हिंदू शरणार्थियों को कहीं तो छत दे सरकार

राधा कुमार का मानना है कि 1947 के बंटवारे में पश्चिम पाकिस्तान से आए हिंदू शरणार्थियों की तीसरी पीढ़ी भी राजनीतिज्ञों के हाथ का मोहरा बन कर रह गई है। केंद्र को सौंपी गई रिपोर्ट में भी कुमार सहित वार्ताकार दिलीप पडगांवकर और एमएम अंसारी ने इन हिंदुओं के लिए कई सिफारिशें दी हैं।
अपनी नागरिकता के लिए लड़ रहे इन हिंदुओं ने बुधवार को चौकस पुलिस बंदोबस्त की बीच दिल्ली के जंतर मंतर पर प्रदर्शन और नारेबाजी कर एक बार फिर केंद्र सरकार को जगाने की कोशिश की। बिना नागरिकता के तमाम जिल्लतों का सामना कर रहे इन तीन लाख हिंदुओं का मानना है कि श्रीनगर और केंद्र की वोट की राजनीति की वजह से उन्हें जानबूझ कर नागरिक का दर्जा नहीं दिया जा रहा है। जम्मू से आए रतन लाल ने बताया कि नागरिकता मिलने से इन्हें वोट देने का अधिकार मिल जाएगा। लाल के मुताबिक तीन लाख हिंदुओं का वोट राज्य की मुसलिम राजनीति के वर्चस्व का पूरा समीकरण बिगाड़ देगा। लाल से इत्तफाक रख रहे राज पाल का मानना है कि इसी वजह से सरकार इन्हें नागरिकता देने से बच रही है।
64 सालों से राज्य से लेकर केंद्र तक की बेरुखी झेल रहे इन हिंदुओं ने पिछले साल जम्मू-कश्मीर के लिए नियुक्त वार्ताकारों का ध्यान अपनी ओर खींचा। तीन सदस्यीय वार्ताकार टीम की सदस्य राधा कुमार ने इस मुद्दे पर खास बातचीत में अमर उजाला को बताया कि एक साल तक राज्य के हर तबके से बातचीत की मुहिम में उन्होंने इन हिंदुओं को भी शामिल किया। कुमार ने पाया कि तीन लाख हिंदु मौकापरस्त राजनीतिज्ञों के हाथ का मोहरा बन गए हैं। कुमार के मुताबिक किसी राजनीतिक तबके में यह समझने की संवेदनशीलता नहीं है कि तीसरी पीढ़ी बिना नागरिकता के जी रही है तो यह किन मुश्किलों से गुजर रहे होंगे। वे ना तो अपने नाम पर संपत्ति खरीद सकते हैं, ना ही सरकारी नौकरी कर सकते हैं। कुमार ने कहा कि इनके पांवों के नीचे जमीन ही नदारद है।
कुमार ने कहा कि कोई विधायक राजनीतिक कीमत पर इनकी बात विधानसभा में क्यों उठाएगा। कुमार के मुताबिक उन्होंने 10 मार्च को हुई दिल्ली पोलिटकल ग्रुप की बैठक में राज्य से आए विधायकों के बीच इनका मुद्दा उठाया था। लेकिन वादे के बावजूद अब तक कोई जवाब नहीं आया है। कुमार के मुताबिक अपनी जमीन तलाश रहे इन लोगों में अभी वह राजनीतिक पैनापन नहीं है कि वह चालाकी से अपना काम निकालें।












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