Rajnath Singh के भतीजे समेत 2 का दाह संस्कार मणिकर्णिका घाट पर ही क्यों? रोजाना कितने शवों को मिलती है मुक्ति?
Prabhat Singh-Jaspal Rana Cremation Manikarnika Ghat Reason: देश के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के परिवार पर जून 2026 के बीच दुखों का सैलाब आ गया। मात्र 24-48 घंटों के अंदर परिवार के दो करीबी सदस्यों का निधन हो गया। एक तरफ राजनाथ सिंह के भतीजे प्रभात सिंह(29 वर्ष) की इंदौर में मौत, दूसरी तरफ पद्मश्री विजेता, दिग्गज निशानेबाज और मनु भाकर के कोच जसपाल राणा(49 वर्ष) का दिल्ली में हृदय संबंधी बीमारी से निधन हुआ।
खास बात यह है कि दोनों के पार्थिव शरीर वाराणसी के मणिकर्णिका घाटपर ले जाकर दाह संस्कार किए गए। आइए विस्तार से जानते हैं... राजनाथ सिंह के परिवार के दो करिबियों की मौत, डेडबॉडी एयरलिफ्ट, मणिकर्णिका घाट पर ही क्यों दाह सस्कार? क्या है मान्यता?

टाइमलाइन में समझें...
- 2 जून: जर्मनी से जसपाल राणा दिल्ली लैंड हुए। फ्लाइट में ही उनकी तबीयत बिगडी और साकेत मैक्स अस्पताल में भर्ती कराया गया। सर्जरी हुई, लेकिन ट्रीटमेंट के दौरान ही उनकी 11 से 12 जून के दरम्यान निधन हो गया।
- 11 जून 2026 (गुरुवार रात): राजनाथ सिंह के भतीजे प्रभात सिंह (बलिया, उत्तर प्रदेश निवासी) मध्य प्रदेश के इंदौर-देवास रोड पर शिप्रा थाना क्षेत्र में सड़क दुर्घटना का शिकार हुए। वे कार में बैठने की कोशिश कर रहे थे, तभी तेज रफ्तार मिनी बस ने उन्हें टक्कर मार दी। मौके पर ही मौत हो गई।
- 12-13 जून 2026 दाह संस्कार: दोनों पार्थिव शरीरों को एयरलिफ्ट/विशेष व्यवस्था से वाराणसी ले जाया गया। 12 जून को राजनाथ सिंह के भतीजे प्रभात सिंह का दाह संस्कार मणिकर्णिका घाट पर हुआ। 13 जून को जसपाल राणा का दाह संस्कार भी इसी घाट पर हुआ। परिवार और शुभचिंतकों की भारी भीड़ उमड़ी।
राजनाथ सिंह से क्या था प्रभात सिंह और जसपाल राणा का रिश्ता?
प्रभात सिंह और जसपाल राणा का संबंध केंद्रीय रक्षा मंत्री Rajnath Singh के परिवार से जुड़ा हुआ था। दोनों अलग-अलग पारिवारिक रिश्तों के माध्यम से राजनाथ सिंह के करीबी संबंधी थे।
29 वर्षीय प्रभात सिंह, उत्तर प्रदेश के बलिया (Ballia) के रहने वाले थे। वह राजनाथ सिंह के भतीजे थे। इसके अलावा, उनका रिश्ता परिवार के दूसरे हिस्से से भी जुड़ता था। प्रभात सिंह, राजनाथ सिंह के छोटे बेटे नीरज सिंह (Neeraj Singh) की पत्नी के कजिन ब्रदर भी थे।
वहीं, जसपाल राणा का संबंध राजनाथ सिंह के बड़े बेटे पंकज सिंह (Pankaj Singh) के परिवार से था। जसपाल राणा, पंकज सिंह की पत्नी सुषमा के भाई थे। इस तरह वह राजनाथ सिंह के परिवार के निकट संबंधी माने जाते थे। यानी प्रभात सिंह और जसपाल राणा दोनों का रिश्ता अलग-अलग पारिवारिक कड़ियों के जरिए राजनाथ सिंह के परिवार से जुड़ा हुआ था।
मणिकर्णिका घाट पर दाह संस्कार क्यों?
1. जसपाल राणा की व्यक्तिगत इच्छा: परिवार के अनुसार, जसपाल राणा ने कई बार अपनी इच्छा जताई थी कि उनका अंतिम संस्कार मणिकर्णिका घाट पर हो। परिवार ने इस इच्छा का सम्मान किया।
2. धार्मिक मान्यता और मुक्ति: हिंदू धर्म में मणिकर्णिका घाट को महाश्मशान माना जाता है। यहां दाह संस्कार करने से आत्मा को मोक्ष(मुक्ति) प्राप्त होती है, जन्म-मृत्यु के चक्र से छुटकारा। काशी (वाराणसी) को शिव की नगरी माना जाता है, जहां यमराज का प्रभाव नहीं होता।
3. 24 घंटे सक्रिय घाट: यहां कभी अग्नि नहीं बुझती। कोई भी समय पर संस्कार संभव है, इसलिए दूर से लाई गई देहों के लिए सुविधाजनक।
4. परिवार का वाराणसी से भावनात्मक कनेक्शन: राजनाथ सिंह परिवार की जड़ें उत्तर प्रदेश में हैं। वाराणसी हिंदू आस्था का प्रमुख केंद्र है, इसलिए परिवार ने यहां अंतिम विदाई चुनी।
आइए अब जानते हैं मणिकर्णिका घाट का इतिहास, और मान्यता क्या?
पौराणिक कथाएं क्या? सती के शरीर के 51 टुकड़े क्यों?
पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब देवी सती ने आत्मदाह किया तो शिव उनके शरीर को लेकर विचरण करते रहे। विष्णु के सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के 51 टुकड़े हुए। उनके कान की बाली (मणिकर्णिका) इसी घाट पर गिरी। एक अन्य कथा में भगवान विष्णु ने शिव को काशी बचाने के लिए हजारों वर्ष तप किया। पार्वती के स्नान के दौरान उनकी बाली का रत्न यहां गिरा।
ऐतिहासिक महत्व क्या है ?
- 5वीं शताब्दी के गुप्त काल के ग्रंथों में उल्लेख।
- 1303 में पत्थर की सीढ़ियां बनीं।
- 1730 में बाजीराव पेशवा और 1791 में अहिल्याबाई होलकर द्वारा जीर्णोद्धार।
- सिंधिया और दशाश्वमेध घाट के बीच स्थित।
मणिकर्णिका घाट पर रोजाना कितने शवों का अंतिम संस्कार किया जाता है?
विजिट वाराणसी की वेबसाइट के मुताबिक, औसतन 100-150 शव प्रतिदिन (कभी 200-300 तक) दाह किए जाते हैं। धार्मिक त्योहारों पर संख्या बढ़ जाती है। लोग दूर-दूर से मोक्ष की कामना लेकर यहां आते हैं।
मणिकर्णिका घाट के श्राप की कहानी क्या है?
पौराणिक कथाओं के अनुसार, मणिकर्णिका घाट देवी पार्वती के श्राप से ग्रसित है। जब भगवान शिव और पार्वती वाराणसी में थे, तब पार्वती ने अपना मणि (रत्न) यहीं खो दिया था। शिव ने घोषणा की कि जो भी इस घाट पर अंतिम संस्कार करवाएगा, उसे मोक्ष प्राप्त होगा, लेकिन मृत्यु के देवता यमराज इससे अप्रसन्न हो गए क्योंकि इससे उन्हें आत्माओं का आशीर्वाद नहीं मिला। कुछ लोगों का मानना है कि इसी कारण वाराणसी पर यमराज का प्रभाव नहीं है।













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