46 हजार जवानों ने लिया वीआरएस

इन पांच सालों में 461 जवानों ने अवसाद समेत तमाम कारणों से आत्महत्या की तो जवानों के बीच आपस में ही गोलीबारी के 61 मामले सामने आए हैं।जवानों के इस दर्द को राज्यसभा में भाजपा उपनेता एसएस अहलूवालिया ने सामने लाने की कोशिश की लेकिन इसे जवानों का दुर्भाग्य ही कहें कि उस समय सरकार पक्ष की बेंचों पर इस आवाज को सुनने वाले इक्का दुक्का ही सांसद बैठे थे, जबकि महज एक कैबिनेट मंत्री मौजूद थे। पीछे की बेंच पर कुछों को छोड़कर आगे की बेंचों पर तो सन्नाटा छाया हुआ था। ऐसे में सरकार की तरफ से जवाब कहां से आता। लिहाजा, अहलूवालिया के भाषण के बाद विपक्ष के कुछ सांसदों की ओर से इस मसले पर खुद को संबद्घ करने के बाद जवानों का दर्द वहीं की वही दब कर रह गया।
तंगहाली और मुहाल जिंदगी के यह हालात अर्धसैनिक बलों की हर कंपनियों में जवानों का संकट बना हुआ है। लिहाजा, जवान इससे अपना पीछा छुड़ाना ही अपनी बेहतरी मान रहे हैं। आंकड़ों में जवानों का दर्द साफ झलकता है। सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) से 22,260, केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) से 11,300, असम राइफल्स से 5600, केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (सीआईएसएफ) से 3600, भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) से 1600 और सशस्त्र सीमा बल (एसएसबी) से 1400 जवान वीआरएस ले चुके हैं। यही नहीं, प्रोन्नति (प्रमोशन) मिलने के मानदंड भी ऐसे बनाए गए हैं कि प्रोत्साहन तो क्या जवानों के कुंठित होने की पूरी भूमिका इसमें है। अहलूवालिया के मुताबिक एक जवान को हेड कांस्टेबल बनने में 18 से 20 साल लग जाते हैं और उसके बाद अगले प्रमोशन यानी अतिरिक्त कमांडेंट बनने के लिए 15 से 20 साल और लग जाते हैं। यानी कि उच्चस्तर के पदों पर जाने के सारे बंद कर दिए गए हैं।












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