सवाल पूछे जाने पर ममता ने छात्रा को बताया माओवादी

mamata banerjee
कोलकाता। ममता सरकार को एक साल पूरे हो गये है लेकिन इस खुशी के मौके पर भी विवादों के घेरे में आ गयी है। ममता बनर्जी से एक कार्यक्रम के दौरान बलात्‍कार से जुडे एक सवाल पूछने पर कालेज की छात्रा तान्‍या भारद्वाज पर पुलिस जांच के आदेश दे दिए है। इस प्रश्‍न से ममता बनर्जी के नाराज होकर चले जाने से छात्रा तानिया ने एक खुला पत्र लिखकर उनको खुली चुनौती दी है।

छात्रा राजनीतिक शास्‍त्र की छात्रा है, ममता को लिखा खुला पत्र टेलीग्राफ अखबार में छपा है। ममता के एक साल पूरे होने पर सीएनएन-आईबीएन चैनल ने ममता सरकार के एक साल पूरे होने पर एक कार्यक्रम आयोजित किया गया था, जिसमें आम लोग मुख्‍यमंत्री से सीधे सवाल करेंगे। कार्टून और एक बलात्‍कार मामले पर सवाल पूछे जाने पर ममता नाराज हो गयी।

ममता इतनी भड़क गयी कि उन्‍होंने उस छात्रा को माओवादी बता दिया। इसपर तानिया ने ममता को खुला पत्र लिखकर कहा कि 'माफ करीएगा मैम मै माओवादी नहीं हूं'। उसने पूछा कि मैने ऐसा क्‍या किया है कि आपने भरी सभा में मुझे माओवादी करार दे दिया। मैने तो सिर्फ आपसे एक सवाल किया था।

मैने तो वहीं पूछा जो और लोग पूछना चाहते थे। हम लोगों ने परिवर्तन के लिए मतदान किया था, क्‍या हम नेताओं से यही उपेक्षा करें।

वहीं दूसरी तरफ पश्चिम बंगाल का बुद्धिजीवी वर्ग कभी ममता बनर्जी का समर्थक था। लेकिन अब जब राज्य में तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष के शासन के एक साल पूरे हो चुके हैं तो बुद्धिजीवियों की राय ममता के बारे में अलग अलग है। कुछ को जहां लगता है कि ममता निरंकुश हैं और उन्हें अपनी आलोचना बर्दाश्त नहीं होती।

वहीं ज्यादातर की राय है कि तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष को और समय चाहिए। शिक्षाविद सुनंदा सान्याल, साहित्यकार महाश्वेता देवी, अभिनेता कौशिक सेन, लेखक नाबरूण भट्टाचार्य, बांग्ला कवि संखा घोष ने पिछले कुछ माह के दौरान कई मुद्दों को लेकर मुख्यमंत्री की खूब आलोचना की है।

इस आलोचना का कारण पार्क स्ट्रीट बलात्कार मामले से निपटने का तरीका, सरकारी ग्रंथालयों में चुनिंदा अखबार भेजा जाना, ममता विरोधी कार्टून को लेकर उठा विवाद और दो प्रोफेसरों की गिरफ्तारी जैसे मुद्दे थे। पिछले माह, ममता का उपहास करने वाले कार्टून को ईमेल से अग्रसारित करने के लिए जादवपुर विश्वविद्यालय के प्रो अंबिकेश महापात्र की गिरफ्तारी सहित कई मुद्दों के विरोध में बुद्धिजीवियों ने मौन जुलूस निकाला था।

सुनन्दा सान्याल ने बताया कि उनके कुछ गुण मुझे निरंकुश जैसे लगते हैं। न तो प्रोफेसरों को गिरफ्तार किया जाना चाहिए और न ही राज्य के ग्रंथालयों में अखबारों पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए। वह पूर्ववर्ती वाम मोर्चा सरकार के नक्शेकदम पर ही चल रही हैं। निश्चित रूप से यह बदलाव अच्छाई के लिए नहीं है।

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