लेबर कोर्ट का अधिकार जल्द तय होगा

Supreme Court
दिल्ली (ब्यूरो)। सहकारी फैक्ट्रियों के कर्मचारियों के मामले में लेबर कोर्ट का क्या हक है। यह मामला इसलिए पेंजिदा हो गया है कि सुप्रीम कोर्ट के दो फैसले एक -दूसरे के खिलाफ है। अब सुप्रीम कोर्ट की विशेष पीठ को इस बारे में स्पष्ट करना है। उत्तर प्रदेश औद्योगिक विवाद अधिनियम के तहत श्रम अदालत फैसला ले सकती है या नहीं, इसका फैसला अब सुप्रीम कोर्ट करेगी। दरअसल शीर्षस्थ अदालत को इस मामले में अपनी ही दो पीठों के विरोधाभासी फैसलों को स्पष्ट करना है।

सर्वोच्च अदालत ने इस मसले पर इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले के खिलाफ दायर याचिका पर प्रतिपक्ष को नोटिस जारी किया है, जिसमें हाईकोर्ट ने शीर्षस्थ अदालत के ही एक फैसले के आधार पर निर्णय लिया था। याचिका में शीर्षस्थ अदालत से कहा गया है कि उत्तर प्रदेश में चतुर्थ श्रेणी के कई लाख कर्मचारी सहकारी फैक्ट्रियों में काम करते हैं जिन्हें अचानक नौकरी से निकाल दिया जाता है। ऐसी स्थिति में उनके विवाद का निपटारा श्रम अदालत में औद्योगिक विवाद कानून के तहत होगा या नहीं। इस मुद्दे पर स्थिति अस्पष्ट हो गई है, क्योंकि इस तरह के मामले में दो विरोधाभासी फैसले हैं। इस वजह से कर्मचारियों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।

जस्टिस टीएस ठाकुर और जस्टिस सीके प्रसाद की पीठ ने प्रमोद कुमार की याचिका पर किशन सहकारी शुगर फैक्ट्री सहित अन्य पक्षों को नोटिस जारी कर चार सप्ताह में जवाब तलब किया है। पीठ के समक्ष याचिकाकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता डीके गर्ग ने तर्क दिया कि उनके मुवक्किल ने 1990 में फैक्ट्री में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के पद पर कार्य शुरू किया था। चार साल बाद उसे अचानक नौकरी से निकाल दिया गया। गर्ग ने पीठ को बताया कि राज्य सरकार ने नवंबर, 1994 में इस मुद्दे पर श्रम अदालत में विवाद के निपटारे के संबंध में शासनादेश जारी किया था।

श्रम अदालत की ओर से अप्रैल, 1997 में उनके मुवक्किल को वापस नौकरी पर रखने और नौकरी से हटाए जाने की अवधि के लिए 50 प्रतिशत भत्ते के भुगतान का आदेश दिया। हालांकि फैक्ट्री की ओर से श्रम अदालत के इस आदेश को नहीं माना गया और शीर्षस्थ अदालत के एक फैसले के आधार पर हाईकोर्ट में याचिका दायर कर दी गई, जिसमें कहा गया कि औद्योगिक विवाद अधिनियम के तहत आने वाले मामलों पर श्रम अदालत सुनवाई नहीं कर सकती, जबकि दूसरा फैसला इसके विपरीत है। हाईकोर्ट ने फैक्टरी के इस दावे को स्वीकार कर लिया और श्रम अदालत के आदेश को दरकिनार कर दिया।

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