पथरीबल मुठभेड़, सेना के अफसरों पर शिंकजा

12 साल पहले जम्मू-कश्मीर के पथरीबल में कथित फर्जी मुठभेड़ के मामले में केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा है कि इस घटना में मानवाधिकारों का संवेदनशील मुद्दा शामिल होने के कारण सेना अधिकारियों पर कार्रवाई का निर्णय लेने के लिए चार महीने के समय की जरूरत है। जस्टिस बी.एस. चौहान और स्वतंत्र कुमार की पीठ के समक्ष रक्षा मंत्रालय की ओर से पेश किए गए हलफनामे में कहा गया है कि गृह और रक्षा मंत्रालय का संयुक्त रूप से मानना है कि सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून (एएफएसपीए) के मुताबिक सेना अधिकारियों पर कानूनी कार्रवाई शुरू किए जाने से पहले पूर्व आज्ञा की जरूरत होती है। इसमें कहा गया है कि चूंकि इस मामले में मानवाधिकारों सहित कई संवेदनशील मुद्दे जुड़े हुए हैं इसलिए इसका व्यावहारिक हल ढूंढ़ा जाना चाहिए। हलफनामे में कहा गया है कि इस मामले में शामिल आठ सेना अधिकारियों पर कानूनी कार्रवाई के लिए केंद्र सही और न्यायपूर्ण आदेश जारी करेगा।
इस मामले की जांच कर रही सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि कानून के मुताबिक सेना अधिकारियों द्वारा एएफएसपीए से प्राप्त सुरक्षा का दुरुपयोग नहीं किया जा सकता। शीर्ष कोर्ट इस प्रावधान की धारा 6 के अंतर्गत सशस्त्र बलों को मुठभेड़ के लिए प्राप्त विशेषाधिकार पर विचार कर रही है। सीबीआई ने पिछली सुनवाई में कहा था कि पथरीबल मामले में जानबूझकर हत्या की गई थी इसलिए दोषी अधिकारियों कठोर सजा दी जानी चाहिए और उन्हें एएफएसपीए की सुरक्षा नहीं मिलनी चाहिए। दूसरी ओर, सेना अधिकारियों की ओर से पेश हुए अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल पी.पी. मल्होत्रा ने कहा कि अधिकारी निर्दोष हैं और उन पर कानूनी कार्रवाई किए जाने से पहले पूर्व आज्ञा लिया जाना जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई से एएफएसपीए की धारा 6 का अर्थ स्पष्ट करने का आदेश देते हुए मामले की अगली सुनवाई के लिए 2 अप्रैल की तारीख तय की है।












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