गुजरात में नरेंद्र मोदी यानी एक और एक ग्यारह
अहमदाबाद। नरेन्द्र मोदी। मेहसाणा के एक छोटे से स्थान वडनगर से गांधीनगर, गांधीनगर से दिल्ली और दिल्ली से अमरीका-ब्रिटेन तक गूंज है इस नाम की। एक दिन नहीं, एक साल नहीं, ग्यारह साल होने जा रहे हैं इस नाम की गूंज को। एक दशक नहीं, भाई एकादश। हमारे देश में, हमारी संस्कृति में एकादश का बहुत महत्व है। इच्छित फल पाने के लिए अक्सर लोग एकादशी उपवास करते हैं। एकादश यानी 11 के अंक को भारतीय संस्कृति में शुभांक माना जाता है। यह एकादश यूँ ही नहीं बन जाता। एक और एक और एक.... करते हुए यह ग्यारह बनता है। जी हां। नरेन्द्र मोदी 7 अक्टूबर, 2012 को गुजरात में अपने शासन के 11 वर्ष पूर्ण कर रहे हैं। 7 अक्टूबर, 2001 को तत्कालीन मुख्यमंत्री केशूभाई पटेल को हटा कर मोदी को गुजरात की कमान सौंपी गई थी। ग्यारह साल का यह कालखण्ड कोई छोटा नहीं है। अक्सर बड़े-बड़े अध्यायों को ऐसे ही कालखण्ड की जरूरत होती है।
यह कालखण्ड का ही कमाल है कि अमिताभ बच्चन इलाहाबाद लौटने के लिए मुंबई रेलवे स्टेशन गए, वहां से लौटे, फिर नायक बने, फिर रसातल में गए और अब महानायक हैं। जी नहीं, यहां मोदी की तुलना बिग बी से करना का कोई इरादा नहीं है, लेकिन इतना जरूर है कि मोदी के लिए भी बीता एकादश ऐसी ही उथल-पुथल से भरा रहा और अब जबकि गुजरात में दिसम्बर में चुनाव होने हैं, तब मोदी के लगातार तीसरी बार चुने जाने के मुद्दे पर जहाँ बहस इतनी गर्म नहीं है, वहीं 2014 में होने वाले लोकसभा चुनावों में उनकी प्रधानमंत्री पद की दावेदारी बहस का बड़ा मु्द्दा बन चुकी है। जनता की नब्ज को परखने वाले मोदी यदि गुजरात की सत्ता में 11 साल पूरे कर रहे हैं, तो वह किसी के रहमो-करम पर नहीं, अपने बल बूते पर कर रहे हैं।
आम तौर पर किसी शासक के लम्बे शासनकाल के बाद आम जनता में विरोध के सुर उठने लगते हैं। शासक पार्टी के नेता जनता के बीच जाने से घबराते हैं, लेकिन गुजरात में मोदी आज भी अपने बूते भारी भीड़ जुटाते हैं। वे जनता के बीच ज्यादा और अपने ऑफिस में कम पाए जाते हैं। वे देश में अकेले ऐसे मुख्यमंत्री हैं, जो सीधे सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह पर निशाना साधते हैं। गुजरात के कांग्रेसी नेता शायद ही उनके निशाने पर होते हैं। गुजरात में 11 साल के शासन के बावजूद मोदी को लेकर कोई सामूहिक विरोध का सुर नहीं उठता दिखता।
प्रतिपक्ष कांग्रेस जहाँ मोदी पर हमला बोलती है, वहीं मोदी यह कसर यूपीए सरकार पर निकाल कर कांग्रेस के आरोपों की हवा निकालने से नहीं चूकते। जहाँ तक घरेलू चुनौती का सवाल है, तो पार्टी में तो उनके साथ खड़े रहने की किसी की हैसियत है नहीं। हाँ, केशूभाई पटेल और उनकी नई पार्टी के रूप में जो चुनौती है, उसका मोदी मौन रह कर सामना कर रहे हैं। मोदी ने गुजरात की कमान संभाली थी केशूभाई पटेल के पैर छूकर। संभवतः यही कारण है कि मोदी अपने किसी भी भाषण में केशूभाई पटेल का नाम तक नहीं लेते।
धुरि, पर धुर विरोध
कहने को मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री हैं, लेकिन आज सब कुछ उनके नाम के इर्द-गिर्द है। वे भारतीय राजनीति की धुरि बन चुके हैं। आम तौर पर धुरि शब्द पृथ्वी शब्द के आने पर हमारे पटल पर उभरता है, लेकिन न तो पृथ्वी धुरि का विरोध करती है और न पृथ्वी धुरि का, लेकिन भारतीय राजनीति में स्थिति विपरीत हैं। आज मोदी भारतीय राजनीति की धुरि तो हैं, लेकिन उनके धुर विरोधियों की कमी नहीं है। हर अच्छे और बुरे काम के साथ उनके नाम की मुहर खुद-ब-खुद जुड़ जाती है। वे जहां गुजरात का पर्याय बन चुके हैं, वहीं उनका नाम उनके समर्थकों और विरोधियों के लिए किसी मिशन से कम नहीं है। मोदी एक मुख्यमंत्री के अलावा एक मिथक भी हैं। गुजरात में वे चौदहवें मुख्यमंत्री हैं और उनसे पहले तेरह मुख्यमंत्रियों में किसी ने भी गांधीनगर की सत्ता पर इतना लम्बा शासन नहीं किया। गत 18 सितम्बर को ही उन्होंने अपने शासन के चार हजार दिन पूरे किए हैं।
इन ग्यारह सालों में ऐसा कई बार लगा कि मोदी का खेल अब खत्म होने वाला है। फिर केशूभाई पटेल, गोरधन झडफिया, ए. के. पटेल जैसे लोगों का असंतोष हो, अटल बिहारी वाजपेयी जैसे कद्दावर नेता की राजधर्म की सीख हो या फिर लोकसभा चुनावों में कमजोर प्रदर्शन हो। हर बार मोदी पर संकट आया और वे उबर भी गए। हालांकि इस सबके पीछे लालकृष्ण आडवाणी का अभयदान उनके साथ रहता आया, तो आज उन्हीं आडवाणी के साथ उनके सम्बंधों पर सवाल भी खड़े किए जा रहे हैं। यह भी अपने आप में मोदी से जुड़े विवाद की एक और कड़ी है। 7 अक्टूबर, 2001 को पहली बार मुख्यमंत्री बनने से लेकर गोधरा कांड, कट्टर हिन्दुत्व की छवि और फिर सद्भावना मिशन तक मोदी के 11 पड़ाव कुछ यूं हो सकते हैं।
नरेंद्र मोसी से जुड़ी 11 अहम बातें इस प्रकार हैं-

टेस्ट नहीं, वन-डे, गोधरा कांड
नरेन्द्र मोदी ने 7 अक्टूबर, 2001 को सत्ता की बागडोर हाथ में लेने से पहले आयोजित भाजपा विधायक दल की बैठक में कहा कि वे टेस्ट नहीं, बल्कि वन-डे खेलने आए हैं। मोदी ने केशूभाई पटेल के आशीर्वाद के साथ गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। संघ के स्वयंसेवक रहे मोदी ने पहली बार चुनाव लड़ा राजकोट-2 विधानसभा क्षेत्र से। इस उप चुनाव में मोदी को जीत मिली। चुनावी जीत की खुशी के बीच 27 फरवरी, 2002 को गोधरा कांड हुआ और गुजरात भयंकर दंगों की आग में झुलस गया। बस ये दंगे ही मोदी के लिए गले का ‘हार' बन गए। मोदी ने साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण का फायदा उठाने के लिए विधानसभा भंग की और दिसम्बर-2002 में विधानसभा चुनाव हुए। मोदी के बूते भाजपा को दो तिहाई बहुमत हासिल हुआ और दंगों को लेकर मोदी को लताडऩे वालों के मुंह कुछ समय के लिए बंद हो गए।

हार का ठीकरा
सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था, लेकिन सोलह महीने बाद हुए लोकसभा चुनाव-2004 ने सब कुछ उलट दिया। केन्द्र में सत्तारूढ़ अटल बिहारी वाजपेयी सरकार की इस चुनाव में लुटिया डूब गई। चौतरफा फीलगुड और इंडिया शाइनिंग अभियान की चमक के बावजूद वाजपेयी सरकार दोबारा सत्ता में न लौटी। यहां तक कि गुजरात में मोदी 26 में से सिर्फ 14 सीटें ही दिला सके। चुनावों में मिली इस हार का ठीकरा सीधे तौर पर मोदी पर फोड़ा गया। भाजपा के सहयोगी दलों ने साफ तौर पर कहा कि गुजरात दंगों में मोदी की तथाकथित भूमिका ही भाजपा और एनडीए की हार का कारण बने। इसके साथ ही मोदी के विरोधी लामबंद होना शुरू हो गए।

अमरीका का वीजा देने से इनकार
वैसे मोदी अक्सर इन मामलों में किस्मत के धनी रहे हैं। जब-जब उन पर शिकंजा कसा गया, वे मजबूत बन कर उभरे। विरोध के बीच न्यूयॉर्क से खबर आई कि अमरीका ने मोदी को वीजा देने से इनकार कर दिया। मोदी ने अमरीका के इस इनकार को गुजरात ही नहीं, देश के अपमान के तौर पर प्रचारित किया। यहां तक कि उनके विरोधी भी यह राय देने से नहीं चूके कि दंगे हमारे राज्य-देश का आंतरकि मामला है और इस आधार पर वीजा देने से इनकार करना उचित नहीं है। वीजा का यह इनकार भी मोदी के कद को बढ़ाने वाला ही साबित हुआ।

सिंहासन डोला
लोकसभा चुनाव-2002 में हार के बाद मोदी का सिंहासन डोलने लगा। दो साल पहले ही दो तिहाई बहुमत हासिल करने वाले मोदी को लेकर आम जनता में तो कोई विरोध नहीं दिख रहा था, लेकिन लोकसभा चुनाव में हार और हाईकमान के कई नेताओं व सहयोगी दलों की ओर से मोदी को घेरे जाने के साथ ही स्थानीय स्तर पर मोदी विरोधियों के पंख लगने लगे। सत्ता से हटाए जाने से दु:खी केशूभाई पटेल के अप्रत्यक्ष नेतृत्व में गोरधन झडफिया, ए. के. पटेल, सुरेश मेहता जैसे नेताओं ने बगावत के स्वर तेज कर दिए। मामला ए. के. पटेल के जन्म दिन की पार्टी से लेकर दिल्ली तक पहुंचा। लम्बा घमासान चला। एक बार तो पूरी भाजपा मानो मोदी पर सिमटी लगी, लेकिन आडवाणी के अभयदान ने मोदी के सिंहासन को हमेशा बचाया। यह बात और है कि आज मोदी और आडवाणी के सम्बंधों को प्रधानमंत्री पद की दावेदारी के कारण तंग माना जाता है।

नर्मदा बांध मुद्दे पर 51 घण्टे का उपवास
मोदी जब-जब कमजोर होते दिखे, उनके हाथ कोई न कोई मजबूत मुद्दा अवश्य लगता दिखा। ऐसा ही एक मुद्दा था नर्मदा बांध का। केन्द्र की कांग्रेस नीत सरकार, सैफुद्दीन सोज और मेधा पाटकर की कथित मिलीभगत के चलते नर्मदा बांध की ऊंचाई खटाई में पड़ती दिखी, तो मोदी ने 17 अप्रेल, 2006 को 51 घण्टे का अनशन शुरू किया। जीएमडीसी ग्राउण्ड में शुरू हुआ यह हाईफाई अनशन 29 घण्टे में ही पूरा हो गया। केन्द्र सरकार को झुकना पड़ा और मोदी ने इसे गुजरात की अस्मिता से जोड़ दिया।

सबसे लम्बे शासन का रिकॉर्ड बनाया
मोदी ने जून-2006 में गुजरात में सबसे लम्बे शासन का पूर्व मुख्यमंत्री माधवसिंह सोलंकी का रिकॉर्ड तोड़ कर एक नया रिकॉर्ड बनाया। यह उनके कार्यकाल का एक और बेहतर पड़ाव था। गुजरात में जीवराज मेहता से लेकर केशूभाई पटेल तक तेरह मुख्यमंत्री रहे। इनमें एकमात्र माधवसिंह सोलंकी ऐसे मुख्यमंत्री थे, जिन्होंने चुनाव से चुनाव तक का कार्यकाल पूरा किया था। वो भी पांच साल का नहीं था, लेकिन मोदी ने आगे चल कर न केवल सबसे लम्बे शासन का रिकॉर्ड बल्कि, चुनाव से चुनाव तक शासन का रिकॉर्ड बनाया और अब तो उन्होंने शासन के 11 साल पूरे कर लिए हैं।

मौत के नहीं, मतों के सौदागर
विवादों के बीच विधानसभा चुनाव-2007 आए। इन चुनावों में फिर एक बार दंगों के नाम पर मोदी को कोसने का सिलसिला चला, तो अब सोहराबुद्दीन फर्जी मुठभेड़ जैसे मामले नए मुद्दों के रूप में जुड़ चुके थे। चुनाव प्रचार अभियान का आधे से ज्यादा हिस्से में मोदी ने जहां विकास को उजागर करने की कोशिश की, वहीं प्रतिपक्ष कांग्रेस का प्रचार मोदी की सरकार की कमियों की बजाए उनके विवादों पर केन्द्रित रहा और स्थानीय कांग्रेसियों की राह पर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी भी चलीं। उन्होंने प्रचार अभियान के अंतिम चरण में सोहराबुद्दीन फर्जी मुठभेड़ प्रकरण को लेकर मोदी को मौत का सौदागर कह दिया और एक वाक्य के बल पर मोदी ने खुद को मतों का सौदागर साबित किया।

लोकसभा चुनाव में फिर भद पिटी
फिर एक बार सोलह महीने बाद लोकसभा चुनाव-2009 हुए और 2004 का पुनरावर्तन हुआ। मोदी लोकसभा सीटों में सिर्फ एक सीट का इजाफा करवा पाए और कांग्रेस की बाछें फिर खिलीं, लेकिन हर बार की तरह कांग्रेस लगातार उन्हें बुनियादी मुद्दों पर घेरने की बजाए विवादास्पद मुद्दों पर घेरती रही और उसे मुंह की खानी पड़ी। ऐसा ही हुआ। लोकसभा चुनाव में भाजपा की हार के सौ दिन बाद ही हुए राज्य में सात सीटों के उप चुनाव में पांच सीटें जीत कर मोदी ने फिर एक बार गुजरात पर अपनी पकड़ को साबित किया।

स्वर्ण जयंती और सद्भावना
‘पांच करोड़ गुजरातीओ' से शुरुआत करने वाले मोदी को न केवल ‘छह करोड़ गुजरातीओं' बोलने का अवसर मिला, बल्कि इंदूलाल याज्ञिक के नेतृत्व में चले महागुजरात अभियान से बने गुजरात की स्वर्ण जयंती के सरताज बनने का भी उन्हें सौभाग्य प्राप्त हुआ। केन्द्रीय राजनीति, हाईकमान की राजनीति, अण्णा हजारे के उपवास आंदोलन जैसे ज्वलंत मुद्दों के बीच भी मोदी और विवाद चलते ही रहे। कांग्रेस ने गुजरात में मोदी को घेरने के लिए राजभवन का इस्तेमाल कर लोकायुक्त की नियुक्ति करवा दी। मोदी दंगे, संजीव भट्ट, हरेन पंड्या, जागृति पंड्या, फर्जी मुठभेड़ सहित कई अनसुलझे मुद्दों पर जब खुद को घिरा महसूस करने लगे। मोदी के अनशन को खुद को राष्ट्रीय स्तर पर उभरने की सीढ़ी के रूप में देखा गया। इस अनशन में कई अल्पसंख्यकों को भी लाकर मोदी ने सबका साथ-सबका विकास का नारा दिया। विवादों के बीच मोदी रविवार को अपनी सत्ता के 11 साल पूरे कर रहे हैं।

विवादों के बीच नंबर वन का सिलसिला
गोधरा कांड से लोगों का ध्यान हटाने के लिए विकास का रास्ता अपनाया। कई मामलों में गुजरात नंबर वन रहा। नंबर वन को मोदी ने मंत्र बना दिया। वाइब्रेंट गुजरात के नाम से जहां उत्सवों की श्रृंखला चलाई, वहीं अंतरराष्ट्रीय निवेशक सम्मेलनों के जरिए राज्य में अरबों का निवेश लाने की कवायद की। बड़े-बड़े उद्योगपतियों ने गुजरात की ओर रुख किया। मोदी ने इस दौरान समग्र राज्य में चारों तरफ विकास का माहौल बनाया। हालांकि समय-समय पर विवाद पैदा होते रहे, जिनका जवाब मोदी ने समय-समय पर हुए विभिन्न स्तरीय चुनावों से दिया। इतना ही नहीं मोदी गुजरात में ऐसे पहले मुख्यमंत्री हैं, जिन्होंने 2005 में अहमदाबाद महानगर पालिका चुनाव में प्रचार अभियान चलाया। अपने नए-नए तरीकों से गुजरात को ग्लोबल गुजरात बनाने वाले मोदी ही तो हैं।

गुजरात का आखिरी पड़ाव
मोदी के उपरोक्त दस पड़ावों और इन ग्यारह वर्षो में आई सारी चुनौतियों में मिली सफलता का यदि कोई सार है, तो वह है विकास। मोदी दिसम्बर में होने जा रहे चुनावों में इसी विकास के मु्दे को लेकर उतरे हैं। चुनौतियाँ हैं। जो कल तक साथ थे। आज नहीं हैं। गुजरात भाजपा के भीष्म केशूभाई पटेल ने नई पार्टी बना ली। संजय जोशी का मुद्दा और केन्द्रीय राजनीति में मोदी का दखल, संघ का समर्थन जैसे कई मुद्दे हैं। वैसे यह मोदी के लिए गुजरात का आखिरी पड़ाव साबित हो सकता है। गुजरात की जीत उन्हें 2014 में एक बड़े नेता के रूप में प्रस्तुत करने में सहायक होगी। यदि मोदी को देश की जनता प्रधानमंत्री के रूप में देखने योग्य समझती है, तो उसकी राह गुजरात से ही निकलेगी। विकास हुआ या नहीं, इसका निर्णय तो जनता को करना है। मोदी ने जो किया है, वह न केवल दिखता है, बल्कि मोदी अपनी ब्राण्डिंग और आधुनिक टेक्नोलॉजी के उपयोग से अपने कार्यों को जनता तक दिखाने का माद्दा और काबिलियत रखते हैं।












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