मेट्रो में 'तुर्किये कनेक्शन' से मची हलचल, मंत्री विजयवर्गीय ने जांच के दिए आदेश, इंदौर-भोपाल मेट्रो पर संकट!
MP News: मध्य प्रदेश की बहुप्रतीक्षित मेट्रो परियोजना-जिसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 31 मई को भोपाल से वर्चुअल हरी झंडी दिखा सकते हैं-अब अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा विवाद के साये में आ गई है। विवाद की जड़ है तुर्किये की कंपनी 'असिस गार्ड', जिसे भोपाल और इंदौर में मेट्रो के ऑटोमैटिक फेयर कलेक्शन सिस्टम लगाने का ठेका मिला था।
मामला गंभीर तब बना जब नगरीय प्रशासन एवं आवास मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने 19 मई को एक सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा कि "राष्ट्रधर्म सर्वोपरि है" और उन्होंने इस कंपनी की गंभीर जांच के आदेश दिए हैं।

क्या है मामला?
'असिस गार्ड' नामक तुर्किये की कंपनी को मई 2023 में 186.52 करोड़ रुपए में अनुबंध मिला था। इसके अंतर्गत भोपाल और इंदौर मेट्रो के कुल 53 स्टेशनों पर टिकटिंग से लेकर फेयर कलेक्शन तक की डिजिटल प्रणाली स्थापित की जानी थी।
अब तक कंपनी भोपाल और इंदौर में 5-5 स्टेशनों पर काम पूरा कर चुकी है और कई स्टेशनों पर काम चल रहा है। लेकिन हाल ही में सूत्रों से यह दावा सामने आया कि इसी कंपनी के बनाए ड्रोन कथित तौर पर पाकिस्तान द्वारा भारत विरोधी गतिविधियों में इस्तेमाल किए गए थे।
Bhopal-Indore Metro: मंत्री विजयवर्गीय का कड़ा रुख
मंत्री ने 'X' (पूर्व ट्विटर) पर पोस्ट करते हुए लिखा: "जो भारत की संप्रभुता के विरुद्ध खड़ा होगा, उसके साथ किसी प्रकार की सहानुभूति नहीं होगी। यदि 'असिस गार्ड' का भारत विरोधी तत्वों से कोई संबंध पाया गया, तो उसका ठेका तत्काल प्रभाव से रद्द किया जाएगा।" उन्होंने कहा कि भारत विरोधी मानसिकता का कोई स्थान नहीं है, और इस विषय में अधिकारियों को गहन और निष्पक्ष जांच के निर्देश दे दिए गए हैं।
अब क्या?
यह बयान उस समय आया है जब इंदौर मेट्रो के कॉमर्शियल रन को केवल 10 दिन शेष हैं। यदि कंपनी का ठेका समाप्त किया जाता है तो सवाल उठता है कि: क्या भोपाल और इंदौर मेट्रो की स्मार्ट टिकटिंग प्रणाली ठप हो जाएगी?क्या यह निर्णय मेट्रो के कमर्शियल ऑपरेशन में देरी का कारण बन सकता है?
वैकल्पिक व्यवस्था की तैयारी और लागत क्या होगी? तकनीकी और रणनीतिक चिंता
'असिस गार्ड' जैसी कंपनियां केवल सॉफ्टवेयर नहीं, बल्कि हार्डवेयर-सिस्टम इंटीग्रेशन भी करती हैं। ऐसे में किसी और कंपनी द्वारा अधूरे सिस्टम को उठाना तकनीकी रूप से जटिल और महंगा हो सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जांच के बाद दोष सिद्ध नहीं होता, तो यह मुद्दा केवल राजनीतिक विमर्श बनकर रह सकता है।












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