मुरैना में भाजपा की अंदरूनी कलह, पूर्व विधायक रघुराज कंसाना ने अपनी ही सरकार और मंत्रियों पर साधा निशाना
मध्य प्रदेश के मुरैना जिले में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के अंदरूनी मतभेद एक बार फिर सुर्खियों में हैं। शुक्रवार को मुरैना के पूर्व विधायक और केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के करीबी समर्थक रघुराज सिंह कंसाना ने अपनी ही सरकार और मंत्रियों के खिलाफ खुलकर नाराजगी जाहिर की। पूर्व जिलाध्यक्ष नगेंद्र तिवारी के निवास पर आयोजित एक कार्यकर्ता बैठक में कंसाना ने मंत्रियों और नेताओं पर कार्यकर्ताओं की उपेक्षा का गंभीर आरोप लगाया।
उन्होंने कहा कि जब मंत्रियों के पास अपने ही नेताओं और कार्यकर्ताओं के लिए समय नहीं है, तो प्रशासन से सुनवाई की उम्मीद कैसे की जा सकती है। इस बयान ने मुरैना की राजनीति में नया तूफान खड़ा कर दिया है।

कार्यकर्ता बैठक में छलकी नाराजगी
शुक्रवार को मुरैना में पूर्व जिलाध्यक्ष नगेंद्र तिवारी के निवास पर आयोजित कार्यकर्ता बैठक में रघुराज कंसाना ने अपनी बात बेबाकी से रखी। उन्होंने कहा, "हमारे लिए ना प्रभारी मंत्री के पास समय है, ना ही सरकार के अन्य मंत्रियों के पास। जब कभी बात करते हैं तो सिर्फ हालचाल पूछते हैं। यही कारण है कि अधिकारी भी हमारी बात नहीं सुनते। किसी कार्यकर्ता की बाइक छुड़वानी हो या थानेदार से मिलना हो, दस-दस बार फोन लगाने पड़ते हैं।" कंसाना ने अपनी नाराजगी को और स्पष्ट करते हुए कहा कि स्थानीय कार्यकर्ताओं और नेताओं की अनदेखी के चलते जमीनी स्तर पर पार्टी कमजोर हो रही है।
उन्होंने नेताओं को चेतावनी देते हुए कहा, "नेताओं और मंत्रियों को सुनना होगा कि स्थानीय कार्यकर्ताओं की उपेक्षा ठीक नहीं। चुनाव आते ही उन्हें हमारी याद कैसे आ जाती है? जब हमारे सहयोग और परिश्रम से सरकार बनती है, तो फिर सत्ता में आने के बाद हमें क्यों नजरअंदाज किया जाता है?" कंसाना का यह बयान न केवल मंत्रियों के लिए, बल्कि पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के लिए भी एक बड़ा संदेश माना जा रहा है।
रघुराज कंसाना का राजनीतिक सफर: जीत से हार तक
रघुराज सिंह कंसाना मुरैना की राजनीति का एक जाना-माना चेहरा हैं। वे केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के कट्टर समर्थक माने जाते हैं। 2018 के विधानसभा चुनाव में कंसाना ने कांग्रेस के टिकट पर मुरैना सीट से जीत हासिल की थी। लेकिन 2020 में मध्य प्रदेश में सत्ता परिवर्तन के दौरान उन्होंने सिंधिया के साथ कांग्रेस छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया। उस समय सिंधिया समर्थक 22 विधायकों ने भी पार्टी बदली थी, जिसके बाद कमलनाथ सरकार गिर गई थी।
2020 के उपचुनाव में भाजपा ने कंसाना को मुरैना से टिकट दिया, लेकिन वे कांग्रेस के राकेश मावई से 5,500 से अधिक वोटों से हार गए। कंसाना ने इस हार का ठीकरा अपनी ही पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेताओं पर फोड़ा और उन पर भितरघात का आरोप लगाया। उन्होंने खास तौर पर पूर्व मंत्री रुस्तम सिंह की ओर इशारा किया था, जो सिंधिया खेमे के नेताओं के भाजपा में आने से नाराज थे। 2023 के विधानसभा चुनाव में भी भाजपा ने कंसाना पर भरोसा जताया, लेकिन इस बार भी वे जीत हासिल नहीं कर सके।
सिंधिया खेमे की नाराजगी: मुरैना में बढ़ती अंदरूनी खींचतान
रघुराज कंसाना का यह बयान मुरैना में भाजपा के अंदर चल रही खींचतान को उजागर करता है। ग्वालियर-चंबल क्षेत्र में ज्योतिरादित्य सिंधिया और उनके समर्थकों का प्रभाव रहा है, लेकिन 2020 में भाजपा में शामिल होने के बाद से सिंधिया खेमे और पुराने भाजपा नेताओं के बीच तनाव की खबरें सामने आती रही हैं। कंसाना ने पहले भी 2020 के उपचुनाव में हार के बाद भितरघात का आरोप लगाया था और पार्टी नेतृत्व से कार्रवाई की मांग की थी।
इस बार कंसाना की नाराजगी सिर्फ मंत्रियों तक सीमित नहीं रही। उन्होंने प्रशासन की उदासीनता पर भी सवाल उठाए। उनके अनुसार, स्थानीय स्तर पर थाना और पुलिस प्रशासन तक कार्यकर्ताओं की बात नहीं सुनता। "टीआई से मिलने के लिए दस-दस बार फोन करना पड़ता है," कंसाना का यह बयान जमीनी कार्यकर्ताओं की उपेक्षा को दर्शाता है। यह सवाल उठता है कि क्या यह नाराजगी सिर्फ कंसाना तक सीमित है या यह सिंधिया खेमे की व्यापक असंतुष्टि का हिस्सा है।
मुरैना की राजनीति में कंसाना का प्रभाव
मुरैना जिले का नायकपुरा गांव, जहां से कंसाना आते हैं, मध्य प्रदेश की राजनीति में एक खास स्थान रखता है। इस गांव से अब तक छह विधायक बन चुके हैं, जिनमें रघुराज और उनके रिश्तेदार एदल सिंह कंसाना शामिल हैं। एदल सिंह वर्तमान में सुमावली से विधायक और भाजपा सरकार में कैबिनेट दर्जा प्राप्त मंत्री हैं। 2018 में दोनों एक साथ विधायक बने थे। कंसाना परिवार का इस क्षेत्र में मजबूत प्रभाव रहा है, और रघुराज की नाराजगी से स्थानीय राजनीति में नई हलचल मच सकती है।
भाजपा नेतृत्व की प्रतिक्रिया: पुराना है भितरघात का आरोप
कंसाना के आरोपों पर भाजपा के वरिष्ठ नेता और केंद्रीय मंत्री फग्गन सिंह कुलस्ते ने 2020 में जवाब दिया था कि उपचुनाव में 28 में से 19 सीटें कार्यकर्ताओं के दम पर जीती गई थीं। उन्होंने कहा था कि भितरघात के आरोपों पर पार्टी संगठन संज्ञान लेता है। लेकिन इस बार कंसाना के ताजा बयान पर अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। कुछ नेताओं का मानना है कि यह मामला पार्टी के अंदर सिंधिया खेमे और पुराने नेताओं के बीच चल रही खींचतान का हिस्सा है।
सोशल मीडिया पर बहस: कार्यकर्ताओं का दर्द या व्यक्तिगत नाराजगी?
कंसाना के बयान ने सोशल मीडिया पर भी हलचल मचा दी है। एक्स पर कई यूजर्स ने इसे कार्यकर्ताओं की उपेक्षा का मामला बताया, जबकि कुछ ने इसे कंसाना की व्यक्तिगत हताशा करार दिया। एक यूजर ने लिखा, "जो कार्यकर्ता रात-दिन मेहनत करते हैं, उनकी सुनवाई नहीं होती। कंसाना ने सही मुद्दा उठाया।" वहीं, एक अन्य यूजर ने कहा, "चुनाव हारने की खीझ अब मंत्रियों पर निकल रही है।" यह बहस मुरैना की राजनीति में नई टकराव की ओर इशारा कर रही है।
रघुराज कंसाना का यह बयान न केवल मुरैना, बल्कि पूरे ग्वालियर-चंबल क्षेत्र में भाजपा के लिए एक चुनौती बन सकता है। सिंधिया खेमे की नाराजगी और कार्यकर्ताओं की उपेक्षा का मुद्दा अगर बढ़ा, तो 2028 के विधानसभा चुनाव में इसका असर पड़ सकता है। कंसाना की मांग है कि नेतृत्व कार्यकर्ताओं की सुनवाई करे और प्रशासन को जवाबदेह बनाए। क्या पार्टी इस मुद्दे पर कार्रवाई करेगी, या यह नाराजगी और बढ़ेगी, यह आने वाला समय बताएगा।












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