तबाही के 67 साल बाद भी वैसा ही है हिरोशिमा और नागासाकी

ज्ञात हो कि आज अगर अमेरिका को एक शब्द में डिफाइन करने को कहा जाये तो अमूमन सभी की जुबान से बस एक ही शब्द निकलेगा 'दबंग ' अमेरिका आज भी दबंग है कल भी दबंग था। हम ऐसा इसलिए कह रहे हैं की अमेरिका ने आज से ठीक 67 साल पहले जापान के दो शहर हिरोशिमा और नागासाकी पर हमला किया था।
आपको बताते चलें कि हिरोशिमा दुनिया का पहला ऎसा शहर है जहां अमेरिका ने 1945 में यूरेनियम बम गिराया था और इसके तीन दिन बाद यानी 9 अगस्त को नागासाकी पर परमाणु बम गिराया गया। इस बमबारी के पहले दो से चार महीनों के भीतर हिरोशिमा में 90 हजार से 1 लाख 60 हजार और नागासाकी में 60 हजार से 80 लोग मारे गए थे।
जहाँ कई मुल्कों द्वारा अमेरिका की इस हरकत पर कड़े शब्दों में उसकी निंदा की गयी थी। आज इस अटैक को 65 वर्ष हो गए हैं लेकिन जापान का ये हिस्सा आज भी उस हमले से प्रभावित है। आज भी यहाँ पर उत्पन्न हो रही संतानों पर इस हमले का असर साफ देखा जा सकता है।
गौरतलब है कि परमाणु बम के इस्तेमाल से अमेरिका ने न सिर्फ अपने उन्नत तकनीकी कौशल का प्रदर्शन किया, बल्कि वैश्विक राजनीति में अपनी निर्णायक भूमिका की शुरुआत भी की।
जहाँ 67 साल पहले 1945 की गर्मियों के अंतिम महीने में पॉट्सडैम शांति सम्मेलन के दौरान अमरीकी राष्ट्रपति हैरी ट्रूमैन ने इस बात का ऐलान किया कि अमरीका के पास एक नया सुपर हथियार है। कहा जा रहा था कि ट्रूमन इस जुमले को कहकर सोवियत नेता जोसेफ़ स्टालिन की आँखों में डर और ख़ौफ़ को देखना चाहते थे।
लेकिन स्टालिन ने ऐसा प्रभाव दिया जैसे कि कुछ भी नहीं हुआ है। और इसके कुछ ही दिनों के बाद हिरोशिमा और नागासाकी की त्रासदी ने पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया।
साथ ही ये भी बताया जाता है कि इस परमाणु बमबारी का कोई सैन्य महत्व नहीं था। इन शहरों में हथियार बनाने वाले कारखाने मौजूद नहीं थे। न ही वहाँ कोई बड़ा सैन्य जमाव था। अमरीका दरअसल अपने सहयोगी देश के नेता स्टालिन को यह दिखाना चाहता था कि युद्ध के बाद दुनिया के भाग्य का फैसला कौन करेगा। और इसके लिए उसने लाखों जापानी नागरिकों के जीवन बलिदान कर दिए।
खैर ये सब तो इतिहास था हम यही कामना करते हैं कि भविष्य में ऐसा दोबारा न हो आज हम केवल पूर्व में हुई गलतियों से सबक लेकर पूरी दुनिया से शांति और अमन सुकून से रहने कि अपील करते हैं।










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