राजनीति के दादा ने शुरू किया रायसीना का सफर

वह पहली बार 1969 में राज्यसभा के लिए चुने गए। एक बार राज्यसभा की ओर गए तो कई वर्षों तक जनता के बीच जाकर चुनाव नहीं लड़ा। सियासी जिंदगी के आखिरी पड़ाव में उन्होंने लोकसभा का रुख जरूर किया। 2004 में वह पहली बार पश्चिम बंगाल के जंगीपुर संसदीय क्षेत्र से चुने गए। 2009 में भी उन्होंने जीत का सिलसिला जारी रखा। सरकार के संकटमोचक के तौर पर कांग्रेस में अपनी विश्वसनीयता की धाख जमा चुके प्रणव को पार्टी ने इस बार राष्ट्रपति का उम्मीदवार बनाया तो उन्हें बड़ी संख्या में राजनीतिक दलों ने अपना समर्थन दिया।
प्रणव को संप्रग की ओर से राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाए जाने के बाद कानून मंत्री सलमान खुर्शीद ने कहा, प्रणव जी पार्टी और सरकार में एक स्तंभ रहे हैं। उनकी कमी हमेशा महसूस की जाएगी। प्रणव प्रधानमंत्री बनने से कई बार चूके, लेकिन इस महत्वपूर्ण पद पर न होते हुए भी संकट के समय सभी लोग उनकी ओर ही देखते थे। बीते 26 जून को वित्त मंत्री पद से प्रणव मुखर्जी के इस्तीफा देने के तत्काल बाद प्रधानमंत्री ने उन्हें पत्र लिखकर सरकार में उनके योगदान के लिए आभार जताया और कहा कि उनकी कमी सरकार में हमेशा महसूस की जाएगी। 1980 के दशक में प्रधानमंत्री पद की हसरत का इजहार करने के बाद उन्होंने कांग्रेस से बगावत कर दी थी।
बाद में वह फिर से कांग्रेस में आए और सियासी बुलंदियों को छूते चले गए। देश में आपातकाल के समय इंदिरा मंत्रिमंडल में वह राजस्व राज्य मंत्री थे और बाद में इंदिरा गांधी की सरकार में ही वित्त मंत्री बनाए गए। 1991 में प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव ने उन्हें विदेश मंत्री बनाने के साथ ही योजना आयोग का उपाध्यक्ष का पद दिया। मनमोहन सिंह की सरकार में वह रक्षा मंत्री, विदेश मंत्री और वित्त मंत्री रहे। प्रणव के पिता किंकर मुखर्जी भी कांग्रेस के नेता हुआ करते थे। कुछ वक्त के लिए प्रणव ने वकालत भी की और इसके साथ ही पत्रकारिता एवं शिक्षण में भी कुछ वक्त बिताया। इसके बाद उनका सियासी सफर शुरू हुआ।












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