'दयावान बनने के लिए मुझे क्रूर बनना ही होगा'

जिससे अंदाजा लग गया था कि आज आम बजट से आम आदमी ही गायब है। अपनी बात को रखते हुए प्रणब दा ने कहा कि वित्त मंत्री का जीवन आसान नहीं है। नीति निर्माताओं, किसानों, राजनीतिज्ञों और व्यापारिक घरानों सहित कई खिलाड़ी अर्थव्यवस्था के निर्माण में अपना योगदान करते हैं।
उन्होंने कहा कि जब अर्थव्यवस्था के हिसाब से चलता है तो लोग खुश रहते हैं जहां कोई गड़बड़ी होती है वहां लगते है वित्तमंत्री को कोसना शुरू कर देते हैं। मुखर्जी ने कहा, 'जैसा कि हैमलेट, डेनमार्क के प्रिंस ने शेक्सपीयर के अमर शब्दों में कहा था, दयावान बनने के लिए मुझे क्रूर बनना ही होगा।
जिसके बाद सदन में जोरदार ठहाका लगा। खुद मुखर्जी भी अपने इस बात पर हंसने लगे। लेकिन जब बजट पेश हुआ तो लोगों की समझ में आ गया कि इस बार नरम दिल प्रणब दा ने नहीं बल्कि क्रूर प्रणब दा ने बनाया है, जिसमें ना तो महिलाओं, बच्चों और बुजर्गों के लिए कुछ भी नहीं है।












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