अफजल गुरु : न्याय और राजनीति का पटाक्षेप
इस लिहाज से राजनीति का भी पटाक्षेप हो गया। इन फांसियों को सामान्य हत्यारों को दी जाने वाली सजा के नजरिए से देखना उचित नहीं होगा। इसका कारण यह है कि आतंकवाद और अस्थिरता गहरे तौर पर राजनीतिक गतिविधियां हैं, इसलिए इन फांसियों का राष्ट्रीय राजनीतिक परिदृश्य पर असर पड़ना लाजिमी है।
जहां तक कसाब का मामला है तो उसे दी गई फांसी मामूली बात है। चूंकि वह एक विदेशी, पाकिस्तानी नागरिक था और वह अपने आकाओं के इशारे पर विध्वंस और हत्याओं को अंजाम देने के लिए भारत में घुसा था। इस लिहाज से उसकी मौत से भारत में कोई समस्या खड़ी नहीं हो सकती।
अफजल गुरु का मामला अलग है। हालांकि उसने भी वैसे ही आतंकवादी कारनामे को अंजाम दिया, जैसा कि कसाब का था और दोनों के आका विदेशी ही थे, फिर भी अफजल एक हिंदुस्तानी नागरिक था। उसकी अदालती सुनवाई, सजा, दया याचिका और फांसी का राजनीतिक परिणाम सामने आ सकता है। इसलिए पाकिस्तानी मामले में सरकार ने जितनी सतर्कता बरती थी, उससे कहीं ज्यादा फूंक-फूंक कर कदम बढ़ाना चाहिए था।
सरकार की मुसीबतें इस तथ्य से और गहरी हो रही थी कि अपनी मुस्लिम विरोधी छवि के लिए दुनिया भर में प्रख्यात राष्ट्रीय स्वयं सेवक (आरएसएस) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) जैसे संगठन राजनीतिक लाभ के लिए मामले को उछालते रहे। ये संगठन यह आरोप लगाने से भी नहीं चूके कि सरकार मुस्लि समुदाय की नाराजगी मोल नहीं लेना चाहती, इसलिए फांसी पर फैसला लेने पर असमंजस में है। भाजपा के पूर्व अध्यक्ष नितिन गडकरी ने तो यहां तक कहा था कि फांसी की सजा पाए कैदी को सरकार दामाद की तरह रखे हुए है।
इसमें कहीं से भी संदेह नहीं कि सर्वोच्च न्यायालय से 2002 में ही फांसी की सजा पर मुहर लग जाने के बाद इस पर अमल करने में एक दशक का समय लगने के पीछे राजनीति एक कारक के रूप में रही। भाजपा, सरकार पर मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति अपनाने का आरोप लगाती है। सरकार फांसी के लिए सही वक्त सुनिश्चित करने में जुटी थी। यह कहना अनुचित नहीं होगा कि इसके पीछे सतर्कता थी।
इस डर को सुनिश्चित कर लेने की मंशा थी कि कहीं फांसी से मुस्लिम समुदाय आहत नहीं महसूस करे। इसके अलावा कुछ धड़ों को यह न लगे कि अफजल मामले में साफ सुथरा न्याय नहीं हुआ। हालांकि ये शंकाएं निर्मूल साबित हुईं। इसका कारण यह है कि भारतीय मुस्लिम समाज का एक बड़ा तबका आतंकवाद के बिल्कुल खिलाफ खड़ा है। यहां तक कि जम्मू-कश्मीर में ही केवल एक छोटा-सा गुट भारत विरोधी है और वह भी इसलिए क्योंकि उन्हें पाकिस्तान से इसके लिए मदद मिलती है।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।













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