Bahraich : नेपाली गैंडो को पसंद आ रहे कतर्नियाघाट सेंचुरी के ग्रासलैंड, पर्यटकों के लिए बने आकर्षण का केंद्र
कतर्नियाघाट सेंक्चुरी में आने वाले पर्यटक गैंडे भी देखकर रोमांचित हो रहे हैं। ये गैंडे नेपाल के रायल बर्दिया नेशनल पार्क से खाताकारी डोर के रास्ते कतर्नियाघाट आ पहुंचे हैं।

कतर्निया वन्यजीव अभयारण्य उत्तर प्रदेश, भारत में ऊपरी गंगा के मैदान में एक संरक्षित क्षेत्र है और बहराइच जिले के तेराई में 400.6 किमी के क्षेत्र में फैला हुआ हैं। वैसे तो इसे 1987 में 'प्रोजेक्ट टाइगर' के दायरे के तहत लाया गया था परन्तु अब कतर्नियाघाट सेंक्चुरी में आने वाले पर्यटक गैंडे भी देखकर रोमांचित हो रहे हैं। ये गैंडे नेपाल के रायल बर्दिया नेशनल पार्क से खाताकारी डोर के रास्ते कतर्नियाघाट आ पहुंचे हैं। अभी तक गैंडों का प्रवास स्थल गेरुआ पार का जंगल था। लेकिन बीते चार माह से नदी के उस पार के जंगल में निरंतर चार से पांच गैंडों का मूवमेंट ग्रास लैंड में मिल रहा है़। इससे लग रहा है़ कि इन्हें अब कतर्नियाघाट जंगल की आबोहवा रास आ रही है।

पर्यटकों को रोमांचित कर रहे हैं गैंडे
दरअसल, नेपाल सीमा से सटे कतर्नियाघाट संरक्षित वन क्षेत्र को बाघ, तेंदुओं तथा हाथियों के लिए जाना जाता है। लेकिन, यहां कुछ दिनों से गैंडों का मूवमेंट गेरुआ पार के जंगल में दिख रहा था। लेकिन गैंडे इस पार आने से परहेज करते थे। जिससे अधिकांश पर्यटकों को निराशा हाथ लगती थी। अब पर्यटकों के लिए सुखद संदेश यह है़ कि नेपाल से खाता कारिडोर के रास्ते आये एक गैंडे ने गेरुआ नदी के इस पार कतर्नियाघाट रेंज में बंधे के निकट के जंगल को अपना प्राकृतिक वास बना लिया है़। यह गैंडा जंगल आने वाले पर्यटकों को भी निरंतर रोमांचित कर रहा है़। हरियाणा, दिल्ली, लखनऊ से हाल ही में जंगल भ्रमण पर आए पर्यटकों ने गैंडे को देखने की पुष्टि की है़। वन्यजीव विशेषज्ञों की मानें तो कतर्नियाघाट जंगल की आबोहवा गैंडों के लिए बेहद अनुकूल है।
वनाधिकारी भी काफी खुश
नदी के उस पार घने जंगल के बीच रहने वाले गैंडे ग्रासलैंडों में भी दिखाई पड़ रहे हैं। भ्रमण के लिए पहुंचे कई पर्यटकों ने जब नदी पार के ग्रासलैंड में गैंडे को विचरण करते देखा तो सभी रोमांचित हो उठे। पहली बार गैंडा सामान्य तरीके से ग्रासलैंड में दिखाई पड़ा। इसे वनाधिकारी भी काफी सुखद मान रहे हैं। कतर्नियाघाट के वनाधिकारी बताते हैं कि एक साल पहले चार गैंडों का मूवमेंट मिलता था लेकिन इधर कुछ दिनों से पांच गैडे गेरुआ पार के चूही पाताल जंगल और उससे सटे ग्रासलैंडों में दिखायी पड़ रहे हैं।

वर्ष 2002 के बाद से रास आने लगा जंगल
नेपाली गैंडों को कतर्नियाघाट सेंक्चुरी वर्ष 1997 से रास आ रहा है। खाता कारीडोर के रास्ते गैंडों का झुंड अक्सर कतर्नियाघाट आता था और फिर वापस लौट जाता था लेकिन वर्ष 2002 के बाद से गैंडों का ठहराव भी होने लगा है। इस समय तीन वयस्क व दो शिशु गैंडे गेरुआ पार के कतर्निया जंगल में प्रवास कर रहे हैं।
गैंडों के अनुकूल है जंगल
कतर्नियाघाट फ्रेंड्स क्लब के अध्यक्ष भगवान दास लखमानी ने बताया कि गेरुआ के उसपार और इस पार घने जंगल के बीच छोटे-छोटे तालाब है, जिनमें शैवाल, कवक व मुलायम घासें हैं। गैंडा पूरी तरह शाकाहारी होता है। शैवाल उसकी विशेष पसंद होती है। जंगल की इस आबोहवा के चलते ही पहली बार नदी के इस पार के जंगल को गैंडे ने अपना प्राकृतिक वास बनाया है़। उस पार भी लगभग पांच गैंडों का ठहराव जंगल में बना हुआ है। यूं कहें कि वह कतर्नियाघाट के होकर रह गए हैं तो गलत नहीं होगा। उन्होने कहा कि वनविभाग के साथ साथ जंगल की सुरक्षा और संरक्षा के लिए कार्य कर रही स्वयंसेवी संस्थाओ की भी बड़ी भूमिका है़।

संख्या में और होगा इजाफा
कतर्नियाघाट रेंज के ट्रांसगेरुआ इलाके में गैंडे के प्रवास की सूचना मिली है। उसकी सुरक्षा के लिए विभागीय अधिकारियों और कर्मचारियों को अलर्ट किया गया है। वन्य जीव किसी एक देश के नहीं होते। वह प्रकृति की अनुकूलता के अनुरूप विचरण करते हैं। गैंडों को ग्रास लैंड अधिक पसंद है। कतर्नियाघाट में ग्रासलैंड की कमी नहीं है। गैंडों के अनुकूल वातावरण है। ऐसे में गैंडो की संख्या में और वृद्धि होने के आसार हैं
रेडियो टैग लगे गैंडे का हर दो-तीन महीने पर होता है मूवमेंट
कतर्नियाघाट के वनाधिकारी बताते हैं कि रॉयल नेशनल बर्दिया पार्क के एक गैंडे में रेडिया टैग लगा हुआ है। इसके जरिए जीपीएस सिस्टम के माध्यम से गैंडे के मूवमेंट पर वनकर्मियों की नजर रहती है। प्रत्येक दो से तीन महीने पर यह गैंडा रायल बर्दिया नेशनल पार्क से कतर्निया के जंगलों में पहुंचता है और फिर वापस चला जाता है।

कई लुप्तप्राय प्रजातियों का घर है कतर्नियाघाट
कातेरीनाघाट वन भारत में दुधवा और किशनपुर के बाघ के निवास और नेपाल में बर्दिया राष्ट्रीय उद्यान के बीच सामरिक संपर्क प्रदान करता है। इसकी नाजुक तेराई पारिस्थितिकी तंत्र में सैल और सागौन के जंगलों, प्रचुर घास के मैदानों, कई दलदलों और नलिकाओं का मोज़ेक शामिल है। यह कई लुप्तप्राय प्रजातियों का घर है, जिनमें घिरील, शेर, गेंदे, गंगा के डॉल्फिन, दलदल हिरण, हेपीड खरगोश, बंगाल फ्लोरिकन, सफेद बैकड और लंबे समय से बिल गिल्ट शामिल हैं।
गेरुआ नदी में छोटी संख्या में मगर मगरमच्छ भी देखे जाते हैं, क्योंकि उनके पसंदीदा हंट स्थिर जंगलों हैं, जैसे कई तालों और बागारों, जो अभयारण्य को डॉट करता है। गहरे रंग की तरफ से तैरती तलहों की तरफ से गंगा डोल्फ़िन को फुलते हुए देखा जा सकता है।












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