2जी पर राष्ट्रपति ने सुप्रीम कोर्ट से पूछा सात यक्ष प्रश्न

- रेफरेंस के माध्यम से पूछा गया है कि क्या हर मामले में और हर परिस्थिति में सभी प्राकृतिक संसाधनों को सिर्फ नीलामी के जरिए ही दिया जाएगा?
- क्या प्राकृतिक संसाधनों को सिर्फ नीलामी के जरिए देने की कानूनी अवधारणा सुप्रीम कोर्ट के अन्य फैसलों का उल्लंघन नहीं करती?
- क्या इस तरह का सिद्धांत प्रतिपादित करना सरकार की नीति को समाप्त करना नहीं है, जो कि पूर्ववर्ती सरकारों ने काफी सोच-विचार के बाद लागू की थी?
- कोर्ट सरकार के नीतिगत मामलों में किस हद तक दखल दे सकता है जिसमें प्राकृतिक संसाधनों का आवंटन भी शामिल है?
अगर न्यायिक समीक्षा में कोर्ट नीति को गलत ठहराता है तो क्या उसे उस मामले में हुए निवेश के पहलू पर विचार नहीं करना चाहिए, खासतौर पर ऐसे विदेशी निवेश जो बहुपक्षीय या द्विपक्षीय समझौतों के तहत किए गए? इन मुद्दों पर भी कोर्ट से स्थिति स्पष्ट करने को कहा है। मसलन 1994 में जो दूरसंचार लाइसेंस दिए गए हैं उन पर क्या असर पड़ेगा। 2001 में दिए गए बेसिक टेलीकाम लाइसेंस और 2003 -2007 में दिए गए अन्य लाइसेंसों पर क्या असर पड़ेगा।
क्या भारत सरकार को मौजूदा लाइसेंस धारक कंपनियों के बीच एक समान अवसर बनाने के लिए नीतियों में कोई बदलाव करने का अधिकार है। क्या भारत सरकार को अभी तक दिए गए सभी स्पेक्ट्रम वापस लेने या सभी कंपनियों से पूर्व प्रभाव (पहले से) लाइसेंस शुल्क वसूलने का अधिकार है। राष्ट्रपति ने कोर्ट से पूछा है कि क्या सरकार के पास अभी भी ये अधिकार हैं। जिनमें क्या वह स्पेक्ट्रम आवंटित कर सकती है या नहीं। क्या सरकार ट्राई की संस्तुतियों के मुताबिक स्पेक्ट्रम अधिग्रहण की सीमा तय कर सकती है।
खास तौर पर आपातकालीन परिस्थितियों में सरकार के पास यह अधिकार है कि नहीं। यह भी पूछा गया है कि जिन कंपनियों के 2जी लाइसेंस रद हुए हैं उन्हें अगर 3जी लाइसेंस मिले हैं उस पर क्या प्रभाव पड़ेगा। मालूम हो कि 2जी मामले में 122 लाइसेंस रद करने के सुप्रीम कोर्ट के गत 2 फरवरी के फैसले के बाद उपजी कानूनी भ्रांतियों और समस्याओं पर सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में प्रेसीडेंशियल रेफरेंस भेजने का फैसला किया था।












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