छत्तीसगढ़ के हाईटेक नक्सलियों के पास 10,000 से ज्यादा लड़ाके
रायपुर। बस्तर के दरभा घाटी में जिस तरह से नक्सलियों ने मौत का तांडव रचा, उसे देखकर नौकरशाहों, धनपशुओं और ठेकेदारों के पैरों की जमीन खिसक गई होगी। कभी आगे, कभी पीछे होकर नक्सलियों का समर्थन करने वाले राजनेताओं के ऊपर जब नक्सलियों का हमला हुआ तो उन्हें भी छठी का दूध याद आ गया। बस्तर टाइगर आदिवासी नेता महेंद्र कर्मा की जिस बेरहमी से हत्या की गई, उसे देखकर और सुनकर अब नेता बस्तर के सुकमा, दंतेवाड़ा, नारायणपुर और बीजापुर नहीं जाएंगे। कमोवेश उड़ीसा के कोरापुट, नवरंगपुर, मलकानगिरी की भी हालत कुछ ऐसी ही है।
नक्सलियों की ताकत पर नजर डालें तो उन्होंने अपना क्षेत्र बढ़ा लिया है। उनके पास खतरनाक हथियारों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। सूचना के तमाम नई तकनीक उनके पास उपलब्ध हैं। नक्सलियों की असली ताकत गुरिल्ला लड़ाई में पारंगत उनकी सैन्य कंपनियां हैं।
पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी की कंपनियां तीन से दस हो चुकी हैं। वे लगातार इलाके का विस्तार और सदस्यों की संख्या बढ़ा रहे हैं। एक माह पहले ही उन्होंने कांकेर और राजनांदगांव के इलाके को मिलाकर नया डिवीजन बनाया है। इससे यह स्पष्ट होता है कि नक्सली राजधानी की तरफ पांव बढ़ा रहे हैं। हालांकि इससे इन्कार भी नहीं किया जा सकता कि पुलिस के दबाव और लगातार कार्रवाई से गरियाबंद, राजनांदगांव, कांकेर जिले के कुछ हिस्सों में वे कमजोर पड़े हैं। जंगल वॉरफेयर विशेषज्ञों की मानें तो नक्सलियों के इलाके में जाकर लडऩे के लिए उनसे चार गुना ज्यादा ताकत चाहिए। वे वहां के इलाके से अभ्यस्त होते हैं। दरख्तों और पत्थरों के बीच दुबकने और भागने के आदी होते हैं। ऊपर से गुरिल्ला युद्ध उन्हें और भी प्रभावी बनाती है।
डा. प्रताप अग्रवाल के अनुसार नक्सल प्रभावित जिला को केंद्र और राज्य सरकार इतना पैसा देती है कि अगर उसे पूरी तरह खर्च किया जाए तो जि़लों की तस्वीर बदल जाए। लेकिन अथाह पैसा मिलने के बाद भी बस्तर की बहुसंख्य आबादी बिना बिजली और शौचालय के रहती है। अस्पताल जाने के लिए मीलों पैदल चलना पड़ता है, अर्थी की तरह जिंदा व्यक्ति को कंधे पर उठाकर अस्पताल तक ले जाना पड़ता है। कई जगहों पर वे नक्सलियों पर अभी भी निर्भर हैं। एडीजी नक्सल आरपेशन आरके विज ने बताया कि नक्सली अपने फोर्स को बहुत मजबूत करने में जुटे हुए हैं। कुछ जगहों पर फोर्स के दबाव में उन्हें वापस जरूर होना पड़ा है लेकिन वे लगातार अपना बल बढ़ा रहे हैं। आईये बात करते हैं छत्तीसगढ़ के नक्सलियों की ताकत की।

कहां से आता है पैसा
कहाँ क्या खर्च हो रहा है, इसका कोई हिसाब नहीं? क्योंकि जहां पैसे कथित तौर पर खर्च हो रहे हैं वहां तो पुलिस भी नहीं जा पाती? जाहिर है ये पैसा नेता, नौकरशाह और ठेकेदारों की तिकड़ी बांट कर खा रही है और इसका एक बड़ा हिस्सा नक्सलियों को भी दिया जाता है। नक्सली इलाक़ों के व्यापारियों से रंगदारी टैक्स वसूला जाता है। आदिवासियों के शोषण की लाख गुहार की जाए नौकरशाहों की आंखें नहीं खुलती हैं। जब तक इन नौकरशाहों, नेताओं और ठेकेदारों पर नकेल नहीं कसी जाएगी, नक्सली आंदोलन का खात्मा नहीं किया जा सकता है।

गुरिल्ला आर्मी
नक्सलियों की पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी की कंपनियां तीन से दस हो चुकी हैं। वे लगातार इलाके का विस्तार और सदस्यों की संख्या बढ़ा रहे हैं। गुरिल्ला आर्मी जंगलों में हथियों से लैस होकर चलते हैं और चाहे कितना ही घना जंगल क्यों न हो, ये कभी भटकते नहीं। इन्हें विशेष रूप से उसी के लिये प्रशिक्षित किया जाता है, कि वे जंगल में लड़ सकें। इन्हें जंगली जानवरों का कतई खौफ नहीं होता।

नक्सलियों के पास एके 47
नक्सलियों के पास एके 47, एके 57, लाइट मशीनगन और टू इंच मोर्टार से लैस लड़ाके हैं। 65 से 100 सदस्यों के साथ चलने वाली ये कंपनियां घात लगाकर हमला करती हैं और 300 से 400 जवानों पर भारी पड़ती हैं। ताड़मेटा जैसे बड़े हमलों को अंजाम देने वाली इस कम्पनी में कम से कम 10 हजार लड़ाके हैं।

नक्सली आंदोलन बढऩे के कुछ अन्य कारण
• राजनीतिक इच्छा शक्ति की कमी
• आंध्रप्रदेश की तरह पुलिस, प्रशासन और खुफिया तंत्र एक ही दिशा में काम नहीं कर पा रहे हैं।
• नक्सल प्रभावित इलाकों में विकास तो दूर, सड़कें तक नहीं बन पा रहीं।
• एंटी नक्सल फोर्स तो बनी, पर खुफिया सूचनाओं के अभाव में उसका स्ट्राइक रेट बेहद कमजोर।

10 साल में आयी कितनी ताकत
पिछले दस सालों की बात करें तो 2003 से लेकर 2013 तक नक्सलियों की ताकत कुछ इस प्रकार बढ़ गई है। 2003 में जहां इनके सिर्फ चार डिवीजन थे, वहीं अब 12 डिवीजन हैं। दो बटालियन हो चुकी हैं, प्लाटून 6 से बढ़कर 41 हो गईं। गुरिल्ला कंपनी 30 से बढ़कर 110 कंपनियां हो गई हैं। वहीं हथियारबंद लड़ाके 1 हजार से बढ़कर 10 हजार हो चुके हैं।












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