दिल्‍ली में देह व्‍यापार के कोड वर्ड में छिपे कॉलेजों के नाम

Woman
दिल्ली (राजेश केशव)। दिल्ली और उसके आस-पास के इलाकों में एक चिरपरचित शब्द बहुत गलत मायने में इस्तेमाल हो रहा है। यह शब्द है 'टैक्सी'। देह व्‍यापार से जुड़े लोग सहमति से यौन संबंध बनाने वाली युवतियों के लिए यह शब्द इस्तेमाल करते हैं, लेकिन क्‍या आपको पता है, कि कोड वर्ड के दलदल में दिल्‍ली के कई विश्‍वविद्यालय और कॉलेजों के नाम भी बदनाम हो रहे हैं।

तमाम जगहों पर चल रहे रैकेटों से जुड़े लोग बातचीत में हमेशा युवती के लिए 'टैक्सी' शब्‍द का इस्तेमाल करते हैं। टैक्‍सी किराये पर लेते वक्‍त लोग पूछते हैं कि उन्‍हें इंडिका/स्‍कॉर्पियो/मर्सडीज़ चाहिये। जितने समय के लिए चाहिये होती है वह भी बताते हैं। लेकिन दिल्‍ली में इन ब्रांडेड कारों के नामों का इस्‍तेमाल कॉल गर्ल्‍स के लिए किया जाता है।

अगर सहमति से कोई सामान्‍य लड़की बेडरूम तक जाने के लिए तैयार होती है तो उसके लिए 'मारुति टैक्सी' शब्द का इस्तेमाल किया जाता है। बाजार में सबसे ज्यादा डिमांड मेडिकल, इंजीनियरिंग और पीजी छात्राओं की है। वो भी राजधानी के बड़े विश्‍वविद्यालयों और कॉलेजों की। इनके लिए 'मर्सडीज टैक्सी' शब्द इस्तेमाल होता है। इसी तरह अलग-अलग वर्ग की युवतियों के लिए अलग-अलग कारों का नाम इस्तेमाल होता है।

दिल्ली में वृहद स्‍तर पर हो रहे इस व्‍यापार में कोडिंग में इस तरह बात की जाती है, कि किसी को भी शक भी नहीं होता। देह के सौदागरों के पास आने वाले ग्राहक कहते हैं, "टैक्सी के लिए मर्सडीज चाहिए।" तीन लोगों को जाना है। पूरे दिन के लिए गाड़ी चाहिए। फोन पर कोई भी यह बात सुनले तो कुछ नहीं समझ सकता। यदि दलाल कहता है कि मर्सडीज की स्थिति ठीक नहीं है, दो लोग ही इस पर जा सकते हैं। वह भी दो घंटे के लिए। पूरे दिन के लिए संभव नहीं है। इसका मतलब आप समझ गये होंगे।

इनके कोड वर्ड्स को अगर अनकोड करें तो मतलब है किसी बड़ी यूनिवर्सिटी की छात्रा चाहिये। तीन लोग हमबिस्‍तर होंगे। यहां रेट का अलग हिसाब होता है। कोई अकेले है तो 4 हजार रुपए की डिमांड होती है। दो लोग हैं तो 10 हजार और उससे ज्‍यादा बढ़े तो डिमांड 30 हजार रुपए तक बढ़ जाती है। यह गणित आम गणित से बिल्कुल अलग है। लेकिन धनाड्य परिवारों से जुड़े लोग इतना पैसा खर्च भी करते हैं।

दिल्‍ली पुलिस के एक एसएचओ ने बताया कि दिल्‍ली में देह व्‍यापार की शिकार होने वाली युवतियों में सबसे ज्‍यादा संख्‍या ग्रामीण व छोटे शहरों से आने वाली लड़कियां होती हैं। उनमें पैसे के प्रति आकर्षण काफी होता है और अंत में वो फंस जाती हैं। पुलिस का यह भी कहना है कि शहरी युवतियां अपनी मर्जी से आ जाती हैं, लेकिन उन्हें झांसा देना इतना आसान नहीं होता।

खैर हमने इस खबर में उन कॉलेजों व विश्‍वविद्यालयों के नाम का खुलासा नहीं किया है, लेकिन हमारी सलाह है कि संस्‍थानों व कॉलेजों के प्रॉक्‍टोरियल बोर्ड सीधे दिल्‍ली पुलिस से संपर्क करें और अगर उनके कॉलेज की छात्राएं इसमें लिप्‍त हैं, तो उन्‍हें बाहर निकालने की कोशिश करें। क्‍योंकि जब किसी रैकेट का पर्दाफाश होता है, तब लड़की की सारी डीटेल रिकॉर्ड की जाती हैं, ऐसे में कॉलेज का नाम खराब होने की पूरी संभावना रहती है।

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