जब 24 साल बाद पलटे जिंदगी के पन्‍ने

Village
कहते हैं जब इंसान अंदर से घुटता है तब उसे अपने याद आते हैं जो बगैर किसी स्वार्थ के उससे जुड़े होते हैं दुनिया कितनी भी बदल जाए वो नहीं बदलते है। मेरा अपने तथा कथित गाँव से भी कुछ ऐसा रहा है अपने छतीस साल के जीवन में मैं कुल मिलाकर छत्तीस दिन भी गाँव में नहीं रहा पर पिछले कुछ दिनों से मैं उन लोगों की तलाश में हूँ जिनके होने से मैं हूँ,मेरी पहचान है।

ये ऐसे लोग नहीं जो चढ़ते सूरज को सलाम करते हैं, ये बस मेरे साथ हैं बगैर किसी टर्म एंड कंडीशन के ये मेरी यादों का हिस्सा हैं तो पिछले दिनों अपने पुराने मित्र उमेन्द्र से जौनपुर में मिला और अब बारी थी उस गाँव की जहाँ आख़िरी बार मैं मई 1989 में गया जब मेरे बाबा जी का निधन हुआ था शायद चार पांच दिन के लिए उससे पहले 1984 में अपने चाचा की शादी में और उसके पहले 1982 में अपनी बुआ की शादी में,इसके पहले का मुझे याद नहीं पर मेरी जानकारी मेरे तीनो गाँव प्रवास की कुल अवधि बीस दिन से ज्यादा की नहीं होगी पर गाँव यादों मे हमेशा रहा वो खेत खलिहान ट्यूब वेल आम की बाग,गर्मी की दोपहर इन्हीं यादों के सहारे थोडा बहुत गाँव के बारे में जानकर लिख पाता हूँ।

मेरा जन्म लखनऊ में ही हुआ और पढ़ाई लिखाई शहरों में ही हुई तो जिंदगी की दौड में गाँव कभी प्राथमिकता में नहीं रहा और सच मानिए ये यात्रा भी एक दुर्घटना का ही परिणाम थी अन्यथा मुझे नहीं लगता कि मैं कभी अपने गाँव जाऊँगा तो हुआ यूँ कि एक दिन अचानक सूचना मिली की हमारे बड़े फूफा जी का निधन हो गया (मेरा अपने रिश्तेदारों से कभी कोई ज्यादा संपर्क नहीं रहा इसके लिए मेरा अंतर्मुखी स्वभाव ज्यादा जिम्मेदार है ) और माता-पिता जी का वहां जाना जरूरी था।

मैं दोनों के स्वास्थ्य और उम्र को देखते हुए अकेले नहीं जाने देना चाहता था तो मैं भी चल पड़ा उनके साथ और तभी मुझे पता पड़ा बुआ जी के घर से गाँव ज्यादा दूर नहीं है तो तय यह हुआ कि क्यूँ न चलकर उस घर को भी देख लिया जाए जहाँ से मेरा इतिहास जुड़ा है। पिता जी उत्साहित हो गए अपने बचपन की जमीन देखने उन्हें भी यहाँ आये हुए बारह साल से ऊपर हो गया था|लखनऊ से फैजाबाद दो घंटे का भी रास्ता नहीं पर मुझे अपने गाँव तक की दूरी को तय करने में पच्चीस साल लग गए|

मेरा गाँव फैजाबाद के तारुन ब्लॉक में पड़ता है जो फैजाबाद से इलाहाबाद वाली रोड पर है यूँ तो फैजाबाद हर साल दो तीन बार जाना होता है अवध विश्वविद्यालय में, पर कभी गाँव नहीं जा पाया सौभाग्य से अवध विश्वविद्यालय उसी रोड पर है जो मेरे गाँव को जाती है जब भी कभी मैं वहां आता तो उस सड़क को देखकर सोचा करता था कि कभी इसी सड़क से हमारे दादा परदादा गुजरे होंगे मेरे पिता जी के संघर्ष के दिनों की साथी रही होगी ये सड़क और फिर अपना सर झटक वापस लखनऊ लौट आया करता था|

वैसे भी गाँव से जुड़ाव तब बना रहता है जब वहां के रिश्ते बने रहते गाँव में एक चाचा ही बचे रह गए बाकी सब लखनऊ में बस गए और चाचा जी ने जो गाँव में किया उससे लोग वहां जाने से बचने लग गए खैर फैजाबाद छोड़ते पिता जी ने यादों और किस्सों का पिटारा खोल दिया कौन सी रोड कहाँ जाती है किस साल कहाँ कब क्या हुआ माता जी की डोली कहाँ आ कर रुकी है?

और न जाने क्या क्या मैं भी उन रास्तों को पहचानने की कोशिश कर रहा था पर सब ब्लैंक कुछ धुंधली स्मृतियाँ और कुछ भी नहीं कच्ची पक्की सड़कों के साथ हिचकोले खाते हम अपने गाँव के करीब थे पर पिता जी भी अपने घर का रास्ता भूल चुके थे पर उनके चेहरे पर जो बाल सुलभ उत्साह था मैं बस उसको जी रहा था वो भी मेरी तरह स्थितिप्रज्ञ हो चुके हैं पर उस दिन वो काफी प्रसन्न लग रहे थे|

कुछ चिन्ह अभी नहीं मिटे थे पिता जी कुछ संशय में थे पर मैंने पहचान लिया था यही है मेरा गाँव| गाड़ी खड़ी करके हम सकरी गलियों से उस घर तक पहुंचे जिसे हम अपनी जड़ कह सकते थे जहाँ मेरे पिता का बचपन बीता जहाँ उनके पिता ने अपने परिवार को पाला पोसा पर आज उस घर में सन्नाटा बोल रहा था चाचा बाहर लेते हुए थे उनकी दशा देख कर मुझे और पिता जी को बहुत दुःख हुआ पर आज वो आज जिस हालत में है उसके दोषी वो खुद हैं।


पिता जी जब तक नौकरी में थे उन्हें नियमित रूप से पैसे भेजते रहे उससे पहले उनका जीवन बाबा की पेंशन से चलता था क्योंकि दादी बाबा बीमार रहने के कारण अकसर हम लोगों के साथ रहने लग गए थे पूरा घर खाली, उजाड जानवरों के रहने की जगह गिर चुकी थी,जो घर बचपने में बहुत बड़ा लगता था वो छोटा लग रहा था घर में घुसते वक्त सर झुका कर मैंने वो कमरा देखा जहाँ हम बचपने में रुका करते थे उस तालाब को भी दूर से देखा जहाँ गर्मी की दोपहर में गुजरते वक्त में माना जाता था वहां भूत रहता है वो ट्यूब वेल अब बंद थी|

एक वक्त में हमारा घर गाँव के सबसे अच्छे घरों में गिना जाता था ऐसा पिता जी बताते हैं आज वो घर अपनी हालत को रो रहा है उसके आस पास के सारे घर पक्के हो गए|पिता जी घर के अंदर नहीं गए वो बाहर ही बैठे रहे शायद ये उनका अपना तरीका रहा हो अपना गुस्सा दिखाने का क्यूंकि मैं उस दौर का गवाह रहा हूँ।

उन्होंने उस घर के लिए बहुत कुछ किया था उनकी प्राथमिकता में हमेशा उनके भाई बहन रहे और मैं इस बात के लिए अक्सर अपना प्रतिरोध दर्ज कराता हूँ कि आपने,अपने बच्चों को सबसे निचली प्राथमिकता में रखा और उनका सीधा जवाब रहता है दुवाओं में असर रहता है और हम सभी भाइयों के लिए भी यही सीख रहती है जिसकी जितनी मदद कर सकते हो बगैर किसी उम्मीद के कर दो पता नहीं उनकी सीख अपने जीवन में कितना उतार पाया हूँ पर कोशिश यही करता हूँ|

पिता जी के पहुँचते ही जिसने भी सुना वो घर आने लग गया घर पर बुजुर्गों की ठीक ठाक भीड़ लग गयी पुराने किस्से पुरानी बातें मैं पिता जी को उनकी यादों के सहारे छोड़ गाँव का चक्कर लगाने निकाल पड़ा सब कुछ बदल गया जनसँख्या के बढ़ने का असर दिख रहा था तालाब गायब कुएं पट चुके थे रास्तों की जगह घर खड़े थे हमारे पास वक्त ज्यादा नहीं था पिता जी भी चलना नहीं चाह रहे थे पर वो मेरे लिहाज में भरे मन से उठे हम गाड़ी की ओर चले तो पीछे लोगों का कारवां भी हमें छोड़ने चल पड़ा ।

आश्चर्य जनक बात ये थी कि उस कारवां में बच्चे बूढ़े महिलायें सभी थे शहर में ऐसे दृश्य विरले ही देखने को मिलते हैं हम गाड़ी में बैठने वाले थे कि एक बूढा व्यक्ति आया शायद पिता जी का कोई पुराना परिचित था और उनके गले लग गया ऐसा निस्वार्थ प्रेम बगैर किसी लाभ के अब दुर्लभ है कम से कम मैंने अपने जीवन में ऐसा अनुभव नहीं किया जो भी मिला मतलब से काम बनाया और अपनी राह ली मैं खुशनसीब था कि ऐसे लम्हों को जी पा रहा था |

पिता जी की आँखें नम थी गाड़ी आगे बढ़ चली थी मैं जानता था कि ये मेरी आख़िरी गाँव यात्रा थी अब दुबारा इस जीवन में गाँव आना नहीं होगा मैं भी पिता जी की तरह दुखी था उस घर की ये हालत देखकर और मेरा भी यही तरीका है जो चीज तकलीफ दे उसे भूल जाओ|

हम वापस लौट रहे थे ...........................

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