दुर्गा की शक्ति छीनना तो बहाना, खेल कुछ और ही है

अब सरकार तो मानकों के हिसाब से ठेका उठा देती है, कि इतने इलाके में आप इतने मीटर (ज्यादातर छह मीटर) से ज्यादा खनन नहीं कर सकते। लेकिन सारे खेल की शुरुआत यही से होती है। खनन का ठेका लेना वाला व्यक्ति जिसे खनन माफिया कहा जाता है वह ज्यादा खनन करता है। बसपा के शासनकाल में मायावती ने खनन के इस खेल को बदल दिया था और खनन माफिया से सौदेबाजी और रकम वसूली की जिम्मेदारी इलाके के बड़े अफसरों (ज्यादातर डीएम) को दी गई थी।
सौदेबाजी के तहत यह तय होता था कि खनन का काम करने वाला ठेकेदार (खनन माफिया) निर्धारित सीमा से कितना ज्यादा खनन करेगा और उससे जो अतिरिक्त आय होगी वो सरकार में ऊपर कैसे पहुंचाई जाएंगी। बसपा के शासनकाल में इसमें नई परिपाटी शुरू हुई जिसमें खनन माफिया रकम सरकारी अधिकारियों के द्वारा लखनऊ भेजते थे। इसमें सरकारी अधिकारी और खनन माफिया एक सौदा और करते थे जिसमें गलत तरीके से कितना खनन होगा, उसकी मात्रा तय होने के बाद इसके ऊपर कितना खनन होगा वह तय होता था। मान लीजिए, एक दिन में तय हुआ कि 400 डंपर अतिरिक्त खनन होगा, इसकी रकम तय हो गई, जो लखनऊ जानी है। इसके बाद नौकरशाह और खनन माफिया 200 के लगभग प्रतिदिन अतिरिक्त खनन और करते थे जो माफिया और नौकरशाह के बीच बंटता था।
सपा की सरकार में कई जगह यह काम सपा के नियुक्त नेताओं के पास आ गया जिससे नौकरशाहों की एक बड़ी आमदनी पर रोक लग गई हैं। दुर्गा नागपाल का बहाना लेकर नौकरशाह बसपा शासनकाल में शुरू हुई व्यवस्था को बहाल कराना चाहते हैं। जिससे लखनऊ पैसा लाने की जिम्मेदारी उनको मिल जाए। यह अवैध राजस्व जमा करने का मामला हैं और अफसर की ईमानदारी को इसमें केवल एक बहाना बनाया जा रहा हैं।












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