत ग्राम पंचायत पिथौराबाद में रहने वाले 77 वर्षीय किसान बाबूलाल दाहिया लोगों के लिए एक मिसाल हैं। बाबूलाल दाहिया वह व्यक्ति हैं, जिन्हें पद्मश्री अवार्ड से सम्मानित किया जा चुका है, यह अवार्ड राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद हाथों नवाजा गया है। अवार्ड उनके कार्यों की वजह से मिला। बाबूलाल दाहिया ने 200 प्रकार के धान के बीज समेत अनेक प्रकार के बीजों का संग्रह किए हुए हैं।

2 एकड़ में 200 प्रकार धान लगाते हैं

2 एकड़ में 200 प्रकार धान लगाते हैं

किसान बाबूलाल दाहिया प्रतिवर्ष अपने 2 एकड़ से अधिक के खेतों में 200 प्रकार की धान लगाते हैं। और बीज निकालते हैं। इसके अलावा वह अनेक प्रकार के बीजो का संग्रहण करके रखते हैं। बाबूलाल दाहिया धान के देशी बीजों की इकट्ठा करने के लिए 42 जिलों की यात्रा कर चुके हैं। वह किसान के साथ-साथ लेखक भी हैं। वह लोकोक्तियां,कहानी, लेख, मुहावरे, कविताएं, लिखते हैं। बाबूलाल दाहिया ने वनइंडिया हिंदी को जानकारी देते हुए बताया कि देशी बीजों के बारे में एवं उनसे जुड़ी हर बातों का उल्लेख अपनी कहानी -कविताओं में करते हैं। आगे बताते हैं कि उन्हें बचपन से खेती करने का शौक था। वह अपने पिता के साथ गर्मी की छुट्टियों में भी खेतो के कार्यों में सहयोग करते थे।

देशी बीजों में रोग सहने की क्षमता

देशी बीजों में रोग सहने की क्षमता

बाबूलाल दाहिया के अनुसार देशी बीजों की खेती करना उनके दिमाग में बस चुका है। देशी बीजों में हजारों प्रकार के रोग-प्रतिरोधक सहने की क्षमता होती है‌। धान के बीज कम पानी में भी बराबर उत्पादित होते हैं। इनमें पानी की भी बचत होती है। वह बताते हैं कि 60 के दशक में पूरे देश में धान की एक लाख से अधिक देशी बीजों की प्रजातियां पाई जाती थी। आज पूरे देश में करीब तीन हजार धान के बीजों की प्रजातियां बची हैं।

किसानों से बीज के बदले बीज

किसानों से बीज के बदले बीज

वह बताते हैं कि देशी बीजों की बिक्री नहीं करते। किसानों से बीज के बदले बीज लेते हैं, जिससे कि प्रतिवर्ष नया बीज होता है। इसके अलावा,कोदवा, मक्का,ज्वार, बाजरा, गेहूं, कोदई, जैसे तमाम बीजों के कई किस्म के बीज बाबूलाल के पास हैं। हम सभी एक दूसरे के किसान से नए नए बीज संग्रहित करते हैं। जिससे कि बीजों की संख्या हमारे पास बढ़ती रहती है। हमारा प्रयास है कि बाजार का हाइब्रिड बीज ना खरीदें. सिर्फ देशी बीजों का ही उपयोग हो।

करते हैं इस तरह की खेती

करते हैं इस तरह की खेती

बाबूलाल दाहिया बीते 10 12 वर्षों से देशी बीजों के संग्रहण और संवर्धन-संरक्षण में जुटे हुए हैं। उन्होंने गांव में अपनी 10 एकड़ की जमीन में से 2 एकड़ का खेत देशी धान की प्रजातियों के प्रयोग के लिए रखा हुआ है और वे अब तक 200 धान की प्रजातियां चिन्हिंत कर उनके संवर्धन की दिशा में काम कर रहे हैं। इसके लिए वह अपने आसपास के सतना, सीधी, रीवा, पन्ना और शहडोल जिले के गांव गांव जाकर धान की अलग-अलग किस्मों के बीज एकत्रित किए और उनकी खुद खेती कर उनके गुणधर्म को पहचाना।

किसानों के लिए संदेश

किसानों के लिए संदेश

बाबूलाल दाहिया किसानों को प्रेरित करते हैं। उनका कहना है कि 60 के दशक तक किसान देसी किस्मों से खेती करते थे। लेकिन जब से हरित क्रांति आई है तब से किसान बाजार पर निर्भर हो गए हैं। इसके बाद धीरे-धीरे देसी बीज विलुप्त होते गए। लेकिन अगर किसान को कृषि क्षेत्र में आगे बढ़ना है। तो उन्हें देसी बीजों का ज्यादा से ज्यादा से उपयोग करना होगा। देसी बीज कम खर्चे में ज्यादा उत्पादन होता है। साथ ही इन्हें हर मौसम को सहन करने की क्षमता होती हैं। इसलिए किसानों को खेती में देसी बीज का उपयोग करना चाहिए। जिससे पर्यावरण व मिट्टी भी सुरक्षित बनी रहे।

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