सांसद क्यों उतरते हैं विधानसभा चुनाव मैदान में?

पहले बात करते हैं कुंवरजी बावलिया की। वे राजकोट लोकसभा क्षेत्र से सांसद हैं। कांग्रेस ने उन्हें भावनगर जिले में स्थित बोटाद विधानसभा सीट से टिकट दिया है। अब विचारणीय मुद्दा यह है कि बावलिया को गुजरात के चुनाव लड़ने की क्या जरूरत पैदा हुई? दूसरी ओर कांग्रेस को सांसद को विधानसभा चुनाव मैदान में उतारने से क्या फायदा होगा?
अंततः सांसद जैसे उच्च पद से विधायक सरीखे उतरते क्रम वाले पद की ओर कोई रुख करता है, तो उसके पीछे का लॉजिक तो होगा ही ना। यह लॉजिक है सांसद से ऊँचा पद प्राप्त करने का। एक स्तर नीचे उतरने से यदि सांसद से ऊँचा पद हासिल हो जाता हो, तो फिर कोशिश करने में क्या जाता है? नहीं समझे? चलिए, आपको विस्तार से और चरणबद्ध ढंग से समझाते हैं।
तब पार्टी, आज उम्मीदवार की जरूरत
बावलिया, विट्ठल रादडिया और विक्रम माडम जैसे कई विधायक, जो 2007 के विधानसभा चुनाव में चुने गए थे, सोलह माह बाद हुए लोकसभा चुनाव 2009 के मैदान में कूदे थे। कांग्रेस ने उस समय बावलिया, रादडिया और माडम जैसे विधायकों के सहारे गुजरात में 26 में से 11 सीटें हासिल की थीं। लोकसभा चुनाव में विधायकों को आजमाना पार्टी की जरूरत और विशिष्ठ सूझबूझ कहा जा सकता है, परंतु विधानसभा चुनाव में पार्टी क्यों मजबूर है? इस सवाल का एक ही जवाब है सांसद की जरूरत। तब पार्टी को जरूरत थी, आज सांसद को जरूरत है।
यह हो सकता है गणित
बावलिया जैसे दिग्गज नेता यदि विधायक से सांसद बन कर पार्टी को लोकसभा में एक सीट दे सकते हैं, तो पार्टी भी उनकी बात कैसे टाल सकती है? दूसरे, बावलिया जैसे नेता को कोलीबहुल बोटाद से टिकट दिया गया है और वे शायद जीत भी जाएँगे, परंतु फिर क्या? बावलिया या फिर बाद की सूची में जिस सांसद का भी नाम शामिल होने वाला है, उन तमाम का गणित क्या है? क्या वे सात विधानसभा क्षेत्रों को शामिल करने वाले लोकसभा मत क्षेत्र की जगह पुनः मात्र एक ही विधानसभा मत क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करना चाहते हैं? नहीं, बिल्कुल नहीं। उनका व्यक्तिगत स्वार्थ है और यह स्वार्थ कुछ और नहीं, बल्कि मंत्री पद हासिल करने का ही हो सकता है। सांसद से विधायक बनने की ओर रुख करने वाले सांसद जरूर यह मानते हैं कि विधानसभा चुनाव में यदि उनकी पार्टी को बहुमत मिला और सरकार बनी, तो उन्हें मुख्यमंत्री पद न सही, कम से कम मंत्री पद तो हासिल हो ही जाएगा। और यह बात भी पक्की है कि एक सांसद मात्र सात या आठ विधानसभा मत क्षेत्र का ही प्रतिनिधि होता है, परंतु राज्य सरकार का एक मंत्री पूरे राज्य का मंत्री कहलाता है। कुछ भी हो, सांसद के मुकाबले मंत्री पद और उसका महत्व ज्यादा ही है।
उनकी जीत का ठीकरा जनता के सिर
ऐसा गणित आजमाने वाले सांसदों या उनकी पार्टी को शायद जनता की चिंता नहीं होती। अब बावलिया हो या रादडिया या माडम। ऐसे दिग्गज नेता, जो सांसद हैं, वे विधानसभा चुनाव लड़ें, तो एक बात तो लगभग तय हो जाती है कि वे चुनाव जीत जाएँगे। यदि ऐसा हो, तो जनता को ही भुगतना होगा। इसके पीछे का गणित यह है कि यदि बावलिया, रादडिया या माडम विधानसभा सीट जीत जाते हैं, तो उन्हें सांसद या विधायक दोनों में से एक पद से इस्तीफा देना पड़ेगा। संभवनाएँ दो बनती हैं। पहली यह कि यदि सरकार उनकी पार्टी की बने, तो वे मंत्री बनने के अरमान के साथ सांसद पद से इस्तीफा दे देंगे। ऐसी स्थिति में संबंधित लोकसभा सीट के लिए उप चुनाव कराने पड़ेंगे और दूसरी संभावना यह बनती है कि यदि उनकी पार्टी की सरकार न बने, तो वे विधायक पद से इस्तीफा देकर सांसद के रूप में बने रहना चाहेंगे। ऐसे हालात में वे जिस विधानसभा सीट से जीते होंगे, वहाँ उप चुनाव कराने पड़ेंगे। दोनों ही परिस्थितियों में उनकी जीत का ठीकरा जनता के सिर ही फूटेगा। 2009 में भी ऐसे कई विधायक जो लोकसभा चुनाव जीते थे, तब उनके विधानसभा क्षेत्र में उप चुनाव कराने पड़े थे।
पराजय से ही बचाव
इस प्रकार की हीन व व्यक्तिगत राजनीति महत्वाकांक्षा वाली राजनीति में जनता को यदि ऐसे व्यर्थ खर्च से बचना है, तो ऐसे सांसदों को घर ही बैठा देना चाहिए। ऐसे सांसदों को यदि जिता दिया जाए, तो फिर लोकसभा या विधानसभा दोनों में से किसी भी एक के लिए उप चुनाव कराने पड़ेंगे। यदि जनता को ऐसे व्यर्थ खर्च से राज्य को बचाना है, तो उसे अपने विवेक से ऐसे सांसदों को चुनाव में परास्त करना चाहिए।












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