भाजपा पर नरेंद्र मोदी की पकड़ और मजबूत हुई
[नवीन निगम] भाजपा ने लंबे विचार विमर्श के बाद अगले आम और पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के मद्देनजर टीम मोदी का ऐलान कर दिया है। टीम बनते ही अब यह स्पष्ट हो गया है कि भाजपा पर मोदी-राजनाथ की ही पकड़ रहेगी और बाकी के नेता दूसरे से अब तीसरे दर्जे की सवारी करेंगे, यानी जिस तरह भाजपा में कभी अटल-आडवाणी की जोड़ी थी अब उसी तरह मोदी-राजनाथ की जोड़ी रहेंगी। इस इत्तेफाक ही कहिए कि पहले भी आडवाणी-अटल की जोड़ी में आडवाणी गुजरात से और अटल उप्र से आते थे और अब भी मोदी गुजरात से और राजनाथ उप्र से आते है यह अलग बात है कि मोदी उप्र से चुनाव लड़कर राजनाथ के इस भ्रम को भी तोड़ देंगे।
आज दिल्ली से प्रकाशित अखबारों को देखकर प्रतीत होता है कि मोदी का मीडिया प्रबंधन काम कर रहा हैं। सभी अखबारों ने कमोबेश एक ही एंगल रखा है कि भाजपा के कई आला नेता मोदी के नीचे काम करने के लिए तैयार नहीं थे। जब भाजपा के पितामह और अपने गुरु आडवाणी की मोदी ने नहीं चलने दी और उन्हें अपने सामने झुकने को मजबूर कर दिया। तो दूसरी पंक्ति के नेताओं की बिसात ही क्या थी।
खैर मोदी ने टीम चुन ली है और चुनते समय यह ध्यान रखा है कि कोई भी ऐसा नेता जो उनके खिलाफ रहा है अकेला किसी समिति में प्रभावशाली न रहे। जैसे चुनाव प्रचार समिति को सुषमा स्वराज को दिया गया है तो उनके साथ अरुण जेटली और अपने खास अमित शाह को भी समिति में रख दिया है जिससे सुषमा स्वराज की गतिविधियों पर नजर रखी जा सके। टीम पर नरेंद्र मोदी की छाप साफ देखी जा सकती है। हर अहम समिति में या तो वे खुद हैं या उनका कोई करीबी नेता।
मोदी केंद्रीय चुनाव समिति के अध्यक्ष हैं। इसके अलावा रैली समिति में वरुण गांधी, प्रचार एवं प्रसिद्धि समिति और नए मतदाता अभियान समिति में उनके करीबी अमित शाह, कांग्रेस यूपीए के खिलाफ आरोप पत्र समिति में मोदी की करीबी मीनाक्षी लेखी शामिल हैं। मोदी संघ की पसंद हैं और संघ की ओर से भाजपा में संगठन का काम देख रहे रामलाल को मोदी ने चुनाव संगठन समिति में जगह दी है। रामलाल आडवाणी के खिलाफ माने जाते हैं।
मोदी से नाराज माने जा रहे लालकृष्ण आडवाणी को बीजेपी ने चुनाव अभियान समितियों में भी मार्गदर्शक की भूमिका में रखा है। अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और पार्टी के अध्यक्ष राजनाथ सिंह केंद्रीय चुनाव समिति के मार्गदर्शक होंगे। अटल बिहारी वाजपेयी राजनीति से कई सालों से दूर हैं। लेकिन पार्टी सम्मान के तौर पर उनके नाम का इस्तेमाल अब भी करती है। लेकिन वस्तुत, बीजेपी की चुनाव समितियों में अटल बिहारी वाजपेयी की कोई भूमिका नहीं होगी। वहीं, राजनाथ सिंह चूंकि पार्टी अध्यक्ष हैं इसलिए मोदी भले ही सभी फैसलें लें लेकिन हर फैसले पर अंतिम मुहर राजनाथ की लगेगी।
लालकृष्ण आडवाणी मार्गदर्शक की भूमिका में हैं। यानी सीधे तौर पर आडवाणी का इन समितियों के कामकाज में कोई रोल नहीं होगा। हां पार्टी उनसे चुनावी मुद्दों पर सलाह मशविरा करती रहेगी। मोदी समितियों की मदद से फैसले लेंगे जिन पर पार्टी के अध्यक्ष राजनाथ सिंह अंतिम मुहर लगाएंगे। जाहिर है मोदी-राजनाथ की जुगलबंदी के बीच भाजपा की चुनावी योजनाओं में आडवाणी की कोई ठोस भूमिका नहीं दिख रही है। मतलब साफ है कि मोदी ने बीजेपी पर अपनी पकड़ और मजबूत बना ली है।













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