एशिया में शुरू हुआ शीत युद्ध

[नवीन निगम] दूसरे विश्व युद्ध के बाद जिस प्रकार सोवियत संघ और अमेरिका के बीच शीत युद्ध शुरू हुआ था अब उसी तर्ज पर एशिया में एक नया शीत युद्ध आरम्भ हो गया है। यह शीत युद्ध सैनिक कम आर्थिक ज्यादा हैं। इसका कारण एशिया में पिछले कुछ वर्षों में चीन का अचानक आर्थिक रूप से कई देशों को पीछे छोड़ देना है। इधर जापान को पछाड़कर भारत इस समय दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुकी है। पहले नम्बर पर विराजमान अमेरिका को छोड़ दे तो उसके बाद की तीन सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था इस समय एशिया में ही है। दो नम्बर पर चीन, तीन पर भारत और चार पर जापान की अर्थव्यवस्था।

चीन जहां एक बड़ी अर्थव्यवस्था बना वहीं वह अपनी सैनिक शक्ति कोभी बढ़ाने में लगा रहा यह अलग बात है कि उसकी सैनिक शक्ति अभी अमेरिका या नाटो की सैनिक शाक्ति के सामने कुछ नहीं है। लेकिन आज अमेरिका के बाद चीन सबसे बड़ी सैन्य शक्ति है। यहां तक भी सबकुछ ठीक था लेकिन पिछले दिनों जब भारत ने वियतनाम में तेल की खोज का काम शुरू किया तो दक्षिण चीन सागर को अपना इलाका मानने वाला चीन इसे सहन नहीं कर सका। उसने भारत को चेतावनी दी, भारत ने पलटकर जवाब दिया तो ड्रैगन तिलमिला गया।

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भारत ने बहाना करके की, तेल नहीं मिल रहा है वहां कार्य समाप्त कर दिया। इसी के बाद चीन का जापान के साथ तीन द्वीपों को लेकर विवाद हो गया चीन कुछ ज्यादा आक्रमक हो गया हां यह अलग बात है कि जापान भारत की तरह पीछे नहीं हटा। इस दौरान चीन में जापान के कई प्रतिष्ठानों पर हमला हुआ जापान इस घटनाक्रम के बाद चीन में अपने निवेश को लेकर चिंतित हो गया।

इस बीच भारत जो अभी तक गुटनिरपेक्ष नीति का ही अनुसरण कर रहा था वह अमेरिका की आतंकवाद के खिलाफ मुहिम के कारण उसकी ओर झुकने लगा। कुछ वर्षों पहले जब चीन की आर्थिक शक्ति बढ़ी तो उसने नए बाजार की तलाश शुरू की। वह पश्चिम एशिया में आने और यहां अपनी शक्ति के प्रदर्शन में जुट गया। चीन की इसी गलती ने इस शीत युद्ध की आधारशिला रखी। भारत जो अभी तक किसी प्रकार की गुटबाजी से अपने को दूर किए हुए था वह हिंद महासागर में चीन की इस नई महत्वाकांक्षा से चिंतित हो गया। चीन अपने देश से लेकर हिंद महासागर से होता हुआ सूडान तक एक रास्ता बनाने में लग गया। जहां से वह अपने माल को आसानी से पश्चिम एशिया तक ले जाए। चीन के इस अभियान को स्ट्रिंग ऑफ पर्ल (मोतियों की माला) का नाम दिया गया।

चीन हिंद महासागर में भारत को घेरने में बुरी तरह लग गया क्योंकि इस क्षेत्र की सबसे बड़ी आर्थिक और सैनिक शक्ति भारत ही हैं। चीन ने हम्बनटोटा (श्रीलंका) और ग्वादर (पाकिस्तान) में बंदरगाहों का निर्माण शुरू कर दिया। इसीलिए आजकल भारत अपनी सारी सैनिक शक्ति चेन्नई के आसपास बढ़ा रहा है पहले भारत अपनी सैनिक शक्ति उत्तर भारत में ही जमा करता था। भारत ने पिछले दिनों जितने भी टोही विमान और लडा़कू विमान खरीदे है उन्हें या तो नौसेना को दिया है या उन्हें चेन्नई के आसपास स्थापित किया है।

इसी बीच चीन ने भारत को अमेरिका और जापान की गुटबंदी से आगाह करने और चेतावनी देने के लिए उसके 19 किमी इलाके में घुसपैठ की। चीन को आशा थी कि भारत अपनी जमीन बचाने के लिए चीन के आगे आसानी से झुक जाएगा लेकिन चुमार में आगे बढ़कर भारत ने अपने इरादे चीन को साफ-साफ बतला दिए। भारत में होने वाले नुकसान को ध्यान में रखकर चीन पीछे हट गया। चीन के प्रधानमंत्री भारत से रवाना होने के बाद पाक पहुंचे तो भारत के प्रधानंमत्री जापान, श्रीलंका के राष्ट्रपति इस समय चीन यात्रा पर है तो मनमोहन थाईलैंड की। चीन ने श्रीलंका को अरबों डॉलर सहायता के रूप में देने का फैसला किया है। इसीलिए जब श्रीलंका के खिलाफ यूएनओ में प्रस्ताव आया तो डीएमके के विरोध के बावजूद भारत ने अपनी विदेश नीति में कोई परिवर्तन नहीं किया।

चीन जहां श्रीलंका और पाक के साथ दोस्ती बढ़ाकर भारत को घेरने की कोशिश कर रहा है वहीं भारत, जापान और आस्ट्रेलिया चीन को एक डायमंड के रूप में घेरने की योजना पर काम कर रहे है और इस योजना को अमेरिका का समर्थन प्राप्त है। ध्यान देने वाली बात यह है कि पहले शीत युद्ध और फिर परमाणु परीक्षण के कारण नब्बे के दशक तक भारत से दूरी बनाए रखने वाला जापान अब भारत के सबसे नजदीक हैं। चीन जानता है कि भारत और जापान की बढ़ती दोस्ती उसके सारे मंसूबों पर पानी फेर देंगी। इसीलिए जापान की यात्रा पर जैसे ही मनमोहन सिंह रवाना हुए चीन के सरकारी अखबारों ने जापान के खिलाफ जहर उगलना शुरू कर दिया। अब एशिया में शुरू यह आर्थिक शीत युद्ध कही वास्तविक शीत युद्ध में न बदल जाए।

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