कहीं उल्टा पड़ जाए कांग्रेस का दांव

सीबीआई ने दावा किया है कि इशरत निर्दोष थी, लेकिन यह स्वीकार किया कि उसके साथ मारे गये तीन अन्य लोग आतंकवादी थे, संभवतसीबीआई और सरकार ने सोचा कि इस मामले में दिलचस्पी रखने वाले इसे आखिरी शब्द मानें, तभी एकाएक हालात गलत दिशा में जाने लगे, आइबी की अगुवाई कर रहे ईमानदार अधिकारी आसिफ इब्राहिम ने इसे मानने से इंकार कर दिया, इशरत मामले में आइबी और सीबीआई के बीच विवाद शुरू हो गया, तथ्य सामने आने लगे, जिसे अब तक सार्वजनिक नहीं किया गया था, खासकर, 2008 मुंबई हमले के आरोपी डेविड कोलमैन हेडली द्वारा पूछताछ के दौरान इशरत जहां का नाम लेने के संबंध में, अब हमलावर होने की जगह सरकार को अपनी लतियों को सुधारने में मशक्कत करनी पड़ सकती है।
फिलहाल इस तरह का आखिरी बड़ा मामला नब्बे के दशक में तब सामने आया था, जब इसरो जासूसी कांड को लेकर आइबी और सीबीआई एक-दूसरे से टकराये थे, दोनों ने एक-दूसरे पर आरोप लगाया था। इसी बीच कांग्रेस के साथ नई दोस्ती से प्रसन्न जदयू ने इशरत मामले में नरेंद्र मोदी को घेरने के चक्कर में इशरत को बिहार की बेटी बता दिया। लेकिन मोदी की किस्मत इस समय अपने चरम पर हैं। दो दिन ही नहीं हुए थे जदयू के बयान को कि आज बोधगया में आतंकवादियों का हमला हो गया अब इशरत मामले में बोल रही जदयू के बोल भी नरम पड़ सकते हैं।
क्योंकि केंद्र की खुफिया एंजेंसियों ने यह साफ कर दिया है कि बोधगया में खतरे की बात राज्य सरकार को बता दी गई थी। इशरत मामले में हद तो ये हो गई है कि इन तीन एजेंसियों के विरोधाभासी स्टैंड को भी अपनी सुविधा के हिसाब से देश की दो प्रमुख पार्टियां कांग्रेस और बीजेपी इस्तेमाल करने में लगी हैं। कांग्रेस की तरफ से दिग्विजय सिंह इस बात से खफा हैं कि आखिर हेडली के नाम से इशरत को फिदायीन कहने की खबरें मीडिया में कौन सी एजेंसी प्लांट कर रही है, तो बीजेपी के नेता कमोबेश एक सुर में इशरत और उसके साथ मारे गये लोगों की पृष्ठभूमि को जानबूझ कर दरकिनार करने का आरोप सीबीआई पर लगा रहे हैं। हद तो ये भी है कि राजनीतिक दल और उनके नेता तो ठीक, तीनों सरकारी एजेंसियां भी एक-दूसरे पर आरोप लगाने से अब चूक नहीं रही हैं। भारत के इतिहास में इस तरह की घटना इक्का-दुक्का ही हैं, जब देश की प्रमुख खुफिया एजेंसियां एक-दूसरे से लड़ रही हों, जीत किसकी होगी, कोई नहीं जानता।
जानिए क्या हुआ था 15 जून, 2004 को
15 जून, 2004 को अहमदाबाद पुलिस की क्राइम ब्रांच ने जब इशरत सहित चार लोगों को मुठभेड़ के बहाने मार डाला था, तो पहली बार इशरत का नाम देश के आम लोगों के जेहन में आया था, मीडिया के जरिये, उससे पहले ये नाम मुंबई के मुंब्रा इलाके मे रहने वाली शमीमा कौसर, उसके पड़ोसियों या फिर उस कॉलेज के छात्रों के बीच ही जाना-पहचाना था, जहां पढ़ती थी इशरत। इशरत जहां, जावेद, जीशान जौहर और अमजद अली को मारने के बाद अहमदाबाद पुलिस की क्राइम ब्रांच ने ये दावा किया कि इशरत सहित चारों लोग लश्कर के आतंकी थे, जो गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या करने के
इरादे से आये थे।
इस मुठभेड़ और मारे गये लोगों को असली साबित करने के चक्कर में गुजरात पुलिस की तरफ से ये भी कहा गया कि ये मुठभेड़ आइबी से मिली खुफिया सूचना के आधार पर अंजाम दी गयी है। लेकिन खुद आइबी का इस मामले में क्या स्टैंड था, ये पहली बार तब सामने आया, जब केंद्रीय गृह मंत्रालय की तरफ से गुजरात हाइकोर्ट में एक हलफनामा दाखिल किया गया। ये हलफनामा मंत्रालय के एक अधिकारी आरवीएस मणि ने 6 अगस्त 2009 को दाखिल किया, इशरत की मां शमीमा कौसर की उस याचिका के जवाब में, जिसमें इस पूरे मामले की सीबीआई जांच की मांग की गयी थी, हलफनामे में ही इस बात का इशारा किया गया था कि इसमें रखी गयी सूचनाएं केंद्रीय खुफिया एजेंसियों से मिली जानकारी के आधार पर डाली गयी हैं। हलफनामे में जोर देकर ये कहा गया कि इशरत जहां और उसके साथ मारे गये तीन और लोग लश्कर के ही आतंकी थे।
इस दावे के समर्थन में कई तर्क प्रस्तुत किये गये। इसमें ये कहा गया कि केंद्र सरकार को इस बात के पुख्ता सबूत मिले थे कि लश्कर-ए-तैयबा गुजरात सहित भारत के कई हिस्सों में आतंकी गतिविधियों को अंजाम देना चाहता है, साथ में कई बड़े नेताओं की हत्या की साजिश भी रच रहा है। हलफनामे के मुताबिक, लश्कर में ये जिम्मेदारी मुजम्मिल नामक आतंकी को दी गयी थी, जिसके नियमित संपर्क में था इशरत का दोस्त जावेद।
जावेद के बारे में ये भी कहा गया कि साजिदा नामक मुसलिम युवती से शादी करने के चक्कर में हिंदू से मुसलिम बने प्रणोश पिल्लै ने दो पासपोर्ट हासिल किये थे, पहला अपने मुसलिम नाम जावेद से, 1994 में और दूसरा 2003 में अपने हिंदू नाम प्रणोश पिल्लै से। जावेद ने अपने हिंदू नाम से दूसरा पासपोर्ट तब हासिल किया। जब उसका पहला पासपोर्ट वैध था।












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