बुन्देलखंड में बदलाव की मुहिम लाने में जुटी 'जमुनिया'
बैंगलोर। दरअसल ये जमुनिया कोई महिला न होकर एक नाट्य कृति है, जिसका मंचन इन दिनों ललितपुर में चल रहा है। केंद्र सरकार के सूचना प्रसारण मंत्रालय के प्रोडक्शन मैनेजर नरेन्द्र पांडेय ने बताया कि जमुनिया एक विधवा महिला के संघर्ष की ऐसी कहानी है, जिसने अपने बलबूते पर अशिक्षा और अज्ञान के अंधेरे में डूबे लोगों को जीने का मकसद दिया। शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी बुनियादी जरूरतों से लेकर उन्हें महिला सशक्तीकरण का सही अर्थ समझाया और खुद अनपढ़ महिला से साक्षर बन ग्राम प्रधान बनने तक का सफर तय किया।
खास बात है कि इस नाट्य कृति की प्रस्तुति में बुंदेली कलाकारों के शामिल होने से आम आदमी बेहतर तरीके से नाटक का मकसद समझ पा रहा हैं। इस नाटक का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों के सुदूर इलाकों में अशिक्षा एवं अज्ञानता में डूबे लोगों को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक करना एवं विकास की मुख्य धारा में लाते हुए सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा जैसी बुनियादी जरूरतों के प्रति जागरूक करना हैं।

महिला सशक्तिकरण पर आधारित नाटक का कथानक एक गांव है जिसमें रहने वाली एक विधवा महिला 'जमुनिया' की संपत्ति उसका देवर हड़प लेता है और समाज की आंखों में धूल झोंकने के लिए देवर उसका एक बच्चा छीनकर उसे धक्के मारकर घर से निकाल देता है। बेटी को अपने साथ लेकर जमुनिया दूसरे गांव पहुंचती है और एक बूढ़े चैकीदार के यहां झोपड़ी में रुक जाती है। वृद्ध चौकीदार उसे अपनी बेटी मानकर अपने घर रख लेता है। वहां जमुनिया बांस की टोकरी बनाना सीख कर अपनी बच्ची का भरण पोषण करने लगती है।
इसी बीच शारदा नामक महिला से उसकी दोस्ती हो जाती है। गांव में दाई नहीं होने से गर्भवती शारदा की दर्दनाक मौत हो जाती है। इस हादसे से जमुनिया विचलित हो उठती है और गांव में स्वास्थ केंद्र बनवाने की ठान लेती है। जमुनिया चैकीदार काका से इस उम्र मे पढ़ने की इच्छा जताती है और काका उसको प्रौढ़ शिक्षा केंद्र में प्रवेश दिला देते हैं। शिक्षा का उपयोग करके जमुनिया परेशान ग्रामीणों की मदद करती है, जिससे गांव में उसकी ख्याति फैलने लगती है।
इस बीच पंचायत चुनाव आते हंै और जमुनिया दशकों से जीतने वाले ग्राम प्रधान को पराजित कर गांव की प्रधान बन जाती हैं। जमुनिया आगे का सफर तय करती हुई जन सूचना अधिकार अधिनियम के तहत पूर्व में हुए घपलों को उजागर करती है और गांव के विकास में जुट जाती है। वह जिलाधिकारी व अन्य अफसरों से मिलकर स्कूल, अस्पताल व सड़क बनवाती है। इसके बाद जमुनिया अपनी ससुराल पहुंचती हैं और कानूनी मदद से बच्चा और पति की संपत्ति हासिल करती हैं।
बुन्देलखंड का अपने आप में गौरवशाली इतिहास है। यहां की महारानी लक्ष्मीबाई और अवंती बाई जैसी वीरांगनाओं की आज भी देश मिसाल देता है। बदले वक्त में बुन्देली महिलाओं में एक बार फिर ये जज्बा लौटाने, उन्हें अपने अधिकारों और सरकारी योजनाओं की जानकारी देने के लिए जमुनिया के जरिए की जा रही पहल सराहनीय है।












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