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सत्‍यमेव जयते ने खाप की गलतियां ढूंढी, कारण नहीं

Satyamev Jayate Vs Khap Panchayat
[रमेश चहल] खाप पंचायतों की भूमिका पर फिर चर्चाएं शुरु हो गई हैं। हरियाणा एक बार फिर बुद्धिजीवी कहलाने वाले लोगों के निशाने पर हैं। आमिर खान के चर्चित शो सत्यमेव जयते में खाप पंचायतों पर फिर से आधारहीन टिप्पणियां की गई हैं। इधर खाप पंचायतें आमिर से मा‍फी मंगवाने की तैयारी में भी जुट गई हैं। इस कार्यक्रम में प्रदेश की परम्पराओं, रीति-रिवाज, मान्यताओं की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को बिल्कुल भी नहीं छुआ गया।

बस बार-बार कानून की दुहाई देकर महम चौबिसी के प्रतिनिधियों पर हावी होना ही मकसद दिखाया गया। सारा कार्यक्रम एक तरफा था। जब भी महम चौबिसी का कोई प्रतिनिधि जवाब देता तो उसे बीच में ही रोक कर पूछा जाता कि क्या ये कानून में है? जबकि हर कोई मानता है कि जरूरी नहीं कि हर चीज कानून में हो। उदाहरणस्वरूप कानून में कहीं नहीं लिखा कि आप अपने बच्चों को संस्कार दें और ये भी नहीं लिखा कि मां-बाप का ये फर्ज है कि वो अपने बच्चों की शादी करें। पर फिर भी हम करते हैं।

कानून कहता है कि 18 साल से ऊपर की आयु की लड़की अपनी मर्जी से बिना शादी किए भी लिव इन रिलेशन में रह सकती है। उसे ये अधिकार है, तो क्या हम अपनी लड़कियों को 18 साल के बाद ये अधिकार दे देते हैं? जवाब सबका ना होगा। हम बच्चों के उज्ज्वल भविष्य, अच्छे चरित्र के लिए सारी जिंदगी प्रयत्नशील रहते हैं। उन्हें सुखी देखना चाहते हैं, इसलिए ऐसे अधिकार हम नहीं देते। इसे नैतिक फर्ज कहा जाता है। हरियाणा में अगर बुजुर्ग पंचायत में कोई फैसला लेते हैं तो ये उसी नैतिक फर्ज का ही हिस्सा है।

यदि आज हरियाणा समृद्ध है और इसके युवा आज नशों से दूर स्पोर्ट्स में अव्वल हैं, तो इसका एक कारण बड़े-बुजुर्गों की शर्म भी है। अगर कुछ युवा नशे करते भी हैं, तो वो कभी नहीं चाहते कि उनके बाप-दादा को इसकी भनक तक लगे। बुजुर्गों का ये डर नई पीढ़ी के लिए फायदेमंद ही साबित हुआ है और इसका प्रमाण भी कॉमनवेल्थ गेम्स में देखने को मिला, जहां अकेले हरियाणा के पास बाकि सारे देश से ज्यादा पदक थे। ये सब कानून में कहीं नहीं लिखा कि अपने बुजुर्गों से डर कर रहो। ये नैतिक मूल्यों और संस्कारों का ही हिस्सा है कि बड़ों का आदर करो।

मेरे एक दोस्त ने आमिर जी के लिए एक और संदेश मुझे फोन पर बताया। उनका कहना है कि इस कार्यक्रम में बार-बार कानून की दुहाई देने वाले आमिर खान को कोई जाकर बताए कि संविधान में अश्लीलता और गाली-गलौज के लिए मनाही है, पर फिर भी डीके बोस को राष्‍ट्रीय धावक बनाने के पीछे क्या मकसद था, ये हर किसी को पता है। वहां कानून कहां गायब हो जाता है।

सत्‍यमेव जयते के एपिसोड में महम चौबिसी के प्रतिनिधी अपना पक्ष मजबूती से नहीं रख पाए, जबकि उनके पास बोलने को काफी कुछ था। वजह थी, इस तरह के कार्यक्रमों में कैमरे के सामने बोलने की उनकी आदत नहीं थी। साफ दिख रहा था कि वो बिना किसी तैयारी के आए हुए थे। साथ ही साथ बीच-बीच में एक-दूसरे को ऐसे ताक रहे थे, जैसे वो कार्यक्रम में ना होकर किसी पंचायत में बैठे हों।

आमिर ने गलतियां निकालीं, कारण नहीं खोजे

डॉ. चौधरी अपना पक्ष सही ढंग से रखने में कामयाब रहे और मनोज की बहन का भाई को याद करके रोना भी जायज था। उसने भाई खोया है। कार्यक्रम भावुक होना ही था। मनोज और बबली की हत्या करना भी गलत हुआ। यही नहीं बाद में करोड़ा गांव में हुई पंचायत में मनोज की मां व बहन का सामाजिक बहिष्कार का फैसला भी गलत लिया गया। यही सब कैथल के ही एक गांव मटौर निवासी वेदपाल के साथ हुआ और उसे भी गांव सिंगवाल में अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। ये सब हरियाणा में गलत हुआ, पर हमें इन गलतियों के कारण को भी खोजना होगा। जो इस कार्यक्रम में कहीं भी नहीं खोजा गया।

एक गोत्र के लोग क्‍यों न हों भाई-बहन

प्रदेश हरियाणा में एक ही गौत्र के लड़का-लड़की भाई बहन माने जाते हैं और ये मानना गलत भी नहीं है। 30 से लेकर 35 पीढ़ी पहले से ये गौत्र परम्पराएं चली आ रही हैं, जो सही भी हैं। ये सब पता होते हुए भी मनोज और बबली ने आपस में शादी की। बबली के घरवालों का नाराज होना लाजिमी था। इस नाराजगी में उन्हें गौत्र समाज का भी समर्थन मिला तो उन्होंने इस घटना को बेखौफ होकर अंजाम दे दिया।

उन्होंने ठंडे दिमाग से इसका कोई उपयुक्त सा हल निकालने की नहीं सोची। बबली के घरवालों ने दोनों को मारकर अपनी दुश्मनी निकाली और बदनामी पूरी खाप के हिस्से आई। अब प्रश्न खाप के समर्थन का है, तो खाप भाई-बहन की शादी को कैसे मान्यता दे सकती थी। इस समाज के लिए यह बात पचा पाना किसी कहर से कम नहीं है।

इस समाज में क्‍यों नहीं हो सकती एक गोत्र में शादी

यहां एक और हवाला दिया जा रहा है कि अगर दूसरे समाज में एक ही गौत्र में शादी हो सकती है तो इस समाज में क्यों नहीं? इसके कारण हैं। पहला जब इस समाज ने अपनी मान्यताएं कभी दूसरे समाज पर नहीं थोपी, तो इस पे दूसरे समाज की मान्यताएं क्यों थोपी जाएं? दूसरा, कई समाज ऐसे भी हैं जहां चाचा या ताऊ के लड़के या लड़कियों की भी आपस में शादी जायज मानी जाती है। इस तरह की मान्यताएं वो समाज कैसे अपना सकता है, जहां पड़ोसी गांव की लड़की तक को बहन माना जाता है?

बड़े बुजुर्गों द्वारा लिए गए भाई-बहन मानने के फैसले को सराहना मिलनी चाहिए। उनके ये फैसले उनकी उच्च चारित्रिक मानसिकता का परिचय देते हैं। एक स्वस्थ समाज की कल्पना उनकी सोच में छिपी हुई है। मैं पहले भी 2 अपै्रल 2010 के आलेख में कह चुका हूं कि हरियाणा के देहात की टीस शहर में बैठा शहरी नहीं समझ सकता। उसका दर्द समझने के लिए गांव में जाना होगा और ग्रामीण परिवेश में रहकर देखना होगा। ग्रामीण मान्यताओं और परम्पराओं को वैज्ञानिक ढंग से परखना होगा। ग्रामीण भाईचारे की कीमत परखनी होगी और सदियों से बने आपसी संबंधों का अध्ययन करना होगा, तभी इस मुद्दे पर कोई टिप्पणी की जा सकती है।

सम गोत्र की शादी को डॉक्‍टर भी गलत मानते हैं

सम गौत्र या वंश में शादी को चिकित्सा जगत भी सही नहीं मानता। इस तरह की शादियों से अनुवांशिक अवगुण और बीमारियों का खतरा सबसे जयादा रहता है। बच्चा मंदबुद्धि, अपंग और अनुवांशिक बीमारियों से ग्रस्त पैदा हो सकता है। जबकि दूसरी ओर दूसरे वंश में शादी से अनुवांशिक अवगुण खत्म होते हैं और नस्ल में गुणों की मात्रा बढ़ती जाती है। यही कारण है कि जिस समाज में सम गौत्र शादी की अनुमति नहीं है, वे लोग ह्ष्ट-पुष्ट और शारीरिक विकास के मामले में दूसरों से काफी भिन्न हैं।

अब रही कानून या संविधान की बात। हिंदू मैरिज एक्ट में प्रावधान है कि समगौत्र (बाप का) में सात पीढि़यों तक और सपिंड (मां का गौत्र) में पांच पीढिय़ों तक की गई शादी अवैध है। संविधान में रिवाज, रूढ़ी और मान्यताओं को भी स्वीकारा गया है, बशर्तें वो 100 वर्ष से ज्यादा पुरानी हों। इस क्षेत्र में समगौत्र में शादी न करने की मान्यता तो हजारों वर्षों पुरानी है। फिर इसको भी हर हाल में माना जाना चाहिए और संविधान को जब परिभाषित किया जाता है, तो यही कहा जाता है कि यह मान्यताओं, परम्पराओं का लिखित स्वरूप है, जिसके आधार पर शासन चलाया जाता है। तब भी ये मान्यताएं क्यों नहीं मानी जा रही? खाप को ये मान्यताएं मनवाने के लिए जोरदार अहिंसक आंदोलन चलाना ही होगा, ताकि समाज में रिश्ते कायम रह सकें।

खाप पंचायतों को फिलहाल अपनी साख के अनुरूप कार्य करने की जरूरत है। अगर किसी खाप पंचायत के नुमाइंदे गलत फैसला लेते हैं, तो दूसरी खाप का फर्ज बनता है कि उनको समझाएं। गिनती के दो-चार आदमियों के कारण ही आज खाप पंचायतों की भूमिका नकारात्मक बन गई है, जबकि इनका एक सवर्णिम इतिहास रहा है। अब एक सर्वखाप महापंचायत बनाने की आवश्यकता है, जो खापों को बदनाम करने वाले फैसलों पर नजर रखें और मौके पर जाकर उनका विरोध करें। यह करना ही होगा, क्योंकि प्रदेश और खाप दोनों की साख का सवाल है।

लेखक परिचय- रमेश चहल, हरियाणा के अखबार दैनिक सच कहूं के सह संपादक हैं।

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