ऐसे चले तो जंग हार जायेंगे अरविंद केजरीवाल

Kejriwal should focus on his own Party
नई दिल्‍ली। जिस तरह अरविंद केजरीवाल ने टेलीविजन चैनलों के सामने भारतीय जनता पार्टी के राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष नितिन गडकरी के साम्राज्‍य की बखिया उधेड़ी है, उसका अंदाजा लगभग सभी लोगों का था। केजरीवाल के खुलासों से अब जनता भी ऊबने लगी है। टीवी चैनलों पर केरीवाल को सुनने से बेहतर लोग किसी अच्‍छी राजनीतिक बहस को देखना पसंद कर रहे हैं।

यह सब इसलिये क्‍योंकि केजरीवाल खुलासे तो कर रहे हैं, लेकिन कोर्ट का रास्‍ता अख्तियार नहीं कर रहे हैं। इतिहास के पन्‍ने उठाकर देखें तो कोई भी राजनीतिक पार्टी निगेटिव कैम्‍पेन करके कभी भी चुनाव नहीं जीत पायी है। रही बात नई पार्टियों की तो तमाम पार्टियां बनीं, जिन्‍हें शुरुआती दौर में ढेर सारा नाम मिला लेकिन बाद में वो पार्टियां कहां चली गईं, किसी को नहीं पता।

आपको बताना चाहेंगे कि आंध्र प्रदेश के जयप्रकाश नारायण ने साल 2000 में लोक सत्‍ता पार्टी का गठन किया और विधानसभा चुनाव जीते, लेकिन बाद में पार्टी आगे नहीं बढ़ सकी। वहीं स्‍वतंत्र पार्टी बनी और फेल हो गई।

अगर केजरीवाल चाहते हैं कि 2014 के लोकसभा चुनाव में उनकी पार्टी दमखम के साथ चुनाव लड़े और जीते भी तो उन्‍हें अभी से ही पार्टी पर फोकस करना होगा। अब महज डेढ़ साल रह गये हैं चुनाव में। आपको क्‍या लगता है। इतनी नई पार्टी के हाथ में जनता देश की बागडोर सौंप देगी। शायद यह बहुत मुश्किल होगा। जनता के बीच तमाम लोग ऐसे हैं जो गुस्‍से में आकर वोट देते हैं, तमाम ऐसे हैं जो भावनाओं में बहकर वोट देते हैं, लेकिन ऐसे लोग भी हैं, जो सोचसमझ कर अपने मत का इस्‍तेलाम करते हैं।

फिलहाल देखा जाये तो केजरीवाल के पक्ष में वो लोग हैं, जिनके अंदर कांग्रेस के प्रति गुस्‍सा भरा हुआ है, लेकिन ये लोग आसानी से अपना वोट भाजपा को दे सकते हैं। ऐसे लोग जो केजरीवाल के इंडिया अगेंस्‍ट करप्‍शन मूवमेंट से भावनात्‍मक रूप से जुड़ गये हैं, वो निश्चित रूप से केजरीवाल के प्रत्‍याशियों को अपना मत देंगे, लेकिन उनका क्‍या जो सोच समझकर वोट देते हैं। सही मायने में केजरीवाल को उन्‍हीं के वोटबैंक पर टार्गेट करना चाहिये।

ये वो लोग हैं जो वोट देने के पहले सोचेंगे, "क्‍या केजरीवाल ठंडे दिमाग से देश के बारे में कुछ सोच सकते हैं? क्‍या धैर्यपूर्वक रणनीति तैयार करने की क्षमता उनकी टीम में है? क्‍या वो सीमाओं से बाहर जाकर सोच सकते हैं?" जी हां ऐसे तमाम सवाल आयेंगे जहां जवाब नहीं में होगा।

सोनिया गांधी के दामाद राबर्ट वाड्रा, सलमान खुर्शीद और उनके बाद नितिन गडकरी। इन सभी के खिलाफ जहर उगलने पर तमाम लोग उनके साथ हो लिये हैं, लेकिन तमाम लोग ऐसे भी हैं जो सोचते हैं कि उनके जनलोकपाल में भी कमियां हैं।

केजरीवाल का फोकस इस समय शहरी लोगों पर है। मानते हैं कि शहरों के वोट काफी मायने रखते हैं। लेकिन उन्‍हें यह नहीं भूलना चाहिये कि आज भी हिन्‍दुस्‍तान गांवों में बसता है। ग्रामीण इलाकों के वोटों के बगैर केजरीवाल कुछ नहीं कर सकते और उन तक पैठ बनाने के लिये केजरीवाल को अभी बहुत समय लगेगा।

केजरीवाल के लिये सबसे बड़ी बात यह है कि अब वो अपने कदम पीछे नहीं हटा सकते हैं। क्‍योंकि उनके साथ कई बड़े-बड़े लोगों की इज्‍जत दांव पर लग गई है। लेकिन हां किसी काम को न करके पछताने से अच्‍छा है करके पछताओ। रणभूमि से डरकर भागने से अच्‍छा है लड़ते-लड़ते मरो। अगर केजरीवाल लड़ते-लड़ते हार भी गये तब भी देश को अपने इस लाल पर गर्व होगा।

इस लेख के इनपुट नीति सेंट्रल डॉट कॉम से लिये गये हैं।

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