भेजिये होली से जुड़े अपने अनुभव व तस्‍वीरें

Holi
इस होली हम आपके लिए लाये हैं एक ऐसा स्‍पेशल पेज, जहां हम नहीं आप लिखेंगे। आप अपनी कलम के माध्‍यम से होली के रंग सजाकर हमें भेज सकते हैं। हम उन्‍हें वनइंडिया पर प्रकाशित करेंगे, वो भी आपके नाम से। आप निम्‍न चीजें भेज सकते हैं-

* पिछली या उससे पहले की होली के अनुभव/तस्‍वीरें
* होली पर आपकी पसंद न पसंद
* आपके शहर की होली पर लेख
* होली पर आपकी खुद की कविताएं
* आपके शहर से होली की तस्‍वीरें
* ढेर सारी शुभकामनाएं

इसकी शुरुआत मैं अपने अनुभव से कर रहा हूं। आप अपने अनुभव/कविताएं/तस्‍वीरें भेज सकते हैं [email protected] पर।

अनुभव की शुरुआत मैं अपनी कलम से कर रहा हूं-

अजय मोहन,
एमएलए लेआउट, बनरगट्टा रोड बेंगलुरु
बचपन से मैं हजरतगंज में रहा। इस पौश इलाके में होली के दिन भी लोग काफी फॉर्मल रहते थे। रंगों का त्‍योहार हर साल आता और हार बार की तरह मैं अपने मोहल्‍ले की चार दीवारी में रंग खेल कर आ जाता। दूसरे दिन अखबारों में पुराने लखनऊ का फोटो फीचर देखने वाला हो‍ता था। मेरा भी मन करता था कि मैं पुराने लखनऊ जाऊं और होली खेलूं, लेकिन साल बीतते ही सारी ख्‍वाहिशें काफिर हो जातीं।

कहते हैं हर काम सही वक्‍त और सही उम्र में होता है। जब मैं ग्रेजुएशन में आया तो मेरी दोस्‍ती गौरव सक्‍सेना से हुई। दोस्‍ती का नेटवर्क आगे बढ़ा और उसमें शामिल हुए क्षितिज मिश्रा, विक्रम सिंह, नीरज सक्‍सेना और सौरभ। असल में मेरे ये सारे दोस्‍त चौक और ठाकुरगंज के रहने वाले हैं। 1999 में होली के ठीक दो दिन पहले गौरव का फोन आया। बोला यह होली पुराने लखनऊ में मनाओ। मेरे दिमाग पर वो सारी तस्‍वीरें छा गईं, जो मैं बचपन से अखबारों में देखता आया था। मेरा उत्‍साह डबल हो गया और मैंने हां कर दी।

सुबह होते ही मैं ठाकुर गंज पहुंच गया। रास्‍ते में सन्‍नाटा पसरा हुआ था, लोग अपनी छतों से राहगीरों पर रंग फेंक रहे थे। बच्‍चे पिचकारियों से एक दूसरे पर वार कर रहे थे़ और घरों में लोग एक दूसरे के गाल रंग रहे थे। यह सब देख मुझे लगा कि लगता है पुराने लखनऊ ने अपनी नवाबी खो दी। खैर मित्र के घर यह भी नहीं कह सकता था कि होली में मजा नहीं आया। दो घंटा बीत गया हम उसके घर पर ही रहे।

मैंने कहा अब मुझे घर चलना चाहिये। मेरे मित्र बोले कहां अभी कहां, अभी तो रंगों का खुमार चढ़ने का समय आया है। चलो हम तुम्‍हें चौक तक छोड़ कर आते हैं। हम चारों दोस्‍त अपनी-अपनी मोटरसाइकिलों से निकल पड़े। जैसे ही मेन रोड पर आये नजारा अदभुत था। रंग-बिरंगे लोगों की लंबी कतार ठाकुरगंज से चौक की ओर बढ़ रही थी। इस कतार में मोटरसाइकिलें, कारें, खुली जीपें और बीच-बीच में ढोल नगाड़ों के साथ नाचते-गाते लोग। यही नहीं आगे बढ़े तो देखा लोग हाथी, ऊंठ और घोड़ों पर सवार होकर सड़कों पर गुलाल उड़ाते चले जा रहे। असल में इसी को होली की टोली कहते हैं, जो हर साल पुराने लखनऊ में निकलती है।

इस टोली की खासियत यह है कि इसमें कई धर्मों के लोग शामिल होते हैं। फिर चाहे वो चौक का फकीर हो या चौंपटियां का नवाब और या फिर नक्‍खास के रईस। इस टोली में सब एक समान। घरों से निकल कर लोग गले मिलते वक्‍त किसी की जाति या धर्म नहीं पूछते। उनके मन में सिर्फ एक बात होती है प्‍यार, प्‍यार और सिर्फ प्‍यार।

आज मैं बेंगलुरु में हूं। यहां अपने पुराने लखनऊ की होली को हर साल मिस करता हूं। हर साल सोचता हूं कि होली पर लखनऊ जाऊं लेकिन हर बार रह जाता है। लेकिन ऐ मेरे लखनऊ मैं एक बार जरूर आउंगा तेरी जमीन पर गुलाल का टीका लगाने।

होली से जुड़ी यादों को आप भी हमें लिख कर भेज सकते हैं। हम वनइंडिया पर उसे प्रकाशित करेंगे। पिछली या उससे पहले की होली की तस्‍वीरें या फिर आपके द्वारा लिखी गई कोई कविता शेयर करना चाहते हैं तो भेजिये, हम उसे होली स्‍पेशल पेज पर प्रोमोट करेंगे। होली पर कविताएं भेजें हमारा ई-मेल आईडी है [email protected] । ईमेल के सब्‍जेक्‍ट में Holi Experience or Pictures जरूर लिखें।

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