जानिए सावन के सोमवार और शिव पूजन का महत्व
[पं. अनुज के शुक्ल] हमारा भारत कृषि प्रधान देश है। भारत की लगभग 70 प्रतिशत आबादी का जीविकापार्जन इसी पर आधारित है। कृषि के लिए सबसे महत्वपूर्ण एंव उपयोगी वस्तु है जल। जल के बगैर कृषि कर पाना शायद असम्भव है। आधुनिक काल में कृषि को पर्याप्त मात्रा में जल उपलब्ध कराने के लिए बहुत सारे संसाधन खोज लिए गये। किन्तु प्राचीन काल में जल के लिए वर्षा पर ही निर्भर रहना पड़ता था। धरती को जितना अधिक जल मिलेगा उतनी ही अच्छी वर्षा होगी।
वर्षा के चार माह होते हैं, जिनमें सबसे अधिक उपयोगी श्रावण मास को माना जाता है, क्योंकि सावन माह में धान की रोपाई अपने चरम पर होती है। सावन, शिव और समृद्धि इनका आपस में बहुत गहरा संबंध है। सावन के महीने में शिव जी को प्रसन्न करने से वर्षा अच्छी होगी, जिससे हमारी कृषि का उत्पादन बढ़ेगा और अर्थिक समृद्धि आयेगी। शिव समाज का कल्याण करने वाले देवता है। मान्यता है कि समुद्र मन्थन में जो विष निकला था उसे ग्रहण कर शिव ने समाज का कल्याण किया था।
शायद जिसके बदले में समाज के लोगों ने प्रसन्न होकर शिव जी को दूध, दही, शहद, जल आदि से नहलाया था, चूंकि जब मझधार में फंसी हमारी नैय्या को जो पार कराता है उस पर अपना सबकुछ अपर्ण करने को मन व्याकुल हो उठता है। मैं तो यही कहना चाहूंगा कि जो भी व्यक्ति आपकी समस्या, कष्ट, रोग, आदि का निदान करें या सहयोग करें। उस मनुष्य का शिव की तरह से अभिषेक करेंगे तो शिव स्वतः प्रसन्न होकर आप पर कृपा बरसाने लगेगे। धर्म को यदि अन्धविश्वास न मानकर विश्वास किया जाये तो धर्म हमेशा समाज को सुदृढ़ होने का संदेश देता है।

सावन शिव का महीना ऐसा क्यों ?
रूद्र को अभिषेकप्रियः कहा गया है यानि उन्हे अभिषेक सबसे ज्यादा प्रिय है। इसलिए सावन के महीने में शिव का अभिषेक किया जाता है। सामान्यतः लोग जल से अभिषेक करते है और समृद्ध लोग दूध, शहद दही, आदि अनके द्रव्यों से अभिषेक करते है। मान्यता है कि श्रावण मास में शिव ने समुद्र मन्थन से उत्पन्न विष को जनकल्याण के लिए ग्रहण किया था, तब इन्द्र ने प्रसन्न होकर शीतलता प्रदान करने के लिए वर्षा की थी, इसी कारण श्रावण मास में शिव जी को जल अर्पित करने की परम्परा शुरू हुयी।

क्यों चढ़ाया जाता है शिव को दूध?
शिव जी की सवारी नन्दी है और गाय हमारी माता है, जो हमें अमृत समान दूध देती है। शिव ने विष पीया था, इसलिए उन्हे अमृत भेंट किया गया। यदि अमृत को बचाये रखना है तो गाय की रक्षा करनी होगी। गाय की रक्षा तभी हो सकती थी, जब इसके दिव्य पदार्थ को धर्म से जोड़ दिया जाये। इसी कारण भोले बाबा को दूध चढ़ाने की परम्परा शुरू हुयी। धर्म हमारे समाज का रक्षक है किन्तु जब यह घोर अडम्बरवादी बन जाता है, तब समाज का सबसे बड़ा भक्षक बन जाता है।

नालियों में न बहाने दें दूध
मैं पाठको से अपील करता हूं कि दूध अमृत के समान इसे नालियों में न बहायें और न बहने दें क्योंकि बच्चे का प्रथम भोज्य पदार्थ दूध ही होता है। अबोध बालक भगवान का साक्षात स्वरूप होता है। यदि मन्दिरों में दूध चढ़ाने की बजाय दूध की एक बॅूद भी किसी गरीब बच्चे की मुख में पड़ जायेगी तो भगवान शिव प्रसन्नता से गद्गद हो जायेंगे।

सावन के सोमवार का महत्व- 1
श्रावण मास में आशुतोष भगवान शंकर की पूजा का विशेष महत्व है। जो व्यक्ति सावन में प्रतिदिन पूजा नहीं कर सकते है, उन्हे सोमवार के दिन शिव पूजा और व्रत रखना चाहिए। सावन में पार्थिव शिव पूजा का विशेष महत्व बतलाया गया है। श्रावण मास में जितने सोमवार पड़ते है, उन सब में यदि व्रत रखकर विधिवत पूजन किया तो मनोकामनायें पूर्ण हो सकती है। सावन के मास में सोमवार को इतना महत्पूर्ण क्यों बताया गया है ?
सोमवार का अंक 2 होता है जो चन्द्रमा का प्रतिनिधित्व करता है। चन्द्रमा मन का संकेतक है और वह भगवान शिव के मस्तक पर विराजमान है।

सावन के सोमवार का महत्व-2
शायद इसलिए भोले नाथ इतने सरल व शान्त दिखते है। सावन में प्रेम प्रफुल्लित होकर अपना काम रूप धारण कर लेता है। इसी मास में सबसे ज्यादा संक्रमण होने की भी आशंका रहती है। कहा जाता है कि ''जैसा रहेगा तन वैसा रहेगा मन''। यदि आप संक्रमण से ग्रसित हो जायेगा तो आपका मन भी अस्वस्थ्य रहेगा और आप सावन के अद्भुत प्रेम से वंचित रह जायेगा। सोमवार को भोले बाबा का विधवित जल से अभिषेक कर पूजन करने पर चन्द्रमा बलवान होकर मन को उर्जावान बना देगा। लड़कियाॅ सोलह सोमवारों का व्रत रखकर प्रेम करने वाले पति की कामना करती है, इसके पीछे भी चन्द्रमा ही कारक है क्योंकि चन्द्रमा मन का संकेतक है। सच्चा प्रेम मन से ही किया जाता है तन से नहीं।












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