आडवाणी के बाद नीतीश ने भी मोदी को दिया वॉकओवर
लखनऊ। जो नरेंद्र मोदी चाहते थे सबकुछ उनकी मर्जी के मुताबिक ही हो रहा हैं। जहां आडवाणी ने इस्तीफा देकर और फिर मानकर मोदी को एक तरह से वाकओवर दे दिया उसी प्रकार एनडीए में मोदी के लिए संकट का सबब बने नीतीश कुमार भी उन्हें वाकओवर देने जा रहे हैं। नीतीश यही काम यदि कुछ दिन रूक कर करते तो मोदी के लिए ज्यादा परेशानी होती।
अभी चुनाव को कुछ महीने रह गए हैं। उससे पहले पांच राज्यों में चुनाव है जहां भाजपा कांग्रेस के मुकाबले अच्छी स्थिति में हैं। मोदी के पीएम उम्मीदवार बनने की आशंका से यदि वह अभी एनडीए छोड़कर चले जाएंगे तो वह सभी को फायदा पहुंचाएंगे। मोदी बिहार में भाजपा को अकेले चुनाव के लिए तैयार कर सकेंगे। लालू प्रसाद यादव को मौका मिल जाएगा कि वह अपना मुस्लिम वोट और पुख्ता कर सके।
नीतीश ने ऐसा करने की कोशिश की तो नरम हिंदू औरपिछड़ों का वोट उनके हाथ से निकल सकता हैं। क्योंकि नरेंद्र मोदी खुद पिछड़ी जाति से हैं। एक बार सोचिए यदि आडवाणी ने इस्तीफा न दिया होता और नीतीश गठबंधन को तोडऩे पर यूं अमादा न होते तो मोदी आगे नहीं बढ़ सकते थे और उन्हें काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ता। लेकिन जल्दबाजी में आडवाणी ने इस्तीफा देकर और फिर बिना कुछ हासिल हुए मानकर नीतीश को संदेश साफ कर दिया कि उनकी भाजपा में नहीं चल रही।

नीतीश इसी बात से घबराकर गठबंधन से जल्द बाहर निकल जाना चाहते हैं और यही उनकी सबसे बड़ी सियासी गलती है क्योंकि आडवाणी और नीतीश का अलग होना मोदी को पूरी आजादी प्रदान करेगा जो मोदी खुद चाहते है। उत्तर प्रदेश का इतिहास गवाह है कि जो भाजपा के साथ सरकार बनाने में एक बार चला गया उसे मुस्लिम वोट कभी नहीं पड़ता।
चाहे वह पानी पी पीकर भाजपा को कोसे। उत्तर प्रदेश में सपा इसका जीता जागता उदाहरण है। उसने कई बार भाजपा के साथ सरकार बनाई। मायावती आज चाहे कितनी बार भाजपा को सांप्रदायिक कहकर कोसे लेकिन मुस्लिम वोटर जानता है कि चुनाव बाद यदि सुविधा हुई तो वह तुरंत एनडीए का दामन थाम लेंगी। कुछ दिन पहले रणनीति के तहत मुलायम ने आडवाणी की तारीफ कर दी थी तो उन्हें भी कई मंचों पर सफाई देनी पड़ी।
इसलिए नीतीश जिस फायदे के चक्कर में भाजपा से अलग होना चाह रहे हैं। वह भी पूरा नहीं हो पाएगा। दूसरी तरफ लालू प्रसाद यादव है जो जनता दल की सरकार होने के बावजूद रथ लेकर निकले आडवाणी को गिरफ्तार कर चुके हैं। लालू के नए वोट बैंक राजपूत, यादव और मुस्लिम के सामने नीतीश का पिछड़ा वोट बैंक कहीं नहीं ठहरेगा। उनकी विकास पुरुष की छवि को मोदी अपनी छवि से मंद कर सकते हैं ऐसी दशा में नीतीश कुमार के हाथ कुछ नहीं लगेगा।
मेरे एक मित्र और बिहार के वरिष्ठ पत्रकार अक्सर मुझसे कहते रहते हैं ...नीतीश गठबंधन के बाहर नहीं जाएंगे। यदि गए तो उनके लिए वो कदम आत्महत्या के बराबर होगा। क्योंकि अभी जमीनी स्तर पर वह इसलिए जीतते है क्योंकि भाजपा का संगठन और संघ के प्रचारक उनके लिए काफी काम करते हैं। उनकी बात में कई बार सच्चाई उस समय दिखाई पड़ी जब नीतीश गठबंधन तोड़ते-तोड़ते वापस आ गए।
इस बीच जदयू प्रवक्ता राजीव रंजन ने कहा हैं कि अगर बिहार को पिछड़े राज्य का दर्जा दिया जाता है तो कांग्रेस के समर्थन की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। रंजन ने कहा कि राजनीति में सभी संभावनाएं खुली होती है। फिलहाल हम एनडीए का हिस्सा हैं। हमारी पहली प्राथमिकता गठबंधन पर फैसले को लेकर है। उधर कांग्रेस नेता और संसदीय कार्यमंत्री कमलनाथ ने टीवी न्यूज चैनलों से कहा कि कोई भी धर्मनिरपेक्ष दल सहयोगी दल हो सकता है। सभी धर्मनिरपेक्ष दलों के लिए हमारे द्वार खुले हुए हैं, अभी और भविष्य में भी।
इन बयानों के बाद अब यह साफ हैं कि नीतीश, मोदी से घबराकर कांग्रेस के पास जा सकते हैं लेकिन अगर उन्होंने ऐसा किया और कांग्रेस विशेष राज्य का दर्जा देने से मुकर गई या भाजपा ने सरकार में आने पर बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने की घोषणा कर दी तो नीतीश की राजनीति का क्या होगा। नीतीश के लिए यह समय राजनीति में एक एक चाल सावधानी से चलने का हैं कहीं वह जल्दबाजी में अपना नुकसान न करा बैठे।












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