राजीव गांधी की एक गलतफहमी और हो गया बड़ा नुकसान

[नवीन निगम] आपने कभी-कभी दफ्तरों में देखा होगा कि बॉस का सबसे पसंदीदा व्यक्ति अन्य लोगों की आंखों में कितना खटकता है और वह उसे बॉस की नजर से गिराने के लिए कैसे-कैसे कुचक्र रचते हैं। 1984 में भारत के सबसे युवा प्रधानमंत्री बने राजीव गांधी के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था। 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद प्रधानमंत्री बने राजीव गांधी युवा थे और युवाओं की तरह ही सोचते थे। वह देश को बदलना चाहते थे। उनके मन में पुराने घाघ कांग्रेसी नेताओं के लिए कोई जगह नहीं थी।

इसलिए जब इंदिरा गांधी की हत्या के बाद देश में आम चुनाव हुए तो उन्होंने अपने जैसे ही ईमानदार नेता को अपना सबसे बड़ा विश्वसनीय बनाया और वह नेता थे वीपी सिंह। नारायण दत्त तिवारी जैसे कद्दावर नेता जिनकी इंदिरा गांधी के समय में तूती बोलती थी, को दरकिनार करते हुए राजीव गांधी ने 1984 के आम चुनाव में उप्र में लोकसभा के टिकट बांटने की जिम्मेदारी भी वीपी सिंह को सौंप दी थी।

बाद में राजीव ने अपनी सरकार में उन्हें नम्बर दो का दर्जा देते हुए वितमंत्री भी बनाया। वीपी सिंह के कहने पर राजीव जीरो पॉलिसी लेकर आए जिससे घाटे में चल रहे कई संस्थानों का निजीकरण हुआ या उन्हें बंद कर दिया गया, लेकिन वीपी सिंह पर राजीव गांधी की यह मेहरबानी अन्य बड़े कांग्रेसी नेताओं को रास नहीं आ रही थी। राजीव से पूरे अधिकार हासिल किए वित्तमंत्री वीपी सिंह ने भारत के बड़े व्यापारिक घरानों पर सही टैक्स अदा करने और व्यापार के गलत तरीके अपनाने पर रोक लगाने की चेतावनी दी।

लोग बताते हैं कि यही वो जगह थी जहां से भारत के बड़े औघोगिक घरानों ने वीपी सिंह को वित्तमंत्री के पद से हटाने की शुरुआत की, लेकिन यह काम बहुत कठिन था क्योंकि वीपी सिंह का हटना तब तक संभव नहीं था जब तक राजीव गांधी का मन वीपी सिंह की तरफ से खट्टा नहीं किया जाता। वीपी सिंह के अलावा राजीव गांधी के यदि कोई करीब था तो वह थे उनके बचपन के मित्र अमिताभ बच्चन।

कहते हैं कि इलाहाबाद से सांसद अमिताभ बच्चन की यह हैसियत थी कि उन्हें लखनऊ के एयरपोर्ट पर रिसीव करने के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह जाया करते थे। ऐसा कहा जाता है कि वीपी सिंह के बढ़ते दबदबे से अमिताभ भी खुश नहीं थे। क्योंकि वो अपने को राजीव का सबसे करीबी समझते थे और यही से वो काम शुरू हुआ जिसे हम आए दिन अपने दफ्तरों में देखा करते है। राजीव गांधी के अन्य करीबी मित्रों ने वीपी सिंह के खिलाफ राजीव गांधी के कान भरने शुरू किए।

राजीव भी सरल स्वभाव के व्यक्ति थे, उन्होंने देखा कि जब वीपी सिंह के बारे में सब उनसे इतना कुछ कहते है तो उनका विभाग बदल दिया जाए। राजीव गांधी ने उन्हें वित्त से हटाकर रक्षामंत्री बना दिया। राजीव गांधी की इसके पीछे यह सोच रही होगी कि इससे व्यापारिक घरानों और वीपी सिंह के बीच जो छत्तीस का आंकड़ा है वो खत्म हो जाएगा। रक्षा मंत्रालय, वित्त की तरह आला मंत्रालय माना जाता था।

यही वो समय था जहां से वीपी सिंह के दिल में यह बात आ गई कि उनके बॉस (राजीव गांधी) ने व्यापारिक घरानों के दबाव में आकर उन्हें वित्तमंत्रालय से निकाला हैं। गलतफहमियों की शुरुआत हो चुकी थी कांग्रेस के जिन नेताओं ने इसे शुरू किया था वह भी नहीं जानते थे कि इसका अंजाम क्या होगा और यह कांग्रेस को आगे चलकर कितना नुकसान पहुंचाएगा।

राजीव से खिन्न वीपी सिंह ने राजीव गांधी को पूरी तरह जाने बगैर बे-मन से रक्षामंत्री के रूप में कामकाज शुरू किया। रक्षामंत्रालय में पुराने समय से घोटाले होते ही रहते थे। तभी वीपी सिंह को बोफोर्स तोप सौदे के बारे में पता चला। शुरुआत में वीपी सिंह ने इसकी चर्चा राजीव गांधी से की और राजीव गांधी ने अन्य वरिष्ठों से। सौदे में राजीव गांधी के खास मित्र के भाई का नाम भी था, लोग बताते है कि राजीव गांधी के लगा कि वीपी सिंह अपने हटाए जाने के कारण वो नाम ले रहे है, लेकिन वीपी सिंह को लगा कि राजीव पुराने कांग्रेसी नेताओं की तरह हो गए है।

उन्होंने इस सौदे के बारे में सार्वजनिक चर्चा करना शुरू कर दिया। यहां एक खास बात यह थी कि जब वीपी सिंह ने यह विद्रोह किया यहां तक की वह राजीव को छोड़कर कांग्रेस के बाहर आ गए तब भी वीपी सिंह ने काफी समय तक बोफोर्स सौदे में दलाली लिए जाने के लिए राजीव गांधी को दोषी नहीं ठहराया। राजीव गांधी और वीपी सिंह तब भी एक दूसरे को पसंद करते थे लेकिन इलाहाबाद लोकसभा उपचुनाव जीतने के बाद वीपी महत्वाकांक्षी हो गए और देवीलाल के प्रभाव में आ गए। तब जाकर वीपी सिंह ने बोफोर्स में सीधे राजीव गांधी का नाम लेना शुरू किया और प्रधानमंत्री बनने की राह पर बढ़ चले।

राजीव गांधी की पुण्यतिथि पर आज मैं इन बातों का उल्लेख इसलिए कर रहा हूं जिससे लोगों को पता चले कि एक छोटी सी गलतफहमी ने किस तरह भारत का नुकसान कर दिया। यदि राजीव गांधी और वीपी सिंह साथ रहे होते तो देश में न कभी राजनीतिक अस्थिरता रहती और न ही छोटे-छोटे ऐसे दल उभरते जो सिर्फ क्षेत्रीय राजनीति करते। लेकिन कांग्रेस के दो शीर्ष नेताओं के बीच हुई छोटी सी गलतफहमी ने न केवल देश के विकास की गति को धीमा किया बल्कि देश को गठबंधन की ऐसी सरकारों को सौंप दिया जिसमें शामिल क्षेत्रीय दल देश से ज्यादा क्षेत्रीय हितों को केंद्रीय सरकार में बैठ कर साधने लगे।

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