नहीं होगी लक्ष्‍मी सहगल की अंत्‍योष्टि, दान में दिया शरीर

Captain Laxmi Sehgal
लखनऊ। कैप्टन लक्ष्मी सहगल जिनका नाम सुनकर कभी अंग्रेजों के भी पसीने छूट जाया करते थे। वह आज हमारे बीच नहीं रहीं लेकिन उनकी वीरता और दरियादिली के किस्से हमेशा लोगों के जहन में ताजा रहेंगे। बतौर चिकित्सक उन्होंने लोगों के लिए बहुत कुछ किया। खास बात यह है कि उनकी अंत्‍योष्टि नहीं होगी, क्‍योंकि मरने से पहले ही उन्‍होंने अपना शरीर दान कर दिया था।

वह एक स्त्रीरोग विशेषज्ञ थीं और 23 जुलाई 2012 को उनकी मौत कानपुर के हैलेट अस्पताल में हुई जहां उन्हें दिल का दौरा पडऩे के बाद भर्ती कराया गया था। करीब पांच दिनों तक जिन्दगी और मौत से जूझने के बाद आखिरकार कैप्टन सहगल अपनी अन्तिम जंग हार गयीं।

कैप्टन सहगल के जीवन के पिछले पन्नों को पलटें ऐसा बहुत कुछ है जो लोगों को प्रेरणा देता है। एक क्रिमिनल लॉयर डा. एस स्वामीनाथन की संतान लक्ष्मी सहगल शुरूआती दिनों से ही भावुक और दूसरों की मदद करने वाली रहीं। उनका कहना था कि यह बात उन्होंने अपनी मां एवी अमुकुट्टी से विरासत में पायी जो हमेशा दूसरों की मदद किया करती थीं।

कैप्टन सहगल का जन्म 24 अक्टूबर 1914 में मद्रास में हुआ था। उनके पिता मद्रास हाई कोर्ट में क्रिमिनल लॉयर थे उनका अपने इलाके में बहुत सम्मान था। मद्रास का रईस परिवार होने के नाते उन्होंने एमबीबीएस की डिग्री ली और 1938 में एमबीबीएस करने के बाद उन्होंने डिप्लोमा इन गाइनिकोलॉजी भी किया। पढ़ाई समाप्त करने के दो वर्ष बाद वह सिंगापुर चली गयीं जहां उन्होंने मजदूरों के लिए एक चिकित्सा शिविर लगाया और मजदूरों का इलाज किया।

विदेश में मजदूरों की हालत और उनके ऊपर हो रहे जुल्मों को देखकर उनका दिल भर आया। उन्होंने निश्चय किया कि वह अपने देश की आजादी के लिए कुछ करेंगीं। लक्ष्मी के दिल में आजादी की अलख जग चुकी थी इसी दौरान नेताजी सुभाष चन्द्र बोस का सिंगापुर आगमन हुआ। एक कार्यक्रम के दौरान 1943 में उनकी मुलाकात नेताजी से हो गयी फिर क्या था लक्ष्मी के कैप्टन लक्ष्मी बनने का रास्ता साफ हो गया।

कैसे उतरीं आज़ादी की लड़ाई में

करीब एक घंटे की मुलाकात के बीच लक्ष्मी ने यह इच्छा जता दी कि वह उनके साथ भारत की आजादी की लड़ाई में उतरना चाहती हैं। लक्ष्मी के भीतर आजादी का जज्बा देखने के बाद नेताजी ने उनके नेतृत्व में रानी लक्ष्मीबाई रेजीमेंट बनाने की घोषणा कर दी जिसमें वह वीर नारियां शामिल की गयीं जो देश के लिए अपनी जान दे सकती थीं।

बस फिर क्या था कैप्टन लक्ष्मी भारत लौटीं और देश की आजादी की लड़ाई में कूद पड़ीं। उनके नेतृत्व में आजाद हिन्द फौज की महिला बटालियन रानी लक्ष्मीबाई रेजीमेंट में कई जगहों पर अंग्रेजों से मोर्चा लिया और अंग्रेजों को बता दिया कि देश की नारियां चूडिय़ां तो पहनती हैं लेकिन समय आने पर वह बन्दूक भी उठा सकती हैं और उनका निशाना पुरूषों की तुलना में कम नहीं होता।

देश आजाद होने ही वाला था कि लाहौर के कर्नल प्रेम कुमार सहगल से उनके विवाह की बात चली और उन्होंने हामी भर दी। वर्ष 1947 में उनका विवाह प्रेम कुमार के साथ हो गया तथा वह कैप्टन लक्ष्मी से कैप्टन लक्ष्मी सहगल हो गयीं।

उनकी एक बेटी हुई जिसका नाम सुभाषिनी रखा जिन्होंने फिल्म निर्माता मुजफ्फर अली से विवाह किया। पति की मौत के बाद वह कानपुर आकर रहने लगीं और 1971 में उन्होंने कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इण्डिया ज्वाइंट कर ली तथा राज्यसभा में पार्टी का प्रतिनिधित्व किया। वह ऑल इण्डिया डेमोक्रेटिक्स वोमेन्स एसोसिएशन की भी सदस्या और उन्होंने महिलाओं की सामाजिक व आर्थिक स्वतंत्रता के लिए काफी संघर्ष किया। देश के प्रति उनके योगदान और उनके संघर्ष को देखते हुए राष्ट्रपति केआर नारायणनन ने उन्हें 1998 में पद्मविभूषण सम्मान से सम्मानित किया।

कलाम साहब के खिलाफ लड़ा था राष्‍ट्रपति चुनाव

उनकी पार्टी के लोगों के दबाव में उन्होंने डा. एपीजे अब्दुल कलाम के खिलाफ राष्ट्रपति चुनाव भी लड़ा लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। एक लम्बे राजनीतिक जीवन को जीने के बाद 1997 में वह काफी कमजोर हो गयीं। उनके करीबी बताते हैं कि शरीर से कमजोर होने के बाद भी कैप्टन सहगल हमेशा लोगों की भलाई के बारे में सोचती थीं तथा मरीजों को देखने का प्रयास करती थीं।

आखिरकार 19 जुलाई 2012 का वह दिन आ गया जब हृदय में तेज दर्द होने के बाद उन्हें चिकित्सालय ले जाया गया। कानपुर के हैलेट अस्पताल के आईसीयू में उन्हें भर्ती किया गया लेकिन दो दिन बाद ही वह कोमा में चली गयीं और 23 जुलाई 2012 की सुबह उन्होंने अन्तिम सांस ली।

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