अब बार-बार नहीं होंगे IAS ऑफीसर्स के तबादले!
लखनऊ (ब्यूरो)। सरकार बदलने और राजनेता की गलत बात न मानने पर तबादले की मार झेलने वाले आईएएस, आईपीएस व आईएफएस अधिकारियों को राहत मिलने वाली है। उनके आए दिन होने वाले तबादलों के मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ पीठ ने केंद्र सरकार से पूछा है कि स्थानांतरण के संबंध में निश्चित कार्यकाल संबंधी नीति क्यों नहीं तय की जा रही है।
मुख्य न्यायमूर्ति शिवकीर्ति सिंह व न्यायमूर्ति सुधीर कुमार सक्सेना की पीठ ने केंद्र सरकार को दो हफ्ते में इस संबंध में स्पष्ट निर्णय लेने का निर्देश दिया है। पीठ ने केंद्र से कहा है कि यदि वह अखिल भारतीय सेवकों के संबंध में प्रदेश में उनके कार्यकाल को लेकर निश्चित समय तय करने संबंधी अधिसूचना नहीं जारी करना चाहता है तो इसका स्पष्ट और साफ कारण बताए। मामले की अगली सुनवाई दो सप्ताह बाद होगी।

पीठ ने यह आदेश लोक प्रहरी संस्था की एक विचाराधीन जनहित याचिका पर पारित किया। वर्ष 2011 में संस्था के महासचिव पूर्व आईएएस एसएन शुक्ला ने याचिका दायर कर कहा था कि 2006 में प्रधानमंत्री की सहमति से केंद्र ने अखिल भारतीय सेवाओं से संबंधित नियमावली में संशोधन किया। इसके तहत तय किया गया कि राज्यों से विचार कर केंद्र सरकार अखिल भारतीय सेवाओं से संबंधित सभी कैडर के अधिकारियों के स्थानांतरण के संबंध में एक अधिसूचना जारी करेगी। इसमें यह तय किया जाएगा कि अधिकारी का स्थानांतरण निश्चित समय के लिए हो और उससे पहले उसे स्थानांतरित न किया जाए।
याची ने कहा 2007 से अब तक केंद्र ने चाहे मायावती सरकार रही हो या अखिलेश सरकार कई बार पत्र व्यवहार किया और परामर्श किया, लेकिन राज्य सरकार ने बिना कोई कारण बताए अपनी सहमति देने से इंकार कर दिया। याची की ओर से तर्क प्रस्तुत किया गया कि 2006 की संशोधित नियमावली में राज्य सरकारों से विचार-विमर्श की बात कही गई है न कि उनकी सहमति लेने की। इसलिए केंद्र सरकार को अधिकार है कि वह स्वयं अधिसूचना जारी कर अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों का किसी पद पर निश्चित कार्यकाल संबंधी नियमावली बना दे। यह भी कहा गया कि देश के 13 राज्यों में ऐसी नियमावली बन चुकी है। केंद्र की ओर से एडीशनल सालिसीटर जनरल केसी कौशिक ने कहा उत्तर प्रदेश सरकार नियमावली बनाने के लिए अपनी सहमति नहीं दे रही है।












Click it and Unblock the Notifications