आखिर कौन थे ब्रह्मेश्‍वर सिंह और क्‍या है रणवीर सेना?

Ranvir Sena
आरा। रणवीर सेना के संस्‍थापक ब्रह्मेश्‍वर सिंह को आज सुबह गोलियों से छलनी कर दिया गया। उनकी मौके पर ही मौत हो गई। ब्रह्मेश्‍वर सुबह लगभग 7 बजे घर से टहलने के लिये निकले थे। ब्रह्मेश्‍वर सिंह की हत्‍या के बाद बिहार के आला और भोजपुर जिले में तनाव का माहौल है और किसी अनहोनी की आशंका को भांपते हुए कर्फ्यू का ऐलान कर दिया गया है। हालात पर काबू पाने के लिये सीआरपीएफ को भी जिले में तैनात किया है।

रणवीर सेना और उसके संस्‍थापक ब्रह्मेश्‍वर सिंह के बारे में वैसे तो सभी को पता है मगर कुछ लोग ऐसे भी हैं जिनका इन दोनों नामों से कोई वास्‍ता नहीं है। मगर जब ब्रह्मेश्‍वर सिंह की हत्‍या को सुशासन में राजनीति की सबसे बड़ी हत्‍या बताई जा रही है तो यह जरुरी है कि इनके बारे में चर्चा हो। तो आईए हम आपको रणवीर सेना और ब्रह्मेश्‍वर सिंह के इतिहास के बारे में विस्‍तार से बताते हैं।

आखिर कौन थे ब्रह्मेश्वर मुखिया?

ब्रह्मेश्‍वर सिंह उर्फ बरमेसर मुखिया बिहार की जातिगत लड़ाईयों के इतिहास में कोई नया नाम नहीं था। भोजपुर जिले के खोपिरा गांव के रहने वाले मुखिया ऊंची जाति के ऐसे व्यक्ति थे जिन्हें बड़े पैमाने पर निजी सेना का गठन करने वाले के रुप में जाना जाता था। बिहार में नक्सली संगठनों और बडे़ किसानों के बीच खूनी लड़ाई के दौर में बड़े किसानों ने मुखिया के नेतृत्व में अपनी एक सेना बनाई थी। सितंबर 1994 में बरमेसर मुखिया के नेतृत्व में जो सगंठन बना उसे रणवीर सेना का नाम दिया गया। उस समय इस संगठन को भूमिहार किसानों की निजी सेना कहा जाता था।

इस सेना की खूनी भिड़ंत अक्सर नक्सली संगठनों से हुआ करती थी। बाद में खून खराबा इतना बढ़ा कि राज्य सरकार ने इसे प्रतिबंधित कर दिया था। नब्बे के दशक में रणवीर सेना और नक्सली संगठनों ने एक दूसरे के खिलाफ कई बड़ी कार्रवाईयां भी कीं जिसमें सबसे बड़ा लक्ष्मणपुर बाथे नरसंहार था। यह नरसंहार 1 दिसंबर 1997 को हुआ था जिसमें 58 दलित मारे गए थे। इस घटना ने राष्ट्रीय स्तर पर बिहार की जातिगत समस्या को उजागर कर दिया था और मुखिया को मुख्‍य अभियुक्‍त माना गया था। इसके अलावा मुखिया बथानी टोला नरसंहार में अभियुक्त थे। 29 अगस्त 2002 को पटना के एक्सीबिजन रोड से उन्हें गिरफ्तार किया गया उन पर पांच लाख का ईनाम था और वो जेल में नौ साल रहे।

सजा काटने के बाद 8 जुलाई 2011 को वह रिहा हुए थे। चौकाने वाली बात यह है कि मुखिया को 277 लोगों की हत्या से संबंधित 22 अलग अलग आपराधिक मामलों (नरसंहार) में इन्हें अभियुक्त माना जाता था। इनमें से 16 मामलों में उन्हें साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया गया था। बाकी 6 मामलों में ये जमानत पर थे। जब वो जेल से छूटे तो उन्होंने 5 मई 2012 को अखिल भारतीय राष्ट्रवादी किसान संगठन के नाम से संस्था बनाई और ऐसा माना जा रहा है कि वो किसानों के हित की लड़ाई लड़ते रहेंगे। मगर आज तड़के उनकी हत्‍या कर दी गई।

क्‍या है रणवीर सेना?

रणवीर सेना की स्थापना 90 के दशक में मध्य बिहार के भोजपुर जिले में की गई थी। यह संगठन नक्सलियों के आतंक से बचने के लिए प्रतिरक्षा के रूप में बनाया गया था। इस संगठन के लोगों ने गांव-गांव जाकर किसानों को नक्सलियों के अत्याचारों के खिलाफ उठ खड़े होने के लिए प्रेरित किया। शुरुआत में इनके साथ लाईसेंसी हथियार वाले लोग हीं जुटे, फिर अवैध हथियारों का जखीरा भी जमा होने लगा। गया, औरंगाबाद, जहानाबाद, भोजपुर सहित मध्य बिहार में इसका दबदबा बढ़ने लगा। जिस समय रणवीर किसान संघ बना उस वक्त नक्सलियों ने मध्यम और लघु किसानों के खिलाफ आर्थिक नाकेबंदी लगा रखा था।

करीब पांच हजार एकड़ जमीन परती पड़ी थी, खेती पर रोक लगा दी गई थी और मजदूरों को खेतों में काम करने से जबरन रोक दिया जाता था। कई गांवों में फसलें जलाई जा रही थीं और किसानों को शादी-ब्याह जैसे समारोह आयोजित करने में दिक्कतें आ रही थी। इन स्थितियों ने जमीदारों को एकजुट होकर प्रतिरक्षा करने के लिए माहौल तैयार किया। और जो फौज तैयार हुई उसका नाम रणवीर सेना रखा गया। 2002 में ब्रह्मेश्‍वर सिंह के गिरफ्तारी के बाद से सेना धीरे-धीरे धाराशाई होती गई और उसका वजूद खोता गया।

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