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युवाओं को खूब सिखाती है हॉस्‍टल लाइफ

बेंगलूरु। स्‍वामी विवेकानंद के जन्‍म दिवस पर 10 जनवरी को पूरा देश राष्‍ट्रीय युवा दिवस मनायेगा, वनइंडिया युवाओं के इस पर्व को युवा सप्‍ताह के रूप में मना रहा है। बात अगर युवाओं की हो तो सबसे उनकी सुंदर लाइफ हॉस्‍टल लाइफ होती है। यह लाइफ हर व्‍यक्ति को जिंदगी भर याद रहती है। जबकि यह जीवन आसान नहीं होता, तमाम संघर्ष इस दौरान आते हैं। चुनौतियां भी कम नहीं होतीं। हम यहां गिना रहे हैं हॉस्‍टल लाइफ की चुनौतियां।

हॉस्‍टल लाइफ किसी भी छात्र की जिंदगी का एक यादगार हिस्‍सा होता है। जहां पर वह बाहरी दुनिया को समझना शुरू करता है। यह एक ऐसा समय होता है जब युवा बहुत सारी चीजें सीखते हैं जैसे एक टीम के रूप में काम करना, अपने करियर और जिंदगी से जुड़े निर्णय खुद लेना तो वहीं यह समय उनमें परिप‍क्‍वता और आत्‍मविश्‍वास भी भरता है। इस दौरान युवा अपनी समस्‍याओं के समाधान के लिए माता-पिता के पास न जाकर खुद ही उनका हल ढूंढते हैं। दोस्‍तों और हमारे साथियों के द्वारा उन्‍हें अपनी रूचि के अ‍नुसार कॅरियर चुनने का मौका मिलता है।

इन सब के अलावा कई ऐसी बातें भी होती हैं जिनके कारण हॉस्‍टल लाइफ को बेहतर नहीं माना जाता है, जैसे कि माता पिता को यही डर बना रहता है कि गलत सं‍गति में कहीं उनका बेटा या बेटी सिगरेट या शराब न पीने लग जाय और जैसे-जैसे करियर को लेकर तनाव बढ़ रहा है। उससे तो युवा कम उम्र में ही ड्रग्‍स लेना शुरू कर देते हैं। कुछ लापरवाह युवा तो सिर्फ मजे ही करते रह जाते हैं और अपनी पढ़ाई पर बिल्‍कुल ध्‍यान नहीं देते हैं।

वहीं कुछ हॉस्‍टलर्स का कहना है कि हॉस्‍टल लाइफ में आपके दोस्‍त कैसे होते हैं इस पर काफी कुछ निर्भर करता है क्‍योंकि अगर आप गलत करते हैं तो कोई आपको कोई कुछ बताने वाला नहीं होता है। लेकिन एक सच यह भी है कि हॉस्‍टल में ही युवा अलग-अलग संस्‍कृति, भाषा और परिवेश के लोगों के साथ रहना सीखता है और जिससे उनमें बतौर इंसान काफी परिपक्‍वता आती है।

संघर्ष और आनंद से भरे इस छात्र जीवन में किन-किन दिक्‍कतों का सामना करना पड़ता है, आइये देखें-

रैगिंग

रैगिंग

रैगिंग- रैगिंग छात्र जीवन की एक बड़ी समस्‍या है हालांकि सरकार और कालेजों के सहयोग से इस समस्‍या पर काफी हद तक काबू पा लिया गया है लेकिन अब भी हॉस्‍टल में रहने वाले छात्रों को इसका सामना करना पड़ता है। सीनियर छात्र, प्रथम वर्ष के छात्रों की देर रात तक रैगिंग लेते हैं। कई बार तो यह मसला इतना संगीन हो जाता है कि मारपीट तक की नौबत आ जाती है। एसवीएम आईटी के पूर्व छात्र अरूण कुमार का कहना है कि जब मैं प्रथम वर्ष का छात्र था तो हम लोगों को अक्‍सर इन समस्‍याओं का सामना करना पड़ता था, अगर हम वार्डेन से शिकायत करते तो वह भी छात्रों के डर से कुछ नहीं कहता था। हालांकि अब कालेज प्रशासन के डर से वहां का माहौल ऐसा नहीं है।

समय से आने जाने की टाइमिंग

समय से आने जाने की टाइमिंग

लखनऊ विश्‍वविद्यालय से मास्‍टर्स की डिग्री लेने वाली दिव्‍या का कहना है कि हॉस्‍टल में रात आठ बजे तक आ जाना होता है अगर आप इसके बाद आते हैं तो आपको वार्डेन से डांट खानी होती हैं। ऐसा होने से हमें कभी-कभी बड़ी दिक्‍कतों का सामना करना पड़ता था। उनका कहना है कि आखिर हमें भी लड़को की तरह फ्रीडम पाने का हक है।

बिजली से चलने वाले यंत्रो का इस्‍तेमाल न करें

बिजली से चलने वाले यंत्रो का इस्‍तेमाल न करें

बैंगलोर मे एक आईटी कंपनी में काम करने वाली पूर्णिमा कहती हैं कि मैं अपनी पढ़ाई के दौरान भी हॉस्‍टल में रही और आज भी एक हॉस्‍टल में रहती हूं। मैं इसके लिए आठ हजार रूपये देती हूं लेकिन फिर भी ओनर का कहना है‍ कि आप लोग रूम में इलेक्ट्रिक सामान जैसे कि इलेक्ट्रिक कैटल, आयरन, हेयर ड्रायर, हीटर और इमर्शन रॉड का प्रयोग न करें। इतना पैसा देने के बाद भी अगर इतनी रोंक लगाई जाती है तो बुरा लगता है। कई बार तो झगड़ा भी होता है।

नहीं होता समय से भोजन

नहीं होता समय से भोजन

आगरा के अंबेडकर विश्‍वविद्यालय में रहकर गृहविज्ञान की पढ़ाई करने वाली पिंकी का कहना है कि हॉस्‍टल में हमें समय पर खाना मिलता है। अगर आप थोड़ा लेट हो जाते हैं तो आपको भूखे ही सोना पड़ता है। हम लोग जब तक घर में रहते हैं तब तक जब भी जो मर्जी आती है करते हैं लेकिन यहां आने पर हमारी जिंदगी पूरी तरह बदल जाती है।

साफ सफाई न होना

साफ सफाई न होना

आमतौर पर विश्‍वविद्यालयों में यह देखा जाता है कि हॉस्‍टलों में साफ सफाई नहीं होती है। हर रोज झाड़ू नहीं लगाई जाती है तो कभी शौचालयों में गंदगी रहती है। वार्डेन से कई बार शिकायत करने पर सुनवाई होती है तब तक ऐसे ही एडजेस्‍ट करना होता है।

अच्‍छे भोजन को तरसना

अच्‍छे भोजन को तरसना

हॉस्‍टल्‍स में रहने वाले कई छात्रों का कहना होता है कि हमारे यहां खाना कभी तो अधपका होता है तो कभी साफ सफाई से नहीं बनाया जाता है। जिसका परिणाम ये होता है कि स्‍टूडेंट्स बीमार हो जाते है।

भूल जाइये समय से सोना

भूल जाइये समय से सोना

दिल्‍ली के एक हॉस्‍टल में रहने वाले संदीप का कहना है कि मेरी, हास्‍टल के वार्डेन से अक्‍सर लड़ाई हो जाती है क्‍योंकि रात में हमें 10 बजे तक लाइट आफ कर देनी होती है। जबकि हम लोग रात में कभी पढ़ना तो कभी गप्‍पें मारना चाहते हैं।

हमेशा अलर्ट रहना

हमेशा अलर्ट रहना

रिदिमा का कहना है कि जब मैं कॉलेज में थी तब अगर हमारा सामान खो जाता था तो इसकी जिम्‍मेदारी खुद ही लेनी पड़ती थी। इसलिए हमें हमेशा ही अलर्ट रहना पड़ता था।

रूम पार्टनर की गंदी आदतें

रूम पार्टनर की गंदी आदतें

हॉस्‍टल में रहने वालों को सबसे ज्‍यादा दिक्‍कत तब आती है जब रूम पार्टनर अलग ही स्‍वभाव का होता है। बैंगलोर के एक हॉस्‍टल में रहने वाले इरफान का कहना है कि मेरा रूम मेट ड्रिंक करता है, मैं नहीं करता। इसके अलावा वह रूम की साफ सफाई भी नहीं करता, सब मुझे ही करना होता है। इसलिए मुझे बड़ी दिक्‍कत होती है।

हर गड़बड़ी के लिए आप ही जिम्‍मेदार

हर गड़बड़ी के लिए आप ही जिम्‍मेदार

एआईआर में काम करने वाली प्रियंका का कहना है कि हॉस्‍टल में अगर कुछ भी दिक्‍कत होती है तो इसके जिम्‍मेदार आप होते हैं, यहां तक की गीजर खराब होता है तो आपको ही डांट पड़ती है कोई यह नहीं देखता है कि यह पुराना हो चुका था। जिसे रिपेयर किये जाने की जरूरत है।

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