आर्तेमिस 1 के जरिए चांद पर बस्ती बसाने की तैयारी

नासा का आर्तेमिस रॉकेट

आर्तेमिस 1 एक मानव-रहित टेस्ट मिशन है. 1971 के अपोलो 17 मिशन के बाद चंद्रमा पर उतरने की ओर ये पहला कदम है. मंगल के अनुसंधान की दिशा में चंद्रमा पर बस्ती बसाना महत्वपूर्ण है. क्योंकि अंतरिक्ष यात्री चांद की सतह को, मंगल की ओर लंबे सफर के दौरान रिलॉन्च के एक ठिकाने के रूप में इस्तेमाल करना चाहते हैं.

नासा और यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ईएसए) का ये साझा आर्तेमिस कार्यक्रम इस बात को रेखांकित करेगा कि पिछली आधा सदी में अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में क्या कुछ बदला है.

1972 में चांद पर उतरने के ऐतिहासिक पल के बाद से काफी कुछ बदल चुका है. स्वप्न और प्रौद्योगिकी अब ज्यादा उच्चीकृत हो चुके हैं. आर्तेमिस की योजना, इंसानों को 2025 में चंद्रमा पर उतारने की है और उसके बाद के वर्षो में चंद्रमा की उड़ानों से एक ज्यादा स्थायी बस्ती के निर्माण की है.

ईएसए में एयरोस्पेस इंजीनियर युर्गेन शुल्त्स ने डीडब्लू को बताया कि "शुरुआत में, लोग सिर्फ एक सप्ताह के लिए ही चांद पर जाएंगे, लेकिन भविष्य के आर्तेमिस अभियान लोगों को वहां एक दो महीनों के लिए टिका पाएगा." आर्तेमिस अभियान में पहली बार औरतें और अश्वेत लोग भी चंद्रमा पर उतरेंगे.

आर्तेमिसकार्यक्रमक्याहै?

आने वाला लॉन्च उन छह अभियानों में से पहला होगा जो 2028 तक के लिए प्लान किए गए हैं. आर्तेमिस 1 के ओरियन अंतरिक्षयान में इंसान नहीं होंगे, ये विशुद्ध रूप से एक सुरक्षा टेस्ट अभियान होगा. लेकिन आगामी अभियान में लोग शामिल होंगे.

अंतरिक्ष कार्यक्रम को पुनर्जीवित करने की कोशिशों के एक हिस्से के रूप में आर्तेमिस कार्यक्रम 2017 में शुरू हुआ था. नासा और ईएसए इस कार्यक्रम में भागीदार हैं, दूसरे कई देशों की अंतरिक्ष एजेंसियां भी इसमें शामिल हैं.

शुल्त्स कहते हैं, "हम लोग अंतरिक्ष में इंसानों की पहुंच का दायरा बढ़ाना चाहते हैं. चंद्रमा हमारा सबसे करीबी पड़ोसी है. वहां शोध के लिए संसाधन और खूबियां मौजूद हैं. लेकिन हमारे लिए आर्तेमिस प्रोग्राम मुख्य रूप से अंतरिक्ष में अपना पहला कदम जमाने के बारे में है."

आर्तेमिस मिशन पर नासा के अगली पीढ़ी के चंद्रयान का प्रक्षेपण

यूनानी मिथको में अपोलो की जुड़वा बहन और चंद्रमा की देवी आर्तेमिस के नाम पर नासा ने इस कार्यक्रम का नाम रखा है. अभियान को मूल रूप से 29 अगस्त को केनेडी स्पेस सेंटर से उड़ान भरनी थी लेकिन वो लॉंच, ईंधन रिसाव और इंजन से जुड़ी तकनीकी खराबियों की वजह से रद्द कर दिया गया. दूसरी तारीख भी टल गई थी.

अब आर्तेमिस कार्यक्रम लॉंच हो चुका है, जिसके तहत 26 और 42 दिनों के बीच चंद्रमा की ओर ओरियोन अंतरिक्षयान रवाना किया जाएगा.

उन दिनों में से कम से कम छह दिन चंद्रमा की दूरस्थ कक्षा में बिताए जाएंगे, उसके बाद अंतरिक्षयान प्रशांत महासगार में जा गिरेगा. आर्तेमिस का मानवरहित ओरियोन अंतरिक्षयान पृथ्वी पर लौटने से पहले चंद्रमा के एक या दो चक्कर लगाएगा.

आगामीमानवयुक्तअंतरिक्षयानोंकापरीक्षण

शुल्त्स के मुताबिक, इस लॉंच का लक्ष्य, ओरियोन की सुरक्षा और भविष्य के मानवयुक्त अंतरिक्ष अभियानों के स्पेस लॉन्च सिस्टम को प्रमाणित करने का है.

वो कहते हैं, "आर्तेमिस चंद्रमा पर इंसानों को भेजने का कार्यक्रम है. आर्तेमिस 1 पहला मिशन होगा, जो लोगों को वहां ले जाने के लिए परिवहन विधियों का परीक्षण करेगा."

ओरियोन आंशिक रूप से दोबारा इस्तेमाल होने वाला अंतरिक्षयान है जिस पर सौर पैनल लगे हैं और एक स्वचालित डॉकिंग सिस्टम है. इनके अलावा प्राइमेरी और सेकेंडरी रिपल्शन इंजिन भी इसमें लगे हैं जो अंतरिक्षयान को पृथ्वी की कक्षा से बाहर निकालकर चंद्रमा की ओर ले जाएंगे.

ईएसए की अंतरिक्ष उड़ान की तकनीक विकसित करने में एयरबस जैसी यूरोपीय कंपनियों की केंद्रीय भूमिका रही है. ओरियोन अपने साथ, सिर्फ छह अंतरिक्षयात्री ही ले जा सकता है. आर्तेमिस 1 में दो पुतले, हेल्गा और जोहर उड़ान भरेंगे, उनमें रेडिएशन (विकिरण) की माप करने वाले सेंसर लगे होंगे.

लोगचांदपरकबसेरहनेलगेंगे?

आर्तेमिस का लंबी अवधि का लक्ष्य है मंगल में बस्ती बसाना. शुल्त्स कहते हैं कि चंद्रमा, मंगल के अनुसंधानों की बाहरी चौकी की तरह काम कर सकता है. पहला चंद्रमा लैंडिग पैड- आर्तेमिस बेस कैंप – इस दशक के अंत तक बना दिए जाने का प्रस्ताव है.

चीनी राष्ट्रीय अंतरिक्ष प्रशासन और रूसी संघीय अंतरिक्ष एजेंसी, रोस्कोसमोस ने 2030 के दशक के शुरू में अपना खुद का चंद्रमा बेस बनाने का प्रस्ताव दिया है. उसका नाम होगा अंतरराष्ट्रीय चंद्र शोध स्टेशन.

चंद्रमा पर स्थित ठिकाना दो महीने तक अभियानों को मदद देगा और प्रौद्योगिकियों और जीवन स्थितियों को सर्वाधिक उपयुक्त बनाने के लिए एक दूरस्थ चौकी के रूप में काम करेगा. अंतरिक्षयात्री एक सप्ताह से भी कम समय में चांद पर पहुंचेगे.

ये अवधि दिलचस्प है- खासकर ये देखते हुए कि 200 साल पहले ही, अमेरिकी भूगोल तक पहुंचने में यूरोपीय उपनिवेशको को चार सप्ताह तक का समय लगा था.

यूरोपीय स्पेस एजेंसी में पदार्थ विज्ञानी आइडन काउले बताते है कि दूसरे ग्रहों पर रहने के लिए जरूरी प्रणालियों और प्रौद्योगिकियों का परीक्षण चंद्रमा पर किया जाएगा.

उन्होंने डीडब्लू को बताया, "चंद्रमा पर पर्यावरण बड़ा रूखा और कठोर है. अंतरिक्षयात्रियों को रेडिएशन यानी विकिरण से बचाना भी सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है. रेडिएशन को रोकने के लिए, हम लोग रिगोलिथ (चंद्र धूल) की ईंटों से रिहाइशी ठिकाने बनाने पर विचार कर रहे हैं."

संसाधनों के प्रबंधन, विकिरण से सुरक्षा और ऊर्जा उत्पादन और उपयोग से जुड़ी प्रणालियों का परीक्षण चांद पर किया जाएगा और फिर उन्हें मंगल पर लाया जाएगा. मंगल तक पहुंचने में छह महीने लगते हैं, लिहाजा चंद्र अभियान एक ज़्यादा सुगम परीक्षण स्थल मुहैया कराता है.

आइडन काउली कहते हैं, "नये उपकरणों का "फोनिंग होम" नहीं हो पाएगा यानी वे मुख्य सर्वर से नहीं जुड़ पाएंगे और ना ही उनसे सूचना निकाली जा सकेगी. लेकिन चांद पर उपलब्ध सामग्रियों से ही औजारों और उपकरणों के 3डी प्रिंट निकाले जा सकते हैं."

रिपोर्टः फ्रेड श्वालर

Source: DW

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