भारत के हाथ में है चीन का रिमोट कंट्रोल

[नवीन निगम] चीन के प्रधानमंत्री से पहली मुलाकात में मनमोहन सिंह का सीमा विवाद पर बात करना भारत की सोची समझी रणनीति का हिस्सा है। चीन के साथ बातचीत कर रहे भारतीय रणनीतिकार जानते है कि चीन की एक कमजोर नस है और वह हैं भारत का बाजार। यूं कहिये कि चीन की अर्थवयवस्‍थसा का रिमोट कंट्रोल का म्‍यूट बटन भारत के हाथों में ही है और इस बाजार के लिए चीन कुछ भी करने को तैयार हो जाएगा।

इसीलिए आज देश के प्रमुख अखबारों में चीन के प्रधानमंत्री का लेख प्रमुखता से छपा है। जिसमें सीमा विवाद से भारत में उपजे गुस्से को शांत करने की कोशिश की गई है। ज्ञात हो कि चीन की घुसपैठ के समय अधिकतर मीडिया यही लिखने में व्यस्त था कि चीन ने भारतीय सेना को झुकाकर समझौता किया है लेकिन वनइंडिया ने हमेशा कहा कि भारत का बाजार चीन के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण है और जैसे ही भारत में चीन के खिलाफ नकारात्मक माहौल बनना शुरू हुआ तभी चीन की सेना पीछे हटी। भारत ने चुमार में अपने बंकर भले ही तोड़े हो लेकिन बंकर से आज की नई युद्ध प्रणाली में कोई खास मदद नहीं मिलती।

आज सेटेलाइट तकनीक इतनी विकसित हो चुकी है कि जमीन पर चलते व्यक्ति की फोटो भी टोही विमान से ली जा सकती है। आज एक खास बात भारतीय मीडिया भी जान ले। यदि सेना और सरकार नहीं चाहती तो चीन की सेना ने भारत में घुसपैठ की है इसकी खबर मीडिया को नहीं लग पाती। सेना ने जानबूझकर इस खबर को लीक किया। नहीं तो चीनी सेना के साथ ऐसे विवाद हर महीने दो महीने पर भारतीय सेना के होते ही रहते है।

भारत चीन से सीमा विवाद और बह्मपुत्र नदी पर बांध बनने के मामले को हल करना चाहता है। इसीलिए भारतीय रणनीतिकार यह देखना चाहते थे कि चीन किस बात को ज्यादा महत्व देना चाहता है। भारतीय रणनीतिकारों का अनुमान बिलकुल सटीक बैठा है चीन के लिए भारतीय बाजार ज्यादा महत्वपूर्ण है इसीलिए वह सीमा विवाद को हल करने की दिशा में बढ़ता दिखाई पड़ रहा है।

भारत जानता है कि अभी व्यापार संतुलन चीन के पक्ष में है। 70 अरब डॉलर के भारत चीन व्यापार में चीन भारत को 50 अरब डॉलर का सामान भेजता है और भारत चीन को मात्र 20 अरब डॉलर का। इसीलिए चीन के प्रधानमंत्री ने आज देश के कई समाचार पत्रों में लिखे अपने लेख में इस बात का भी जिक्र किया है कि भारत को चीन के बाजार में और प्रवेश कराया जाएगा।

विश्व में आजतक जितनी भी जंग हुई उनके पीछे आर्थिक कारण ही महत्वपूर्ण रहा, चीन ने भी भारत पर 1962 में इसलिए आक्रमण किया क्योंकि तिब्बत की सरकार भागकर भारत आ गई थी। आज चीन जानता है कि उसकी सबसे बड़ी बाधा, तिब्बत पर उसके अधिकार को भारत मान्यता दे चुका है। जबकि अमेरिका अभी भी तिब्बत पर चीन के अधिकार पर मौन है। यानी वो तिब्बत पर चीन के अधिकार को नहीं मानता हैं। ऐसी दशा में यदि वो भारत से सीमा विवाद सुलझा ले तो उसे तिब्बत पर अमेरिकी स्वीकृति की जरुरत कभी नहीं पड़ेगी।

चीन मामलों को देख रहे भारतीय रणनीतिकार बदले परिवेश में चीन की मजबूरियों को समझ रहे है और इसीलिए भारतीय खेमा चीन से सीमा विवाद का हल करवाने के लिए बराबर प्रयासरत है। इसीलिए मनमोहन सिंह ने चीन के प्रधानमंत्री से पहली ही मुलाकात में सीमा विवाद का मामला उठाया हैं। यदि लद्दाख में भारत ने झुककर कोई समझौता किया होता तो वह चीन के प्रधानमंत्री के सामने इस मुद्दे को नहीं उठाते, क्योंकि ऐसा करने पर चीन समझौते ही बात खोलकर भारत सरकार को परेशानी में डाल सकता था।

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