बिहार: नीतीश के सुशासन में 409 करोड़ का घोटाला!

Nitish Kumar
पटना। भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) ने नीतीश के सुशासन पर अंगुली उठायी है। मंगलवार को जारी हुई कैग की रिपोर्ट (2010- 11) में कहा गया है कि लगातार आग्रह के बावजूद सरकार ने 22575.37 करोड़ का हिसाब (डीसी बिल) नहीं दिया। यह 2002-03 से 2010-11 तक की स्थिति है। प्रधान महालेखाकार (बिहार) आरबी सिन्हा ने इसे गंभीर मामला कहा है। उनके अनुसार यह नार्मल स्थिति नहीं है। हालांकि उन्होंने राज्य सरकार के तर्को के हवाले यह भी कहा कि डीसी बिल जमा करने के बारे में सरकारी प्रयास जारी हैं।

वे यहां संवाददाताओं से बात कर रहे थे। इससे पहले बिहार विधानमंडल के दोनों सदनों में यह रिपोर्ट पेश की गई। श्री सिन्हा ने कहा कि सरकार की तरफ से डीसी बिल के साथ अब तक आये दस्तावेजों की जांच की जा रही है। कुछ मामलों में स्वाभाविक रूप से संदेह की स्थिति उत्पन्न होती है। जांच पूरी होने के बाद अलग से इसकी रिपोर्ट बनेगी। उन्होंने आज सार्वजनिक की गई रिपोर्ट का व्यापक हवाला देते हुए बताया कि अंतिम चार दिन (28 मार्च 2011 से 31 मार्च 2011) में खजाने से 937.75 करोड़ निकले।

उनका मानना था कि ये रुपये कहीं पार्क किये गये होंगे, इन्हें खजाने से निकाल कर रख दिया गया होगा। 22575 करोड़ का हिसाब नहीं यह मुनासिब नहीं है। चूंकि बजट पूरे वर्ष के लिए होता है और खर्च, इसी समय के अनुसार ही होना चाहिये। रिपोर्ट में 409.15 करोड़ रुपये के बारे में कहा गया है कि या तो इतनी बड़ी राशि का गबन हुआ है, गलत निकासी हुई या फिर इतने की हानि व चोरी के सबूत मिले हैं। ऐसे मामलों में ग्रामीण विकास विभाग अव्वल नम्बर पर है। इस विभाग की 328.36 करोड़ की राशि इस दायरे में है। रिपोर्ट के अनुसार 2010-11 के दौरान 14474.03 करोड़ खर्च नहीं हुए।

कुल 66292.08 करोड़ का प्रावधान था। कैग को इस बात पर आपत्ति है कि समय पर उपयोगिता प्रमाणपत्र नहीं मिलता है। रिपोर्ट के मुताबिक 21291 लंबित उपयोगिता प्रमाणपत्रों में से 20190 प्रमाणपत्र नौ वर्ष से अधिक समय से विभिन्न सरकारी विभागों में पड़े हुए हैं। रिपोर्ट में बोर्ड-निगमों के हालात की चर्चा के साथ विभागों द्वारा नियमों की अवमानना, अधिक-निरर्थक-अलाभकारी खर्च, अनियमित-असमायोजित व्यय, निरीक्षण-संचालन में विफलता आदि का भी खासा जिक्र है।

इससे जुड़े ढेर सारे उदाहरण हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि 2010-11 तक 350 परियोजनाएं अपूर्ण रहीं। इनमें 1005 करोड़ फंसे रहे। रिपोर्ट के अनुसार कैग की आपत्तियों को निपटाने में विभाग बहुत दिलचस्पी नहीं लेते हैं। 7202 निरीक्षण प्रतिवेदनों से संबंधित 36119 कंडिकाएं अक्टूबर 2011 के अंत तक लंबित रहीं।

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