क्या, कौन और कहाँ है ‘मैं’?
यह ‘मैं' ही मानव की हर समस्या का जड़ है और उपरोक्त तीनों प्रश्नों का उत्तर है ‘ईश्वर'। ‘मैं' क्या व कौन है? का उत्तर है ईश्वर और ‘मैं' कहाँ है? प्रश्न का उत्तर है ‘मैं' में। चलिए अब एक उदाहरण के जरिए इसे सिद्ध करते हैं। मानव जीवन भर अपनी देह को ही ‘मैं' समझता है, जो सत्य से दूर या पास नहीं, बल्कि सत्य ही नहीं है। यह मान्यता केवल भ्रांति है। निम्न उदाहरण को पढ़ कर स्वयं समझने का प्रयास करें कि मानव की देह में बैठ कर ‘मैं' बोलने वाला कौन है, क्या है और कहाँ है?
एक व्यक्ति को मधुमेह यानी डाइबिटीज का रोग था। इसी दौरान उसके पैर में घाव हुआ और मधुमेह के कारण वह घाव भरने का नाम नहीं ले रहा था। डॉक्टर्स की लाख कोशिश के बावजूद उसे गेंगरीन हो गया। ऑपरेशन टेबल पर डॉक्टर ने उस मधुमेह पीड़ित व्यक्ति से कहा, ‘गेंगरीन फैलता जा रहा है। इसीलिए इसे रोकने के लिए घाव वाले हिस्से तक यानी घुटने तक पैर काटना पड़ेगा, वर्ना जान चली जाएगी।' मरीज बोला, ‘यदि ऐसा ही है, तो पैर का उतना हिस्सा काट दीजिएगा, परंतु ‘मैं' तो बच जाऊँगा ना?' डॉक्टर ने कहा, ‘हाँ'। और उस मरीज ने अपना एक पैर घुटने तक कटवा दिया। कुछ दिन बाद फिर यही हालात पैदा हुए। फिर डॉक्टर और मरीज के बीच यही संवाद हुआ।

मरीज बोला, ‘पूरा पैर काट दीजिए, लेकिन ‘मैं' तो बच जाऊँगा ना?' डॉक्टर ने कहा, ‘हाँ।' डाइबिटीज कन्ट्रोल में नहीं आ रहा था और गेंगरीन दूसरे पैर, फिर एक हाथ, फिर दूसरे हाथ तक फैल गया। फिर वही संवाद हुआ और मरीज ने कहा, ‘जो भी काटना है, काट दीजिए, लेकिन ‘मैं' तो बच जाऊँगा ना?' डॉक्टर का जवाब फिर वही था, ‘हाँ।' अब जरा सोचिए, जिस पैर और हाथ को वह व्यक्ति जीवन भर मेरे हाथ, मेरे पैर कह रहा था, उसे वह ‘मैं' को बचाने के लिए कटवाने को तैयार हो गया। आखिर कौन बोल रहा था ‘मैं'। हालात ऐसे आते हैं कि डॉक्टर शरीर के किसी भी अवांछनीय अंग को निकालने की सलाह देता है और कहता है कि यह अंग शरीर में रहा, तो मरीज की मौत हो सकती है, तब कोई भी मरीज उस अंग को तुरंत अपनी देह से निकलवाने को तैयार हो जाता है, केवल उस ‘मैं' को बचाने के लिए। बस यही ‘मैं' आत्मा है और यही ईश्वर।
इस उदाहरण से स्पष्ट है कि जिस विषय से पहले मेरा शब्द लगता है, वह व्यक्ति स्वयं कभी नहीं हो सकता। उदाहरण के तौर पर हम कहते हैं मोबाइल मेरा है, परंतु क्या आप मोबाइल हैं? नहीं। यदि हम कहें कि मोटर साइकिल या कार मेरी है, परंतु क्या आप मोटर साइकिल या कार हो सकते हैं? नहीं। इसी बात को हम लेते हैं देह पर। ‘मैं' कहता हूँ हाथ मेरे हैं, परंतु क्या हाथ ‘मैं' हूँ। इन दोनों ‘मैं' में अंतर समझिए। जो ‘मैं' कहता है कि हाथ मेरा है, वह दैहिक मन-वाणी से स्फुरित व व्यक्त किया गया ‘मैं' है, जो देह को ही ‘मैं' कह रहा है, जबकि जो ‘मैं' कहता है कि ‘मैं' हाथ नहीं हूँ, वह आत्मरूपी ‘मैं' है।
इसी प्रकार देह का कोई भी हिस्सा मेरा तो है, परंतु वह ‘मैं' नहीं हूँ। ‘मैं' कहता हूँ सिर मेरा है, परंतु सिर ‘मैं' नहीं हूँ। ‘मैं' कहता हूँ आँखें मेरी हैं, परंतु आँखें ‘मैं' नहीं हूँ। इस प्रकार अंतिम निष्कर्ष यह निकलता है : ‘मैं' कहता हूँ देह मेरी है, परंतु ‘मैं' देह नहीं हूँ। मुख-वाणी से निकलने वाला ‘मैं' मानव देह को मेरी कहता है, जबकि जो दूसरा ‘मैं' कह रहा है कि ‘मैं' देह नहीं हूँ, वह आत्मा है। वह इस देह का साक्षी है। वह अक्षुण्ण है। वह अस्खलित है। वह अनंत है। वह शाश्वत है। वह सत्य है। वही ईश्वर है। (गुरु अर्पण)












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