भारत आ रहे हैं चीतें, 64 साल पहले खत्म हो गए थे

अफ्रीका से 12 चीतों की पहली खेप जून तक देश में पहुंच जाएगी। इन 12 चीतों को मध्य प्रदेश के कुनो पालपुर वाइल्डलाइफ डिवीजन में रखा जाएगा। चीतों के लायक माहौल तैयार करने के लिए केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने तीस मार्च को 1.90 करोड़ रुपये की पहली किस्त जारी कर दी है। इससे पहले भारत में छत्तीसगढ़ के सरगुजा में करीब 64 साल पहले अंतिम चीता देखा गया था। देहरादून स्थित भारतीय वन्य जीव संस्थान के वैज्ञानिकों की देखरेख में वहां चीतों के लायक माहौल तैयार किया जा रहा है। चीते मैदानी क्षेत्र में खुद को ज्यादा बेहतर महसूस करते हैं। इसीलिए संस्थान के वैज्ञानिकों ने कुनो को चुना है। इन नए मेहमानों को भोजन की समस्या नहीं रहे इसके लिए हिरन-सांभर समेत अन्य जीवों को भी कुनो में उपलब्ध कराया जा रहा है।
दो साल पहले डिप्लोमेसी के तहत नामीबिया ने भारत को 50 चीते देने पर सहमति जताई थी। इसके बाद से ही भारत में चीते लाने की प्रक्रिया शुरू हो गई थी। संस्थान के वैज्ञानिकों ने चीतों के लिए तीन स्थानों का चयन किया। इसमें से मध्य प्रदेश में ग्वालियर के पास कुनो, नौरादेवी तथा राजस्थान का जैसलमेर शामिल है। मध्य प्रदेश सरकार ने तो प्रोजेक्ट को हरी झंडी दे दी है। राजस्थान की ओर से अभी ऐसा नहीं हुआ है। हालांकि केंद्र सरकार जैसलमेर में चीतों को बसाने के लिए बात कर रही है। इसी को ध्यान में रखते हुए केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने पहले चरण में मध्य प्रदेश के कुनो पालपुर में चीते लाने के लिए पहली किस्त जारी की है।
विश्व में सिर्फ अफ्रीका महाद्वीप में ही चीते पाए जाते हैं। भारतीय वन्यजीव संस्थान के वैज्ञानिक डॉ. वाईएस झाला के अनुसार अफ्रीका के चार या पांच देशों को छोड़कर सभी देशों में चीते पाए जाते हैं। यहां इनकी संख्या लगभग दस हजार के आसपास है।भारत में 1961 तक चीते पाए जाते थे। 1961 के बाद भारत से भी चीते विलुप्त हो गए। वह भी सिर्फ अवैध शिकार के कारण। इससे पहले एशिया के दूसरे देशों में चीते विलुप्त हो गए थे। पाकिस्तान, अफगानिस्तान, अरब देशों में भी चीते 1950 के दशक तक पाए जाते थे।












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