यहां मगरमच्छ और घडियालों के बीच से निकाला जाता है मीठा पानी, नजर चूकने पर जा सकती है जान

भिंड के दिन्नपुरा गांव के ग्रामीण मीठे पानी की खातिर मगरमच्छ और घड़ियालो के बीच जाकर चंबल नदीं से भरकर लाते है पानी। नजर चूकने पर हो जाते है मगरमच्छ और घड़ियाल के शिकार।

भिंड, 10 मई: मीठे पानी की चाहत कुछ ऐसी है कि लोग अपनी जान हथेली पर रखकर भी इस पानी को पाने की खातिर मगरमच्छों और घडियालो के बीच चले जाते हैं। अपनी जान जोखिम में डालकर पानी के लिए मौत से सामना करना यहां के ग्रामीणों की रोजमर्रा की जिदगी में शामिल हो गया है। जरा सी लापरवाही बरतना, मतलब सीधा सीधा मगरमच्छ और घड़ियाल का निवाला बन जाना है। मीठे पानी के लिए यह तड़प भिंड जिले के अटेर विधानसभा के दिन्नपुरा के ग्रामीणों की है, जो गांव का खारा पानी छोड़कर मीठे पानी की खातिर मगरमच्छों और घड़ियालो से भरी चंबल नदी के घाट पर पहुंच जाते हैं। पेयजल संकट से जूझ रहे इन ग्रामीणों ने कई बार मगरमच्छ के रूप में मौत को अपने सामने भी देखा है, ग्रामीण बताते हैं कि कभी-कभी नजर चूक जाती है तो हादसे भी हो जाते है और ग्रामीण इन मगरमच्छो का शिकार हो जाते है। पानी भरने गए ग्रामीण को मगरमच्छ खींच कर ले जाते हैं फिर उस शख्स की लाश भी चंबल नदी में नहीं मिल पाती है।

water cries

मध्य प्रदेश के सहकारिता मंत्री अरविंद भदौरिया के विधानसभा क्षेत्र की है यह हालत

विकास का दम भरने वाली मध्य प्रदेश की बीजेपी सरकार के सहकारिता मंत्री अरविंद भदौरिया का ये विधानसभा क्षेत्र है। अटेर विधानसभा क्षेत्र के दिन्नपुरा गांव की हालत बयां करती है कि, बीजेपी सरकार में जनता को पानी के लिए भी हर रोज जान जोखिम में डालना पड़ रही है। अरविंद भदौरिया यहां से दूसरी बार विधायक बने हैं और इस बार वे शिवराज सरकार में कद्दावर मंत्री भी हैं, बावजूद इसके उनकी विधानसभा क्षेत्र के हालात किसी से छिपे नहीं है।

जल जीवन मिशन की पहुंच से दूर है दिन्नपुरा गांव

मोदी सरकार द्वारा 15 अगस्त 2019 को शुरू की गई जल जीवन मिशन की योजना से भिंड का दिन्नपुरा गांव अभी कोसों दूर नजर आ रहा है। इस योजना का लाभ यहां के ग्रामीणों को अभी तक नहीं मिल सका है। सरकार लगातार दावा कर रही है कि दूर सुदूर गांव के हर घर तक शुद्ध पेयजल पहुंचाया जाएगा और इसके लिए सरकार ने 2024 तक का लक्ष्य निर्धारित कर रखा है, लेकिन दिन्नपुरा जैसे गांव अभी भी सरकार की नजरों से दूर ही नजर आ रहे हैं। यही वजह है कि जल जीवन मिशन जैसी योजना अभी तक यहां नहीं पहुंच सकी है।

नदी के पानी में छिपे मगरमच्छ और घड़ियालो पर मुश्किल से रख पाते हैं ग्रामीण नजर

दिन्नपुरा गांव के ग्रामीण बताते हैं कि गांव में जो हैंडपंप है उनमे से खारा पानी निकलता है, जो बिल्कुल भी पीने योग्य नहीं है, इसलिए मीठे पानी के लिए गांव के हर घर से महिलाएं और बच्चे रोजाना पानी लेने चंबल नदी तक जाते है। 1 किलोमीटर दूरी का सफर तय करके महिलाएं और बच्चे चंबल नदी तक पहुंचते है। नदी पर पहुंचकर कुछ महिलाएं नदी में मगरमच्छ और घड़ियाल पर नजर रखती हैं, तो बची हुई महिलाएं और बच्चे नदी से फटाफट पीने का पानी भर लेते है। यह इतना बड़ा जोखिम है कि जरा सी नजर चूकने से जान भी जा सकती है।

घड़ियाल और डॉल्फिन के लिए संरक्षित है चंबल नदी का ये इलाका

भिंड से गुजरने वाली चंबल नदी का ये इलाका चंबल सेंचुरी के रूप में संरक्षित है। यहां पर डॉल्फिन और घड़ियाल को संरक्षित करने के लिए सरकार ने श्योपुर से लेकर भिंड तक के 400 किलोमीटर चंबल नदी के इलाके को संरक्षित कर रखा। इस वजह से नदी का यह इलाका घड़ियालो और डॉल्फिन समेत अन्य जलीय जीवों के लिए तो सुरक्षित है लेकिन नदी में दाखिल होने वाले लोगों के लिए काफी खतरनाक है।

जनप्रतिनिधि और प्रशासन से गुहार के बावजूद नहीं हुई अब तक कोई सुनवाई

दिन्नपुरा के ग्रामीणों ने कई बार अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों से पेयजल समस्या को हल करने के लिए गुहार भी लगाई है, लेकिन ना तो कभी जनप्रतिनिधियों ने और ना ही अधिकारियों ने ग्रामीणों की इस समस्या को सुलझाने में कोई रुचि दिखाई है। यही वजह है कि आज भी ग्रामीण रोजाना पीने के पानी की खातिर अपनी जान को जोखिम में डाल रहे हैं। दिन्नपुरा गांव के ग्रामीण बताते है कि चंबल नदी के घाट पर ऐसे हादसे हो चुके है। ग्रामीण बताते है कि नदी पर गए एक बच्चे को मगरमच्छ अपना शिकार बना चुके है। इतना ही नहीं मवेशियो को तो कई बार मगरमच्छ और घड़ियाल अपना शिकार बना चुके है।

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